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इंसानियत, Jaanu Nagar


किसी से मिलने जाना था। किसी का इन्तजार था,कि वो आए हम जाए।वो आ गए पर ना जाने क्यों वो इतना लेट क्यों आए? पूछना चाहा पर पूछ ना पाया।क्योकि मुझे भी किसी से मिलने जाना था। उनकें आते ही दो चार मीठी-मीठी बातें किया। चाभी के गुच्छें को नचाते हुए स्टूल पर रख कर उन्हे छोड़ने चला गया। कुछ देर बाद वापस आया तो देखा की,पापा निकल चुके थे।उनकी रोज की रूपानी चप्पले खाली पन को दोहरा रही थी।पानी से भींगे उनके कदमों के निशानों को अभी फर्श ने सोखा नही था।तौलियाँ नमी को लिए कमरे की खिड़की पर पड़ी पंखे की हवा में हिल रही थी। चूल्हे के पास रखी जूठी थाली में रखा पानी भी हिलकोरे मार रहा था। उनका तहमत चारपाई पर योहि पड़ा था। जिसमे जूठन के चावल के दो चार सीत दिख रहे थे। तहमत को हलियाते हुए दूसरी चारपाई पर रख दिया।


कमरे के आस-पास से टी.वी चलने की आवाज़ जिसमे से किसी से फिल्मी गानों की धुन तो किसी से भक्ती गानों की धुन बह रही थी। तो किसी से सुबह के समाचारों की आवाज़ थी। सामने नल के बगल मे शनी शरीर पर साबुन लगा कर बाल्टी मे पड़ें डिब्बे को खोजता जिससे वह ऊपर लगे साबुन को पानी से धो सके। दूसरे कमरे से टी.वी की आवाज कम हुई।आवाज़ दिया जरा मेरी गेहूँ की गठरी लेते जाना उसको चक्की में पीसने के लिए डाल देना। इतना कहती हुई वह आपने कमरे से बाहर आ चुकी थी।उनकी गोद मे एक 18 माह का बच्चा कुछ मांग रहा था। वह उसको पुचकाती हुई बोली ले जाओगें ना मेरी गठरी।
मज़ाकिए अन्दाज़ मे कहा अपनी गठरी बगल वाले के यहा से पीसवा लो ना अभी कल ही तो चक्की लगाया है। दूसरी उनकी सहेली भी कहने लगी कि अभी कल ही तो अपने गेहूँ पिसवाया है। चलो मै पिसवा देती हूँ। फिर से वह बोली ले जाओगें ना मेरी गठरी। ना जाने क्यों ऐसा लग रहा था,कि कमरे से बाहर कही ना जाऊ पर बिना जाए कम कैसे बनेगा काम तो करना ही है।
अब तक हम और उनके पति दोनो ही नहा चुके थे तौलिया से पानी पोछ रहे थे शरीर का। वह अपने कमरे से दो अगरबत्ती लेकर अपने थ्री विलर मे जलाने चले गए।मै अपने में खाना खाने लगा। जब तक मै खाना खाता तब तक वह चाय नास्ता करके अपनी गठरी के साथ थ्री विलर मे बैठ कर अपनी पत्नी के साथ कुछ परिवारिक बातें करने मे लगे पड़े थे। मै भी अपने कमरे मे ताला मार कर साइकिल को लेकर बाहर निकला बाहर निकलते ही पूछा कहा गई गठरी आप की तो वह बोल पड़ी आप तो ले जाओगे नही।इस बात को सुनकर बोला की आप तो नाराज हो गई नही का जवाब देते हुए उनके पति ने कहा कि यार मुझे दूसरी तरफ जाना है तुम्हे तो उधर ही जाना है। आप तो मज़ाक को सच मान बैठें। लाओ अपनी गठरी मेरी साइकिल के कैरियल पर रख दो आलोक अर्थात उनके पति ने हमारी कैरियल पत गठरी रख दिया। मुस्क्राते हुए अपनी जेब से पन्द्रह रूपाया निकाल कर मुझे पकड़ा दिया और कहने लगे कि जितना लगे ऊतना लगा देना फिर घर पर आकर ले लेना। शाम को ध्यान लगा कर लेते आना घर पर आटा नही मै तो रात को आता हूँ तुम्हे तो पता ही है। यार आप ने तो वही हाल कर दिया कि हाथ अगर थाम लिया है तो जिन्दगी भर निभाना। ये तो यार कभी-कभी होता है। और भी कुछ बातें वही पर छूट गई। सिर्फ साइकिल और मैं।
