गलियों की गूँज
गलियाँ गूँज उठी किसी पर्व की तैय्यारी के लिए ये गूँज पूरे घेवरा के लिए थी छ: लड़के दाण्डिया की तरह गोला मार कर आवाज को और ही बुलंद कर रही थी जैसे गाँव मव दिवारी खेला जाता है। जिसमे सायरी भी करते है ।लाठियोंच को इस तरह आपस मे लड़ाते मानो एक दूशरे के दुशमन है ।पर एक दूसरे के शरीर को बचाते हुए सावंदा घेवरा के हर ब्लाँक हर गलियों मे जा धमकते पतली हल्की खुली गलियाँ गलियों मे गुजंती आवाजे तडा तड़ कड़क धिन्ना-कड़क धिन्ना धिन,चिनक चिनक छपाक-छपाक की ध्वनियों के साथ उछलते नवजवान आपस मे बहुत ही सुन्दर खेल खेला ।
हवां का झोका (घेवरा)
किसी ने अपने ऊपर पड़े साल को सभालते हुए कानो को छुपाते हुए कहा,''घेवरा की हवां घेर-घेर कर मारती है''। ये बोल उस जगह मे बोली जाने वाली आम भाषा बन गयी है।सभी कुछ ना कुछ कहने लगे।
घेवरा की ठण्डी हवा तन को कपाती है,
घेवरा की ठण्डी हवा मन को डराती है।
ठण्डी हवा के रास्ते बहुतेरे,
कभी इधर से आये कभी उधर से आये।
दूसरी रात
नीले आसमान में बिखरी स्वेत मोती अपनी स्वेत रोशनी को जमी मे गिरा रहे थे,चाँद किसी कारण वस आधा था,उस आधे शरीर पर स्वेत रोशनी का भाव था ।यह एक शहर का खाली कोना जिसमे लोगो के बसने का जोश कायम है। यह निवास स्थान अधिकत्तर चटाईयों के घरों से कुछ तो चमकीले पत्थरो की टाइलो से बने है। जिसमे आसमानी सफेद रोशनी अपनी चमक को जमाया हुआ था। बनी काली सड़के रोशनी में और काली दिख रही थी मिट्टी धूल से बनी गलियाँ नंगे पैरो को ठण्डक सा दे रही थ।
घेवरा की पहली रात
दिन यों ही भागदौड़ में गुजरा कि ये लाओ वो लाओ किसी से बात करने का फुरसत नही सामानो को एकत्रित करते -करते सांझ ने अपना कदम बढा ही दिया बढते सांझ को देख सूर्य सांझ के पीछे होकर अपने आपको गहराई मे छुपा लिया गलियो मे लगे खम्भो मे लटकती बल्ब की लरियो ने सफेद रोशनी फैला दिया । माहौल कुछ बिखरा-बिखरा चटाईयो के बने मकानो से झाँकती रोशनी अंधेरे की तरफ ,कच्ची गलियां खाली ज़मीन जिसमे उगी हरी घास भी अंधेरे से भरी पड़ी ।
किराया 20 रुपये....
जगह: सावदा घेवरा
तारीख:- 29/09/2007
दिन:- शनिवार
समय:- शाम 4:20
तमाम जगह घिर चूकी थी। अभी शाम के चार बज के पच्चीस मीनट ही हुये थे और बाजार को लगे केवल पच्चीस मीनट। बाजार सब्जियों और खिलौनो की दूकानो से भर चूका था। यहां पर सबसे ज्यादा बिकने वाली चीज़ सब्जी ही थी।
- सड़क के दोनो किनारे
सूर्य छिपने के पीछे अपनी लालिमा को इतना सिमेट लिया कि वो एक गोल लाल रंग का गोला बनकर आसमान मे ठहर सा गया हो कहां आसमान कहां पृथ्वी जो हर एक शाम,शाम रोशनियो से गाढी होती है कही दूर धूमने वाला भी अपने आसियाने की तरफ मुँह कर लेते है।चौडी सड़क के दोनो किनारो को साफ करती एक महिला सलवार कुर्ता पहन कर एक लम्ने बास को हाथ की मुठ्ठी पकड़ कर बास के नीचे हिस्से मे छलीरा सीक की झाड़ू बाँध कर जमीन मे रगडती जिसकी रगडन से सड़क के किनारे की घास फूंस मिट्टी के कडो को साफ करती हुई आगे की तरफ बढती जाती किसी जल्द बाजी के साथ नही सभी सौदागरो से चन्दा लेते हुए आगे-आगे चलकर आगे ही निकल गयी।

दो दिन 50 प्लाट.....
