BlogGalleryContact

चलती चक्की, Jaanu Nagar

चलती चक्की

बसन्त की हल्की धूप मे खिलती दोपहर एक सूने पन को जीने मे लगी थी। सभी लोग अपने मन मुताबिक की छाह को ढूढ कर बैठे हुए थे कोई-कोई तो हाफ बाजू की स्वेटर को पहन कर राशन को लेने लिए एक छोटी सी लाइन बना कर जमा राशन कार्डो के पास अपने अपने नाम को सुनकर जाते और अपना पैसा देते जितना राशन मिलना होता अपना राशन लेकर अपने घर की तरफ चले जाते। चेहरे पर लालिमा की दमक हाथ पैर कुछ रूखे-रूखे  अब लाइन का जुमकना चलू हो गया लाइन ज्यादा बड़ी नही हल्की-हल्की धूप से बचने के लिए दिवारो से बनी छाया मे बैठे थे।सड़क के दूसरी तरफ से आती आवाजे किसी बुदबुदाने से कम ना थी।जिसको समझना कान को रोकना भी गलत साबित कर देती की आवाज किस चीज की है।स्कूल के बगल से निकलती काली लम्बी सड़क जिसका एक कोना दिखता है और दूसरा कोना  भी दिखता है मानो अभी सड़क का सफर निश्चित है पर आने वाले मे इस कोने को किस जगह से देख सकते है।
Read whole post  Permalink

एकांत जगह मे, Jaanu Nagar

एकांत जगह मे

दोनो को भटकता देख दो नज़रे उनका पीछा कर रही थी । जब दोनो की नज़रे पीछे को मुड़ती तो पीछा कर रही नज़रे ओट मे जाकर छिप जाती । इस तरह से नज़रो के छुपन छुपाई का खेल चल रहा था छुपन छुपाई वाली नज़रे इतना करीब आ गयी ।लड़के ने छुपती नजर को आवाज दिया" और क्या हाल है?”

Read whole post  Permalink

jab o din yad aata hai

जब वो दिन याद आता है तो मन मे उठती अनगिनत तरंगे समतल हो जाती है। समतल होती तरंगे अपने आप मे सूनापन महसूस करती है। तपती धूप को तो सह लिया चटाई के बारीक छिद्रो से आती ठंडी हवा के साथ पर अब वो भी मुश्किल हो रहा है
Read whole post  Permalink

घेवरा मे हुई पहली और छोटी सी मुलाकात ..(babli ray)

"अरे हमारा रंग तो अण्डे जैसा था। वो तो यहां आकर ऐसा पड़ गया। "
रोटी बनाती माया जी ने यह बात बड़े ईठलाते हुये बोली। पसीने की लड़ियां कब उनके माथे से बहकर उनकी थोडी तक आ जाती उनको पता ही नहीं चलता। अपने घर की चौखट पर बैठी वो गैस चूल्हें पर चढ़े तवे से गर्म-गर्म रोटियां उतारती गई।
Read whole post  Permalink

टोकन, Suraj Rai

कल रात मैंने ट्रंक में झाँका तो मुझे अंदर एक चमकीला, चौकोड़ टुकड़ा नज़र आया। उस पर कहीं-कहीं चॉक की पतली परत थी। इस चौकोड़ टुकड़े से मेरी कोई याद नहीं जुड़ी थी। मैंने हाथ से चॉक को साफ़ किया। वो टुकड़ा अल्मूनियम का था। उस पर एक नंबर लिखा था - 415। मैं यह नंबर पहचानता हूँ - हमारे राशन कार्ड पर भी यही नंबर लिखा है। उस पर एक मोहर लगी थी, शायद जारी करने वाले की। उस मोहर के अंदर एक तारीख़ छपी थी, 1987। ये देख कर मेरे दिमाग़ में एक छवि गुज़री – मेरे बचपन का एक दिन, जब घर की दहलीज़ पर खड़े दो आदमी ब्रुश से घर के बाहर, दीवार पर ये नंबर पेंट कर रहे थे। ये नंबर मेरे बचपन में कई साल दीवार पर लिखा रहा था।