साइकिल चलाते वक्त ना जाने क्यों मुझे डर लग रहा था आज? पहले ऐसा ख्याल मन में भी नही आया था। अपनी पुरानी अदा के साथ किसी एक पुराने गीत को गुनगुनाता हुआ चल पड़ा। सड़क पक्की थी।सड़क के अगल बगल खड़े बिलायती किकर के पेड़ जिनकी छाया को आपनी साइकिल से रौंदता हुआ आगे ही आगे बढता जा रहा था। साइकिल की कैरियल पर रखी गठरी को बार-बार टटोता जात कही गिर ना जाए। कार बसे ट्रक मोटर साइकिले हल्की हवं दे कर निकल जाती उनकी हल्की हवां में मै भी खिचता चला जाता फिर से वही पुरानी स्पीट आ जाती। सड़क से गुजर रही एक दो साइकिलों को मैने भी पीछे किया।
सड़क छोड़ गली मे आ गया।एक बाद दूसरी गली के ओ ब्लाँक में लगी चक्की वाले कमरे के पास खड़ा होकर आवाज़ दिया ऊपर से आवाज़ जो किसी महिला की थी।वह आवाज़ ऊपर की ऊपर रह गई। अधखुले दरवाजे को पूरा खोलते हुए एक सावलव रंग वाले भाई साहब जो आपने हाथ मे हिसाब किताब वाली कापी को पकड़े हुए कहा कि गठरी को तराजू पर रख दो उनकी आँखे भी पानी से धूली हुई थी। तराजू एक पलरे पर बाट जो नीचे जिसमे कुछ नही वह पलरा ऊपर ही हवा मे झूल रहा था। झूलते पलरे में गेहूँ की गठरी को रख दिया अभी गठरी वाला पलरा हवां मे ही टिका था।वह अपनी कापी को दरवाजे के पास रख दिया। तराजू मे बाटों को सही से रखने लगे दरवाजे के पास रखी कापी जिसमे अखबारी पेपर जिमे किसी हिरो की फोटों जो सफेद आटे की छुअन से मटमैला सा लगा रहा था। वह तराजू के दोनो पलरों को बाराबर करते हुए बोले कि जी आपकी गठरी का वजन तेरह किलो सात सौ पचास ग्राम है। बोले क्या नाम लिखे दरवाजे के पास से कापी को उठाते हुए? जी आलोक प्रशाद लिख दो शाम तक तो पीस जाएगा ना।वह हा मे गर्दन हिलाते हुए दरवाजों को अधखुली अवस्था में छोड़कर सायद ऊपर वाली आवाज के पास गए होगे जो मुझे पहले ही सुनने को मिली थी। इधर मै अपनी साइकिल को स्टैण्ड से हटाता हुआ अपने थैलों को कैरियल में रख के वहा से चलता बना।
कई ब्लाँकों को पार करता हुआ। सीधे-सीधे बिना किसी मिले जुले बिना किसी से कुछ बात किए डी 157 का ताला खोलकर साइकिल को आर्काइव की दिवार पर टिका कर आवाज़ दिया उनको जो इस कमरे की सफाई करती है। वह अपने विक्लांग बच्चे को दूध रोटी खिला रही थी। उन्होने थोडी देर मे आने का इशारा किया। अभी आई। थोड़ा रूकना उनका इशारा समझ हा में गर्दन हिला दिया। अपनी पैण्ट की मोहरी सही कर प्रेस वाली क्रीच से मिलकर देखने लगा।साथ में लगी मिट्टी को हलियाने में लग गया। दरवाजा खोला कमरा उसी तरिके का था,जिस तरह शनिवार को छोड़कर गए थे। छुट्टी एक दिन बाद भी कमरा उसी तरह से पड़ा था।
सफाई करने के लिए वह आ गई।जो पहले विक्लांग बच्चे को दूध रोटी खिला रही थी।इनका शरीर पतला दुबला आवाज़ में हल्का पन बदन कमजोर सा पर नही वह काम एक हष्टपुष्ट महिला की ही तरह वह बड़े-बड़े पीपों से ही पानी भरती है जब टैंक्कर आता है। वह कमरे के अन्दर जा कर रोज की तरह फूल वाला झाडू उठाया झाड़ू उठा कर साफ सफाई किया। पोछा मारा पोछा मार कर अपने घर से पानी लाकर पीने वाले मटके मे पानी भी भर दिया।निकले कूड़े को प्लास्टिक की पालीथीन मे भर कर खत्ते की तरफ फेक कर वापस आकर कहा काम हो गया ना।