बाहर से ही देखकर पता चल जाता था कि अंदर पूरा बन गया है । कोई जगह बनने मे कितनी रफ्तार पकड़े रहती है यह यहाँ देखना कुछ ज्यादा मुश्किल नही था । नांगलडेरी बस्ती को यहाँ घेवरा आए हुए ज्यादा वक्त नही हुआ था । मगर घेवरा मे इनका नम्बर तेरहवां था,यानि कि Nब्लॉक। जो शुरुआत मे ही पड़ जाता । 12/12/2006 मे बस्ती को आये हुये 2 दिन ही हुये थे और लगभग 40 से 50 घरो को प्लाट काट भी दिये गये। ये जगह घेवडा मे कोइ नई पहचान
उनके घर में तीन चारपाइयाँ दिखाई देती हैं। एक चारपाई पर बैठी, सांवले से चेहरे वाली नूरजहाँ आपा, अपने आधे सफ़ेद बालों में, ऐनक की डोरी में अपनी सोने की बालियों को पिरोए, अपने किसी चमकीले बैग की चेन को खोलने में लगी थीं। बैग से दूसरा बैग निकला, पहले से ज़्यादा चमकीला और ख़ूबसूरत। उन्होंने दूसरे बैग की भी चेन खोली, तो उसमें तीसरा बैग छुपा था, दोनों से भी ख़ूबसूरत और नया। रंग भी एकदम ताज़ा था। ये देख कर होंठों पर मुस्कान फैल गई। उत्सुकता के साथ मैंने कहा, “अरे ये क्या! बैग के अंदर बैग! कितना सुंदर लग रहा है।"
वो बैग पर हाथ फेरते हुए बोलीं, "मेरी बेटी ने बना कर दिया है इन्हें, अपने चमकीले जोड़ों की कतरनों से बचा-बचा कर। मुझ से बोली, अम्मी अपना ख़ास-ख़ास सामान इसमें ही रखना।" ये बताते हुए वो बैग को प्यार से निहारने लगीं।
आज हमारी इनसे तीसरी मुलाक़ात है। जब भी आते हैं, अकेली ही पंखे से हवा करती हुई मिलती हैं और अपने परिवार के शख़्सों के बारे में बड़े प्यार से बतलाती रहती हैं। उस खुले घर में इतने शख़्स दिखाई पड़ते हैं कि मैं वहाँ समय का गुज़रना ही भूल जाती हूँ। ख़्याल आता है एक भरे-पूरे परिवार का, जो शाम होते-होते आएगा और तीनों चारपाइयाँ दिन भर की कहानियों से लद जाएँगी। रोज़ के क़िस्से उनकी ज़ुबान पर हर मुलाक़ात में आते रहते हैं।
बातों ही बातों में मैंने उनसे पूछ लिया, "कितने बच्चे हैं आपके?” इस सवाल की शायद उन्हें उम्मीद न थी। कुछ देर तक वो ऐसे ही मुझे देखती रहीं। फिर बोलीं, "ना बेटी, मेरी कोई औलाद नहीं। तीस साल हो गए मेरी शादी को।" ये कह कर वो पास रखी थैली में से घी को डिब्बे में डालने लगीं। बोलीं, "अभी खुला है ना सब, धीरे-धीरे बसेगा। अभी तो कुत्ते कहीं से भी घुस कर घी की थैलियाँ घसीट ले जाते हैं।"
"ऐसा लग ही ना रहा कि तुम कहीं और से आई हो। तुम तो यहीं की लग रही हो!"
उनकी इस लाईन ने यशोदा और मेरी इस जगह पर पहले दिन की हिचकिचाहट को दूर कर दिया। मुस्कुरा कर हम उनकी चरपाई के पास बिछी दूसरी चारपाई पर बैठ गए।
नूरजहाँ बाजी लक्ष्मी नगर ठोकर नंबर-8 में चालीस गज़ मकान ख़रीद कर पंद्रह साल से रह रही थीं। अब वहाँ से यहाँ उन्हें अठारह गज़ ज़मीन दी गई। अभी वो अठारह गज़ बल्लियों के साँचे में नहीं ढला। आसपास ज़्यादा लोग नहीं आए, इसलिए नूरजहाँ बाजी का यहाँ दिल नहीं लग रहा है। "पर उससे क्या, मैं किसी न किसी तरह लोगों के बीच जगह ढूँढ कर रहती हूँ यहाँ।"
जगह अनेक शब्दों से बुनी होती है। बुनी हुई चटाई में से कोई एक लट निकाल दें, तो चटाई कमज़ोर नहीं होती। पर उस निकली हुई लट का पता साफ़ मालूम पड़ता है। ठीक ऐसा ही किन्हीं शब्दों के निकल जाने से लगता है।
अकसर किसी बसेरे में जहाँ चार लोग बात करते हुए दिखते हैं, अपने आप समझ बनती है कि टाइम-पास कर रहे हैं। पर घेवरा में टाईम-पास, बोर होना जैसे अल्फ़ाज़ ने अभी अपने पैर नहीं जमाए हैं। चार लोगों का एक साथ दिखना कुछ गंभीर बातचीत का संकेत देता है। ऐसे गुट को देखते ही आसपास गुज़रने वाले बेझिझक थोड़ी दूर या पास हो कर उसमें शामिल होने की कोशिश करते हैं।
समाज हमें एक-दूसरे से मिलवाता है, तो समाज ही हम से सवाल भी करता है। देर रात बाहर क्या कर रहे थे? उन लड़कों की संगत में क्यों हो? इस तरह के कई सवाल वक़्त-बे-वक़्त हमारे आसपास घूमते हैं, हमें हिदायतें देते हैं। वो चेहरा किस का है, जो ये सवाल कर रहा है? ये चेहरा साफ़ हमारे सामने नहीं आता। मन में ख़ुद-ब-ख़ुद आने लगता है कि रात बारह बजे हमें बाहर नहीं रहना चाहिए। हिदायतें हम में समा जाती हैं। हम में निखरने लगती हैं; हम उस धुंधले चेहरे का आकार बनने लगते हैं। ख़ुद से बहस चलती रहती है।
घेवरा अपनी प्रक्रिया में आज आवारगी शब्द को बेदखल किए हुए है। कोई खाली घूमता हुआ नहीं लगता और ना ही कोई बुज़ुर्ग किसी नौजवान को "आवारा" नाम से पुकारता है।
किसी की झिड़क में भी समय की लम्बी गूँज साफ़ समझ में आती है। आवारगी के लिए जगह को अपने पुराने समय में जाना, उसको बनाना होगा। कई बातों को भूलना और ढ़ेरों को याद में लाना होगा।
आख़िर जगह के समय से शब्द बँधे हैं; शब्द से जगह और उसका समय नहीं।