दो ज़िंदगी बदबू में jaanu
पहले वशीम अहमद जी-: जो महदिउल बनारस उत्तर प्रदेश से।
जब मैंने उस सत्रह साल के लड़के को बसेरे में पहली बार देखा तब सुबह का वक़्त था। वो दिखने में थोड़ा सा काला था, और उस का एक हाथ और एक पैर थोड़ा कमज़ोर थे। उस ने सफ़ेद शर्ट और काली पैंट पहनी थी, और उस की पैंट की एक जेब में गिलास और दूसरी में एक पेन था। वो रास्ते से चला जा रहा था, लोगों को सलाम-नमस्ते करता हुआ। कुछ बच्चे उस के पीछे लगे थे और उसे पागल-पागल कह रहे थे। उस समय उसे देख कर उस के बारे में मुझे कुछ समझ नहीं आया था।
तमन्ना की नींद टूटी। वो अपने हसीन बेड से लिपटे बिस्तर को छोड़कर जागती हुई, अपनी पलकों को धीरे-धीरे खोलती हुई, शरीर को टाइट करते हुए उठी। बिस्तर को ओढ़े हुए हल्के गुलाबी रंग के पर्दे को हटा कर उसने दरवाज़ा खोला और सामने लगे दर्पण में देखा। अपना चेहरा देखते हुए, बालों पर हाथ मारा और यकायक कुछ सोच कर उस के चेहरे पर हल्की सी मुस्कान खिलखिलाई। वो मुड़ी और साहिल के बिस्तर के पास गई, उस के सिरहाने पर बैठ गई। चादर के नीचे से साहिल का चेहरा झांक रहा था - आँखें बंद, किसी गहरे सपने में खोई हुईं एकदम शांत लग रहीं थीं। बाल तकिये से चिपके हुए बिखरे-बिखरे हो रहे थे। तमन्ना ने चादर थोड़ी नीचे सरकाई और उस के गाल पर एक हल्का सा किस दिया। तो साहिल ने थोड़ा हिलते हुए अपनी बाहें फैलाईं और तमन्ना के गले में डाल दीं। तमन्ना ने अपनी मुलायम हथेली से उस के हाथ को सहलाया, और आँखें मटकाते हुए, कमर के झटके के साथ उठी और बिस्तर से दूर हट गई। उस के दूर होते ही साहिल ने बनावटी रूठने की "ह्म्म्म" की आवाज़ निकाल कर चादर खींच कर अपना चेहरा ढक लिया।
सूरज अभी नहीं निकला है। बसेरे में धुएँ की धुँध नज़र आ रही है। पुश्ता पर कई लोगों के घरों पर चूल्हा जल रहा है। लोग अपने चूल्हों के पास बैठ कर चाय की चुस्कियाँ लगा रहे हैं। ये चूल्हे कमरों के अंदर नहीं बल्कि बाहर ही हैं - सड़क के साथ ही चूल्हा है, और यही रसोईघर है। जब लोग गुज़रते हैं तो इसे छूते नहीं, बस देखते हुए निकल जाते हैं।
एक लड़का, जिस की उम्र पंद्रह से सोलह साल है, जो सुबह की पहली किरण दो सौ से चार सौ रुपये कमा कर ही देखता है। वो अपने बालों को हमेशा लंबा रखता है। उस के कंधे पर हमेशा एक झोली रहती है। उस का रंग सांवला है और वो मुँह में हर वक़्त दिलबाग चबाता रहता है।