वो चेहरा अभी यहाँ बना नहीं, Shamsher Ali
जगह अनेक शब्दों से बुनी होती है। बुनी हुई चटाई में से कोई एक लट निकाल दें, तो चटाई कमज़ोर नहीं होती। पर उस निकली हुई लट का पता साफ़ मालूम पड़ता है। ठीक ऐसा ही किन्हीं शब्दों के निकल जाने से लगता है।
अकसर किसी बसेरे में जहाँ चार लोग बात करते हुए दिखते हैं, अपने आप समझ बनती है कि टाइम-पास कर रहे हैं। पर घेवरा में टाईम-पास, बोर होना जैसे अल्फ़ाज़ ने अभी अपने पैर नहीं जमाए हैं। चार लोगों का एक साथ दिखना कुछ गंभीर बातचीत का संकेत देता है। ऐसे गुट को देखते ही आसपास गुज़रने वाले बेझिझक थोड़ी दूर या पास हो कर उसमें शामिल होने की कोशिश करते हैं।
समाज हमें एक-दूसरे से मिलवाता है, तो समाज ही हम से सवाल भी करता है। देर रात बाहर क्या कर रहे थे? उन लड़कों की संगत में क्यों हो? इस तरह के कई सवाल वक़्त-बे-वक़्त हमारे आसपास घूमते हैं, हमें हिदायतें देते हैं। वो चेहरा किस का है, जो ये सवाल कर रहा है? ये चेहरा साफ़ हमारे सामने नहीं आता। मन में ख़ुद-ब-ख़ुद आने लगता है कि रात बारह बजे हमें बाहर नहीं रहना चाहिए। हिदायतें हम में समा जाती हैं। हम में निखरने लगती हैं; हम उस धुंधले चेहरे का आकार बनने लगते हैं। ख़ुद से बहस चलती रहती है।
घेवरा अपनी प्रक्रिया में आज आवारगी शब्द को बेदखल किए हुए है। कोई खाली घूमता हुआ नहीं लगता और ना ही कोई बुज़ुर्ग किसी नौजवान को "आवारा" नाम से पुकारता है।
किसी की झिड़क में भी समय की लम्बी गूँज साफ़ समझ में आती है। आवारगी के लिए जगह को अपने पुराने समय में जाना, उसको बनाना होगा। कई बातों को भूलना और ढ़ेरों को याद में लाना होगा।
आख़िर जगह के समय से शब्द बँधे हैं; शब्द से जगह और उसका समय नहीं।
अकसर किसी बसेरे में जहाँ चार लोग बात करते हुए दिखते हैं, अपने आप समझ बनती है कि टाइम-पास कर रहे हैं। पर घेवरा में टाईम-पास, बोर होना जैसे अल्फ़ाज़ ने अभी अपने पैर नहीं जमाए हैं। चार लोगों का एक साथ दिखना कुछ गंभीर बातचीत का संकेत देता है। ऐसे गुट को देखते ही आसपास गुज़रने वाले बेझिझक थोड़ी दूर या पास हो कर उसमें शामिल होने की कोशिश करते हैं।
समाज हमें एक-दूसरे से मिलवाता है, तो समाज ही हम से सवाल भी करता है। देर रात बाहर क्या कर रहे थे? उन लड़कों की संगत में क्यों हो? इस तरह के कई सवाल वक़्त-बे-वक़्त हमारे आसपास घूमते हैं, हमें हिदायतें देते हैं। वो चेहरा किस का है, जो ये सवाल कर रहा है? ये चेहरा साफ़ हमारे सामने नहीं आता। मन में ख़ुद-ब-ख़ुद आने लगता है कि रात बारह बजे हमें बाहर नहीं रहना चाहिए। हिदायतें हम में समा जाती हैं। हम में निखरने लगती हैं; हम उस धुंधले चेहरे का आकार बनने लगते हैं। ख़ुद से बहस चलती रहती है।
घेवरा अपनी प्रक्रिया में आज आवारगी शब्द को बेदखल किए हुए है। कोई खाली घूमता हुआ नहीं लगता और ना ही कोई बुज़ुर्ग किसी नौजवान को "आवारा" नाम से पुकारता है।
किसी की झिड़क में भी समय की लम्बी गूँज साफ़ समझ में आती है। आवारगी के लिए जगह को अपने पुराने समय में जाना, उसको बनाना होगा। कई बातों को भूलना और ढ़ेरों को याद में लाना होगा।
आख़िर जगह के समय से शब्द बँधे हैं; शब्द से जगह और उसका समय नहीं।