मैंने अपनी माँ से अल्मूनियम के उस टुकड़े के बारे में पूछा। वो बोलीं, “ये टोकन है। इस पर हमारे घर का नंबर लिखा है। हमारा राशन कार्ड और इलेक्शन आई-कार्ड इसके आधार पर बने थे। इसे वीपी सिंह ने बनवाया था। यहाँ हर ग़रीब आदमी का टोकन बना था। इसका मकसद कम दाम में केरोसीन और चीनी दिलवाना था। टोकन जारी होते वक़्त हमारी कलोनी का नाम दिया गया था। आज इसे एलएनजेपी कलोनी कहते हैं, पर उस समय इसे टी-वुड मार्किट नाम दिया गया था।" माँ ने मुझे टोकन को वापस उसकी जगह पर रख देने को कहा। उन्होंने कहा कि आगे चल कर ये हमारे काम आएगा।

टोकन को वापस ट्रंक में रखते हुए मैं सोचने लगा, जिसका परिवार की मेरी यादों से कोई रिश्ता नहीं है, वो शहर में मेरे परिवार की पहचान का मज़बूत चिन्ह है।
Related Entries:
शहर के किनारे, Shamsher Ali
अपने कोने की तलाश
पर्ची
जाँच
 Permalink

आज की रात कहाँ? Jaanu Naagar

अब आँखें पूछने वाली थीं कि आज की रात कहाँ कटेगी? उन आँखों की झुकी पलकों का इशारा समझ पाना मेरे लिए मुश्किल नहीं था। वक़्त ही ऐसा था।

जिस रास्ते से हम दोनों को जाना था, वह मेरे लिए जाना-जाना सा था, लेकिन मेरे पापा के लिए अनजाना था। सूखे गले और चिपके होंठों से एक आवाज़ आई, "बेटा, चलो।" ये आवाज़ मेरे लिए पुरानी थी। पर आज मुझे अपने कमरे में नहीं, कुछ दूर जा कर दूसरे के घर में सोना था, जहाँ हमें शरण मिली हुई थी। शहर में अपने टूटे कोने को छोड़ कर हम दोनों चल दिए, किसी और जगह को सजाने के लिए। टूटते नांगला को चीरते हुए हम रिंग रोड पर आ गए। उधर पुलिस ने अपना चेक पोस्ट रोड पर ला कर खड़ा कर दिया था। अब बसों ने भी अपना रास्ता बदल रखा था। अजनबी बन गई सड़कों को सोच पाने में मैं हैरान था।
Related Entries:
वो चेहरा अभी यहाँ बना नहीं, Shamsher Ali
दक्षिणपुरी से 75 किलोमीटर दूर, Lakhmi Kohli
Read whole post  Permalink

दक्षिणपुरी से 75 किलोमीटर दूर, Lakhmi Kohli

दक्षिणपुरी से 75 किलोमीटर दूर है घेवरा। ये दूरी घेवरा पहुँच कर ख़त्म नहीं होती, बल्कि जगह के फैलाव में कहीं छुप जाती है।

दक्षिणपुरी में अकसर घेवरा की बातें होती रहती हैं। एक पुनर्वास कलोनी के सामने जब शहर में होते विस्थापन या पुनर्वास की बातें आती हैं तो कई यादों की तस्वीरें उभरने लगती हैं। हर बीतता हुआ लम्हा बिताए लम्हों से मेल खाता है। उस समय शहर को देखने की अपनी जो नज़र थी, वो बयाँ होने लगती है। ख़ुद से एक नज़दीकी पा लेता है शहर में चलता तनाव।

ऐसे लम्हों में दक्षिणपुरी और घेवरा में शायद फ़र्क सिर्फ़ इतना रह जाता है कि दक्षिणपुरी समय के चलते अपना महत्त्व ज़िंदगियों में पा चुकी है, जबकि घेवरा ने अभी उस तरफ़ बढ़ना शुरू ही किया है।

"कहाँ ला के छोड़ा है, दिल्ली के कोने में, इतनी दूर!" जब कोई ये बोलता है तो लगता है जैसे रास्ते की इस दूरी ने एक अपार रूप ले लिया है। एक ऐसी दूरी जो दक्षिणपुरी से ही नहीं, बल्कि शहर की कल्पना से है।

किसी जगह में बसने के लिए पहुँचा दिए जाने पर लोग अपने साथ अपनी दूरियाँ भी ले आते हैं। इसी दूरी को तय करने से हर दिन की बुनाई शुरू होती है।
Related Entries:
आज की रात कहाँ? Jaanu Naagar
वो चेहरा अभी यहाँ बना नहीं, Shamsher Ali
 Permalink

ये आवाज़ें नहीं चाहिएँ, Lakhmi Kohli

आज हारमोनियम लिए बिजेन्दर भाई साहब नहीं थे, ना ही कबाड़ी वाले अकंल जी नज़र आ रहे थे।

“सरजी, आप नहीं गए?” अंदर जाते हुए एक पैनी आवाज़ ने रोका।

"कहाँ?”

