ये ख़ुद को यहाँ का प्रधान कहते हैं। धोती-कुर्ती, सर पर टोपी जिसकी आगे की नोक थी। वो बोला, “सुन। यहाँ पहले चारों तरफ़ पानी ही पानी था। हम ने मिट्टी भर-भर के भरवाई।जो छोड़ दिया, वो आज यमुना नदी है। उस नदी के साथ-साथ एक बस्ती है, जिस के अंदर तीन आकार हैं - मतलब तीन बसेरे हैं। इन को मिलाकर नाम दिया जाता है, नांगला माँछी।"
एक अठाईस साल का शख़्स जिस के बाल 'तेरे नाम' के सलमान खान जैसे हैं। उस ने सफ़ेद पैंट और काली शर्ट पहनी थी, जिस पर चमकते मोती लगे थे। वो बोला, “यार, यहाँ पहले दलदल ही दलदल था, जिसे तीन-चार लोगों ने भरा। मैं भी इन में से एक था, हालांकि तब मैं छोटा सा था। दलदल ख़त्म होते ही घर बनते चले गए।"
इन का चेहरा मुर्झाया सा था। इन्होंने धोती पहनी हुई थी, हाथ में एक लकड़ी थी, जैसे ज़िंदगी को अपनी मुठ्ठी में पकड़ रखा है। उन दादा ने कहा, “बैठ जा और सुन। आज जहाँ नांगला है, वहाँ एक घना जंगल था। इस में साँप, बंदर, शेर जैसे जानवर थे। कुछ लोगों ने जंगल काट काट के लकड़ी की झोंपड़ियाँ बनाईं, और आज ये एक बस्ती का रूप ले चुका है।
मैं एक शख़्स से मिला जिस ने नीली पैंट, सफ़ेद शर्ट पहनी थी। उस की अजय देवगन जैसी छोटी-छोटी आँखें थीं। वो बोला, “नांगला माँछी से ले कर प्रगति मैदान तक खुला मैदान था। एक ऐसा मैदान जिस में राजाओं को दूर से आते देख लोग विद्रोह में युद्ध का आदेश दे देते थे। ये मैदान ही बना रहा। इस मैदान में कई आविश्कार हुए, जिस का एक रूप बना नांगला माँछी।
मणिलाल अपनी बेटी मीनू का दाखिला कराने शेरशाह स्कूल पहुँचे। मैडम ने पूछा, “कहाँ रहते हो?”
“नांगलामाँची में,” उन्होंने जवाब दिया।
“ये कहाँ है?”
"प्रगति मैदान के पास जो सड़क नौएडा की तरफ़ जाती है, उसी सड़क पर प्रगति मैदान की लाल बत्ती क्रॉस कर के,” वो बोले।
“अच्छा वहाँ, जहाँ पहले कुछ दलदल और झाड़ियाँ थीं? जो झील जैसे बना है? पर वहाँ तो कुछ नहीं है।" टीचर कुछ याद करने की कोशिश करते हुए बोलीं।
“पर अब है, मैडमजी,” मणिलाल बोले।