सबूत शब्द क्या है ? बब्ली राय
“रातो की नींद उड़ सी गई है ये सोचकर कि पता नहीं सर्वे के दौरान हमारा क्या होगा ?इतने सालो से यहाँ पर रहकर चीज़ो को बनाया पर पलभर में हम बेघर हो जाऐंगे ....” बेघर शब्द ने ही एक तरह का कम्पन सा पैदा कर दिया है जिंदगी में ।जिसकी ज़मीन नहीं उसका कोई वजूद नहीं ।जब पापाजी ये वाली बात बोल रहे थे तो लगा कि वजूद इस जगह से ही जुड़ा है ।जहाँ पर सिर्फ रहना मात्र ही काफी नहीं है ।नीचे की तली अचानक ही गायब हो गई है और घर की चारों तरफ़ की दिवारें खिसक रही हैं जिसे हम हथेली से मसोटने की कोशिश कर रहे है पर कुछ कर नहीं पा रहे है शायद..
“जब हम शुरुआत में इस जगह पर आऐ तो ,इस ज़मीन को सिर्फ रहने के ठिकाने से देखा।जहाँ पर वो अवसर नज़र आऐ,जिसमें जिन्दगी की पहली मुमकिनता दिखी सिर्फ खाने और कमाने की ।जब पहला वी.पी.सिंह का पहला कार्ड बना तो लगा कि हम सरकारी रजिस्टर में अपना नाम देखकर लगा कि हम सरकारी गिनती में आ गऐ हैं । धीरे- धीरे रहने के बाद ये बात समझ में आई कि जगह पर सिर्फ घर बना लेना ही काफी नहीं होता । जब प्रक्रिया बनी तो सरकारी फायदो के लिए राशन कार्ड भी बन गया । जिस पर कुछ सस्ते में राशन मिल जाता था । यानि कमाई में से कुछ बच पाने की संभावना बनी। धीरे-धीरे 25 साल के अन्तरालो के बीच में नऐ-नऐ सरकारी नम्बरों के बीच में हमारी गणना होने लगी ।घर की ऐसी कौन सी महफूसियत वाली जगह नहीं बनाई ,जहाँ पर अपने उन पर्चो को ना बसाया हो।"
