पेड़ के नीचे सड़क के किनारे किसी की राह देख रहे महिला पुरुष सभी की आँखे एक तरफ ही निहारे जा रही थी । सड़क से अनगिनत गाड़ियाँ नज़रो के सामने से यूं ही निकल जाती । सड़क के दो छोर एक छोर आने वालो का दूसरा जाने वालो का । पर जिस छोर पर लोग खड़े थे व कहीं ना कहीं जाने के लिए ही था । माना कि दोनो छोर पर लोग खड़े थे, एक कॉल सेंटर वाली टाटा सूमि निकली जिसमे कुछ नौजवान लड़कियाँ अपने आपसी दोस्तो के साथ हंसी के ठहाको के साथ हंसी के ठहाके मारकर एक दूसरे के सामने अपनी भौंहो से नैन-मटक्का कर रही थी । टाटा सूमो एकदम सरकती हुई खड़ी हो गई ।
16 जनवरी एक अखाड़ा:-
मोहरम् से पहले की तैयारी किसी युद्ध से कम नही होती । ये युद्ध सामने वाले नही । बल्कि इस युद्ध मे दोनो तरफ से लड़ने वाला एक ही शख्स होता है ।
घेवड़ा की जमीन पर आज पहला दंगल था । कुछ मालूम नही था की घेवड़ा की अवाम उसे सहन भी कर पाएगी या नही? पर तैयारी से तो लग रहा था की सब तैयार है। उसके हर पैंतरे को देखने के लिये और बर्दाश्त भी करने के लिये भी ।
कई लठेत, तलवार बाज़, टीन की पतली और लचकीली तलवारे, चाकूबाज़ । सभी अपने-अपने पैर-पैंतरो मे माहिर थे । जो एक तरफ लगे टैन्ट के नीचे कुर्सियों पर विराज़मान थे । एक आदमी हाथ मे माइक पकड़ सभी देखने वाली घेवड़ा की अवाम को बता रहा था की आगे क्या होने वाला है और अब क्या होने वाला है? कौन सा शातिर आदमी आपके आगे अपना ज़ोहर पेश करने वाला है । बस लोग तैयार रहते उस कलाकार को देखने और उसका ज़ोहर देखने के लिये ।
अब आँखें पूछने वाली थीं कि आज की रात कहाँ कटेगी? उन आँखों की झुकी पलकों का इशारा समझ पाना मेरे लिए मुश्किल नहीं था। वक़्त ही ऐसा था।
जिस रास्ते से हम दोनों को जाना था, वह मेरे लिए जाना-जाना सा था, लेकिन मेरे पापा के लिए अनजाना था। सूखे गले और चिपके होंठों से एक आवाज़ आई, "बेटा, चलो।" ये आवाज़ मेरे लिए पुरानी थी। पर आज मुझे अपने कमरे में नहीं, कुछ दूर जा कर दूसरे के घर में सोना था, जहाँ हमें शरण मिली हुई थी। शहर में अपने टूटे कोने को छोड़ कर हम दोनों चल दिए, किसी और जगह को सजाने के लिए। टूटते नांगला को चीरते हुए हम रिंग रोड पर आ गए। उधर पुलिस ने अपना चेक पोस्ट रोड पर ला कर खड़ा कर दिया था। अब बसों ने भी अपना रास्ता बदल रखा था। अजनबी बन गई सड़कों को सोच पाने में मैं हैरान था।
बगल से गुज़रते हुए एक काली तिरपाल के नीचे सांवली लड़की किसी की आइब्रो बनाती दिखी। ये दिखना कोई अनोखी बात नहीं थी। पर इस जगह, जहाँ दूर-दूर तक खेत हैं और घर ठीक से जम भी नहीं पाए हैं, वहाँ ये दिखना अचंभे में डालता है। होंठो पर मुस्कान ला देता है, जीने की चाहतों को सामने ला खड़ा करता है।
वो मुझे देख कर रुक गई। थोड़ा मुसकुराई और न जाने कौन-सी झिझक को उसने अपने माथे पर तीन अंगुलियों को फेर कर दूर किया। मैं मुस्कुराई ओर बोली, “पार्लर का काम आता है?”
वो मुँह में धागे को दबाए हुए बोली, “हाँ"।
“तो पार्लर खोलने का इरादा है?”
