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बस्ती शहर जाती हैं।

रिक्शे का चक्का अपनी धुरी पर नाचता। जितनी बार मकैनिक रिंच से बोल्ट को कस कर पहिये पर हाथ मारता चक्का घूम जाता। चक्का को घूमता देख कर ऐसा लगता मानो पूरी बस्ती झिलमिलाती हुई अपनी  स्थिर जगह पर परिक्रमा कर रही हो। पास खड़े रिक्शे पर बनी चौड़ी शीट पर पूरा पीठ टीका लेने के बाद बाकी का आधा शरीर हवा में झूल रहा था। सर गर्दन के साथ सीने पर सिमट आया था। गले मे पड़ा गमछा रिक्शे के नीचे वाली बाड़ी को छु रहा था।

जरा इधर देखना यह एक लड़की की आवाज़ थी। स्कूल की दीवार पर बने छेद से थी। उस छेद तक पहुँचने के लिए कई बार इधर-उधर नजरों को दौड़ना पड़ा, लेकिन समझ मे न आने की वजह से वह  चौक की तरफ खिच गए। स्कूल की दीवार मे बने छेद से आती आवाज को छोला भटूरा वाला अपना हाथ और आँख उसी मोकवे के तरफ कर गड़ा कर पूछते बेटा क्या चाहिए? मोकवे के अंदर हाथ जाता पैसा बाहर आता समान अन्दर चला जाता इस तरह की आवाज़ कुछ-कुछ पल मे आती जाती रहती। आने जाने वाले चकित पर छोला भटूरा वाला नही।

फुहारे से नहाती ईटे जिसका पानी रिस-रिस कर धूरियाई मिट्टी को नमी की तरफ ले जाती। उस पानी की छिटकन को जीभ निकाल कर एक सात आठ साल का लड़का मजे ले रहा था। फटे सलेन्सर की धू-धड़ाम की आवाज़ बीच-बीच में कानो को खटक जाती। शल्लू भाई मकेनिक होने की वजह से वो अपने अनुभव से बाईक को चेक कर रहे थे कि किस कमी को बाईक जी रही हैं। सरकारी डिस्पेन्सरी के डाक्टर एक मरीज की कलाई को थम कर नब्ज़ का पता लगा रहे थे कि कितनी बार धडक रही हैं। बगल वाले कमरे मे दावा लेने वालों की लाईन लगी पड़ी हैं।

चाय की चुस्की मारते डी.टी.सी बस ड्राईवर व परिचालक दोनों लकड़ी की बनी पतली सी बेंच पर बैठ कर अपनी डिऊटी की शुरुवात कुछ इस तरह करते हैं।गोपाल पराठा चौक की रौनक को बरकरार रखा हैं। कई महीनो से उनके बेटे बहू इस कम को सभाल रहे हैं यही मान लो की उनका पूरा परिवार इसी कम में ब्यस्त हैं। बगल मे साईकिल की दुकान से कभी हवा का प्रेशर सुनाई पढ़ता तो कही बाइकों की भर्र-भुर्र, चाय की दुकान में केतली की उठा पटक के साथ गिलास की खनक बनी रहती।

दो स्कूलो के में बीच मे नांगलोई और कंझवाला डिपो से बसे आ जाती जो दोनों स्कूलो की पढ़ाई का आनन्द लेती। चाय की दुकान में बस्ती से आई नई नवेली सवारी आकार पूछती बस कहा जाएगी चाय वाले उधर की तरफ इसरा करते जिधर एक लकड़ी का खोका। जिसके अंदर एक ब्यक्ति अपनी रोजाना वाली वर्दी को पहन कर उसी खोके मे, बस की सीटो का सोफा जिसमे बिराजमान होकर हर आने जाने वाली बस के अलावा बस मे आने वाले ड्राइवर व परिचालक का नम्बर लिख लेते ताकी पता चल जाए की बस बस्ती को शहर ले जाने के लिए आई थी।

दोपहरी पलट चुकी थी। स्कूल शान्त महोल को जीने लगे। छात्र छात्राओं की आवाज़े गायब थी, चौराहा सूनेपन के लिए मोहताज़ नही, वो तो हर पल को, एक नए अंदाज के साथ जीता।आने जाने वाले कितना भी आगबबूला हो फिर भी जाएंगे कहा से, वही से तो चौराहा अकेला कैसे रह सकता हैं? गर्मी की तपन में भी बस्ती शहर जाने के लिए तैयार रहती बस इन्तजार होता तो बस के आने का।बस आ गईं जो आज पहले दिन ही चौक की साथी बनी एसी बस जिसका रंग लाल काले शीशा पीछे के सलेंशर से बूंद-बूंद पानी रिस्ता न जाने क्यो?

आज पहली बार ऐसा नज़ारा आंखो के सामने से गुजर रहा था कि उस बस ने बस्ती का सारा का सारा अक्स छीन लिया हो। स्कूल तो पूरा का पूरा उस पर सवार हो चुका था। इसके साथ ए ब्लॉक व बी ब्लॉक भी अपना पूरा का पूरा अक्स ले कर स्कूल को चीर कर शामिल हो गया था। बस के दरवाजे बंद हो जाने के बाद भी यह सब उसके अंदर कैसे पहुँचे? यह सवाल कुछ पल के लिए बना पर ये सवाल था ही नही बस ओस की बूंद की तरह खिलकर बिखरने वाला सोच था।

बस के अगले हिस्से वाला दरवाज़ खुला, जिसने खोला वो सब वही थे जो गोपाल जी की बगल वाली दुकान पर चाय की चुस्की ले रहे थे। बाद मे प्रेसर से पीछला गेट भी खुला। परिचालक अपने काले से बैग के साथ चढ़ते हुए आवाज दिया आ जवों रे आनन्द विहार वाले। सवारी दौड़ती हुई चढ़ गईं बस कुछ खाली तो कुछ भरी उसका घर्रा कर चलना, उसके साथ बस्ती को जाते हुए पहली बार देखा था। वह जिसके सामने से गुजरती उन सबको शहर की तरफ ले जा रही थी शायद इसी तरह रोजाना ले जाएगी।

इस दृश्य को देख कर ख्याल बना कि आज से पाँच साल पहले खेत से उड़ती धूल, हसती हुई हरी घास, ककरीली कच्ची सड़क। बिजली पानी से अछूती जगह, दुकानों के अभाव को जीती हुई जगह बस्ती बनी, बस्ती बनने के बाद अब इसका अक्स बिलकुल शहर की तरह, अपनी रूप सज्जा को बनती जा रही हैं। इस तरह के मनोभाव को समझने लगा तो पता चला कि बस्ती बस से शहर जा रही हैं या बस्ती शहर की तरह बनती जा रही हैं।

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Comments (1)  Permalink

comments

saif ali @ 07.10.2013 12:12 CEST
Wah bhaiya kyaa likha hai
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