मन तो और ही कही था उनकी बात पर गौर नही किया ना ही जवाब दिया।मन मे खटास सी की कही आज मेरे साथ कुछ होने वाला है।आँखो के सामने चिलमिलाता सा अंधेरा जो मुझे कुछ समझाने की कोसिस कर रहा था।पर सोच में था कि आज ही पापा काम निपटाना है नही तो कल पहली तारिख हो जाएगी लेकिन आज तो महिना का आखरी दिन था। बैंकों मे तो आज आधा दिन ही काम होगा। चल मंगल को जमा कर दूँगा बोलकर मन मे एक तसल्ली सी दिया। इस उधेड़ बुन मे पंखा चला ही नही था जब पंखा चलाने की बटन दबाय तो एसा लगा की लाईट ही नही ।चलो आ ही जाएगी पर काफी समय हो चला था बिजली झपक तक नही मारा । बिजली तो आई नही पर मेरा दोस्त अपनी मोटर साइकिल से दरवाजे के पास आकर रूक गया सर से हैलमेट को ऊतारते हुए बोले जनाब क्या हाल है? जनाब हाल तो ठीक है।पर बिजली ने तो सुबह से ही नखड़ करके रखा है। फिर मन में एक अजीब सी हलचल हुई आज कुछ होने वाला है। वही चिलमिलाहट आँखो के आगे से होकर वापस हो गई कोई भी काम करने का मन ही ना करता।
ख्याल घर का आया कि घर पर तो कुछ नही हुआ।इस बेचैनी को समझ कर फोन उठा कर देखा कि नेटवर्क ही नही अब तक दोस्त कमरे मे हैलमेट को रख बोला जी सुबह से लाईट नही है पता है क्यों? नही का जवाब देते हुए बोला यहा आपने को मालूम नही की क्या हुआ तो लाईट का क्या हम बताए जहा आप वही हम?वह अपने पीठ पर चढे बैग को ऊतार चुके थे।साथ ही मेरे बगल मे बैठ गए आज यार वो नही आया बोल रहा था कि लेट हो सकती है।
सलाह लेते हुए कहा कि अभी एक काम करके कंझावला से वापस आता हूँ। फिर वही ख्याल जिसका गला मै पहले घोट चुका था।कि साइकिल से जाऊ या मोटर साइकिल से अन्दर की आवाज ने कहा कि बस से चल यार पर वक्त की चाहत ने मुझे मोटर साइकिल के लिए उत्साहित कर दिया। फिर दस पाच कदम पैदल चलकर वापस आ गया। दोस्त से चाभी मांगा और मोटर साइकिल से चल पड़ा चलते समय फिर से पूरा शरीर कपकपा सा गया।पर काम तो करना ही था।
आखिर कार निकल ही पड़ा कुछ दूर ही चला था।कि उसी जगह मे रहने वाले दोस्तों आवाज दिया रूकना जरा हमे भी घेवरा गाँव तक लेते चलो। मन बोला रूकू या जाऊ पर गाडी बहुत ही धीमी थी। उनकी आवाज को झुठला ना सका।मेरे रूकते ही दोनो मेरे पीछे खाली पड़ी जगह पर बैठ गए। बैठते ही कहा कि चलो पर चलने से पहले एक बार फिर पूछा चलू। अभी उन दोनो के चेहरे से आंजान था। जिसने मुझे चलने के लिए कहा था। गैर डाल कर चल पड़ा कम से कम दो सौ मीटर ही गाड़ी चल पाई की देखा दो आठ नौ साल के स्कूली बच्चे रास्ते मे मस्ती करते हुए जा रहे थे। मेरी गाड़ी उनके पास से गुजरने ही वाली थी ।स्कूली बच्चों मे से एक बच्चा गाड़ी के बीच वाले हिस्से मे आपना बैग सटा दिया पीट्ठू बैग होने की वजह से वह ककरीली सड़क पर मुह के बल गिर गया उसके गिरते ही गाडी को एक दम से रोक कर उसको उठाया तो देखा कि उसका नीचला ओठ पैर के गुठने छिले नजर आए जिस जगह वह गिरा उसकी बाई तरफ बंगाली क्लीनीक की दुकान थी। उसको हड़बड़ा हट के साथ लेकर पहुँच गया गाडी उसी जगह पर खडी थी बंगाली डाँ. ने रूई को मुँह पर लगाते हुए बोला की इसके तो दो दाँत टूँट गए है। इसको राणा के पास ले जाओं।