"आज जन्तर-मन्तर पर रैली निकाल रहे हैं। पूरी बस्ती के आदमी गए हैं। वैसे रैली तो बच्चों की है। कह रहे थे पाँच तारीख को नांगला तोड़ दी जाएगी। पहले बोला था साल भर के लिए रुकेगी बस्ती! तो सब ने फ़ैंसला किया कि बच्चों से रैली निकलवाएँगे, स्कूल ड्रेस में, ताकि नागंला माँची रुक जाए।"

इतना कह कर वो वापस अपने बर्तनों की घिसाई में जुट गईं। अब तो जैसे बस्ती में घुसने का कोई तुक नहीं था। नांगला आज खाली था। ख़ुद को साधन मान कर सब रैली में जो चले गए थे, कि शायद कोई फ़ैंसला अपने हित में हो जाए।

कुछ लोग फिर भी दिख रहे थे।
Read whole post  Permalink

घेवरा से लौटने के बाद, Neelofar

घर में घुसते ही कुछ नज़र नहीं आता। मैं एक तरफ़ बैठ कर धीरे-धीरे चीज़ों के दिखने का, उनका ख़ुद से दोबारा परिचय बनाने का इंतज़ार करती हूँ। कभी तो माँ अपने काम में गुमी रहती हैं, और कभी रुक कर पूछती हैं, "आज बड़ी जल्दी वापस आ गई?"

मैं टॉयलेट से होकर, पानी पीकर लेट जाती हूँ। घेवरा में गुज़ारी सुबह दिमाग में घूमती है। आज के घेवरा से किसी कलोनी बनने तक का सफ़र छोटा तो लगता है, पर मैं तय नहीं कर पाती। लगता है माँ का पिछला समय है उस जगह में। बहुत पूछूँ, तो वो कहती हैं, "मुस्तुफ़ाबाद में अपने दिन कैसे दोहराऊँ? ना लाइट, ना बाज़ार; दूर–दूर घर, कच्ची मिट्टी की ज़मीन..."

घेवरा की जगह और शकरपुर से आगे बने बड़े-बड़े शॉपिंग मॉल, क्लब और सालों से चल रहा बड़ी-बड़ी जगहों का निर्माण हम से चुनौती भरा सवाल करता है, "इनमें आप कहाँ हैं?”
 Permalink

छ: औरतें, Neelofar

पहली औरत

घर की चौखट के बाहर एक बाल्टी में सर्फ़ के झाग में बहुत सारे रंग-बिरंगे कपड़े भीगे हैं। दूसरी बाल्टी साफ़ पानी से भरी, उसी के बराबर में रखी है। एक औरत जल्दी-जल्दी अपने गुलाबी सूट पर 'फूल' साबुन रगड़ रही हैं, जिस से झाग तो ज़्यादा नहीं बन रहा है। साबुन कपड़े के मैल से लड़ रहा है। अब वो उस पर जल्दी-जल्दी ब्रुश मार रही हैं।

उन के शरीर की यह कसरत उन की आवाज़ को कम कर रही है। वो बोलीं, "जल्दी से काम कर लूँ, फिर प्रीति को स्कूल से ले कर आना है।“ लेकिन अभी तो सिर्फ़ साढ़े दस बजे हैं। स्कूलों की छुट्टी तो बारह-एक बजे होती है। वो बोलीं, "हाँ छुट्टी तो साढ़े बारह पर होगी, पर उस से पहले मुझे सब्ज़ी बनानी है। छोटी बेटी को नहलाना है, और ख़ुद भी नहाना है। तब तक तो इतना टाईम हो ही जाएगा।"
Read whole post  Permalink
Next1-10/17