किसी एक जगह को दिया निरंतर समय शख़्स में एक वैल्यू लाता है। यह वैल्यू जगह में एक वैल्यू लाता है। यही कारण है कि नांगला में दिए किसी के तीस साल घेवरा को उसकी निर्धारित जगह बनाते हैं; इनके बदले ही तो ये बारह गज़, अठारह गज़ के प्लॉट हैं।
जहाँ हम अभी रह रहे हैं, वहाँ घर, गली, मोड़ से ले कर घरों के घेरे बनाने में हमारे फ़ैसले रहे - हम घर किस जगह बनाएँगे, किस तरफ़ दरवाज़े का मुँह होगा, किन लोगों को पड़ोस में शामिल करना है, किन को नहीं। यह सब हम ने ही तय किया है अपनी जगह में रहते हुए। इन घेरों से ले कर पीपल के पेड़ के नीचे का मंदिर भी हम ने सोचा था। जगह के विकसित होने में हमारा योगदान ना सही, हमारे फ़ैसले तो रहे ही हैं, मर्ज़ी तो रही है। घेवरा में ये अचानक गुम हो गया है। यह खटकता है। इसके लिए शब्द नहीं हैं, इसलिए सुविधा-असुविधा के फेरे में पड़े हैं। अपनी पावर खोने का ग़म है।
क्या हर शख़्स अपने पड़ोस से ख़ुश होगा? हो ही नहीं सकता। कई दिन तो ऐसे आते हैं कि भागने को जी करता है। रिश्ते तो हर दो मिनट में बनते हैं, रोटी भी साथ बैठा शख़्स पूछ ही लेता है। इसके बावजूद भी हम यही आलाप रहे हैं कि हम ने अपने रिश्ते-पड़ोस को खो दिया। कुछ तो है जिसे छुपा रहे हैं।

30 अगस्त को एमसीडी ने एक लिस्ट नांगला के बस्जिद की दीवार पर लगाई । इसमें डॉक्यूमेंट दिखा के चुने गए 30,000 लोगों के नांगला से लगभग 900 घरों के घेवरा मे मिला प्लॉट नंबर दर्ज थे। रात भर मोमबत्ती में डॉट-मैट्रिक्स प्रिंट वाली इस लिस्ट में सब ने अपना नंबर ढूँढ़ा। सुबह तक बारिश में भीगी लिस्ट में मिटे अक्षरों में भी तलाश जारी थी।
कोई ऐसी चीज़ नहीं थी आज, जो तुल नहीं सकती थी। अपनी लिमिट से भी आगे निकल चुका था तराज़ू।
ढेरों तिरपालों के गट्ठर आजू-बाजू बंधे, बिखरे पड़े हैं। कई तोले जा चुके हैं और कई तुलने बाकी हैं। तराज़ू के दो पलड़ो में से एक पलड़ा दुकान वाले का होता है, पर वो भी सामान से लदा है। तिरपाल से तिरपाल तोल कर हिसाब दिया जा रहा है। कोई भी चीज़ बेमोल नहीं है, बशर्ते उस में वज़न हो। सड़क के किनारे को गोदाम बना कर दबा-दब सामान फेंका जा रहा है। गली में तरह-तरह के उठते शोर की तरह सामान भी एक समान नहीं है। बड़ा कठोर था आज हिसाब का पलड़ा, जो चीज़ों के 'कैसे आने' को जानता ही नहीं था।

एमसीडी द्वारा जारी पर्ची, 7000 रु के "शेयर मनी" की रसीद
बहुत बड़ी इकसार जगह में अगर ज़रा सी भी ऊँचाई हो तो दूर से ही नज़र आने लगती है। लगभग दो किलोमीटर के दायरे मे बसने वाली इस जगह के इर्द-गिर्द, जहाँ ज़मीन से तीन फ़ुट की ऊँचाई पर सड़क बनने का काम चल रहा है, वहाँ बड़े-बड़े पत्थर तोड़-तोड़ कर पूरे रास्ते पर बिखेरे हुए थे। सुबह के ग्यारह बजे का वक़्त था। कई लोग उस रास्ते को बड़े-बड़े हथौड़े से इकसार करने में जुटे थे। इस रोड का एक सिरा हरियाणा, और दूसरा दिल्ली को छूएगा। इस के बीच एक जगह का निर्माण हो रहा है।
दूर से देखने पर पूरी जगह में एक ही रगं। कई घर बने हुए थे, पर किसी का भी रंग दूसरों से अलग नहीं। चारों तरफ़ पीला रंग, हर तरफ़ से उठती नज़र को मिलाता। वहाँ रहने वाले लोग भले ही ख़ुद को दूसरे से अन्जान समझें, देखने वाले को घरों की बनावट और रंग से इन के बीच में एक रिश्ता लगता है।
घेवरा को दूर से देखो तो हर तरफ़ कच्ची ज़मीन ही दिखाई देती है। यह बताना भी आसान है कि कौन सी ज़मीन उठी हुई है और कौन सी नीचे है, कौन सी ज़मीन खुरदुरी है और कौन सी समतल। अभी जिस जगह पर लोगों का घर बनना शुरू हुआ है, वो जगह दूर से बिलकुल समतल दिखाई दे रही है। उस के थोड़ी दूरी की सारी ज़मीन खुरदुरी लगती है, जैसे यहाँ अभी घरों के बनने का ख़्याल भी नहीं हुआ है। बीच में ज़मीन उठी हुई है, उस पर बड़े पत्थर (तत्ताली पत्थर) हैं, जिन से उसे एक रूप देने की कोशिश की जा रही है। शायद इस पर सड़क बनेगी। जीप की खिड़की से बाहर उस जगह पर नज़र दौड़ाई तो वो जगह एक घनी बस्ती जैसी नज़र आ रही थी। जैसे-जैसे पास आते गए, घनापन कम, और कम होता गया। जो दूर से घर लग रहे थे, पास आते ही उन के आकर एक कमज़ोर दीवार की तरह नज़र आने लगे, जो सिर्फ़ एक तेज़ हवा के झोंके के मोहताज हैं।