अब तक मुझे दस बीस लोगो ने घेर लिया और पूछा किसकी गाड़ी है। हिम्मत रखते हुए बोला मेरी गाड़ी है। इतना ही कहना हुआ कि किसी ने आवाज दिया मारो-मारो देख कर नही चलता है। लेकिन जो भी मेरे पास आता वह मुझे देकर एकदम से रूक जाता मेरे ऊपर हाथ चलाने की हिम्मत किसी ना हुई अधिक्तर लोग मुझे जानते थे। फिर किसी ने कहा भी की इनकी गल्ती नही है। यही इंसानियत देखो की भागे नही रोक कर बच्चे को क्लीनिक लाए है। गल्ती तो बच्चे की थी। इस बात को सुनकर बच्चे के पीता नही कहा कि मानता हूँ। बच्चे की गलती है।पर गल्ती तो दोनो लगो की मानी जाती है। बच्चा तो होता है गल्ती तो इन्ही की मानी जाएगी। डाँ. ने कहा की इसकी मलहम पट्टी राणा के करा दो जाके मुझसे नही होगा इसके टाँका लगेगें। आप भी अपने है बच्चा भी अपना है। उस समय यह अपने पन वाली भाषा का वजन मेरे लिए बहुत बड़ा लगा।
दूबारा से मोटर साइकिल को स्ट्राट किया और राणा पोली क्लीनिक की तरफ चलने को किया। अब इस समय मै बच्चा, बच्चा का पापा भी बैठे थे।कि इतने में दो चार जवान लड़के मुझे मारने का प्रयास किया पर वो भी विफल रहे बच्चे के पापा ने कहा कि बच्चा मेरा है। आप क्यों परेशान हो रहे हो।आप चलो भई देर ना लगी पाँच मिनट में ही राणा पोली क्लनिक पहुँच गया। राणा जी ने कहा बच्चे की हालत को देखते हुए पहले आप पुलिस को बुलाओ इस बात को सुनकर मैने डाँ. से कहा कि आप इलाज करों हमारा यह आपस का मामला है। तो डाँ. ने कहा ठीक है।राणा बच्चे के पापा को बुला कर क्या कहा क्या नही कहा  इस से बेखबर था मै?
मन मे एक डर सा बैठने लगा कि चलो यार दोस्त को भी बुला लेता हूँ।दोस्त को फोन किया दोस्त भी तनिक देर ना लगाया वह भी मुझे से मिलने राणा क्लीनिक मे पहुँचते ही पूछा कि ज्यादा चोट लग गई है क्या? ना मे गर्दन हिलाते हुए कहा देखो वह अन्दर बेड में लेटा हुआ है। वह भी थोड़ा सा परेशान दिखा  पर उसको देख कर वापस मेरे पास आकर पूछा यह कैसे हो गया मैने तो चोचा की कही किसी पुलिस वाले ने तो नही रूकवा लिया।
टेट मेंट के बाद पता चला की बच्चे का नाम शिवम, पापा का नाम संदीप है। यह एन ब्लाँक मे रहते है। वह मेरे पास आकर कहने लगा कि भाई डाँ. तो बारह हजार का खर्चा बता रहा है। अब से बाद तक का। ठीक है इलाज तो होने दो देख भाई हम तो गरीब आदमी है। हमारी तो यही इंसानियत देखो कि हमने पुलिस मे कम्पलेन नही किया है। ये मेरी इंनासनियत देख ले भाई।अभी हम दोनो दोस्त चुप उसी की बात सुन रहे थे। वह किसी को बुलाता तो किसी को फोन करके कहता की यार बच्चे का एक्सीडेन्ट हो गया है। हम दोनों के फोन बन्द पर उसके फोन पर फोन आए जा रहे थे। लेकिन बोल कैसे रहा था कि हम तो गरीब आदमी है। ये बात हम दोनों दोस्तो ने आपस किया।
वह गरीबी वाली भाषा को ऊपर ही ऊपर लेते जा रहा था। डाँ. ने आवाज़ दिया शिवम की दवा लाना संदीप मेरे पास पर्चा लेकर आ गया।भाई ये लो पर्चा।पर्चा लेकर बगल के मेडिकल स्टोर में गया दवा लिया जो पर्चे में लिखी थी। दवा का दाम 190 रूपए 200रूपए देकर दवा लिया बाकी का दस रूपया वापस कर दिया। मै किसी दोस्त बात करने लगा तभी वह फिर से पाचास रूपए की दवा लिया दोस्त ने बताया की जारा पचास रूपए देना और दवा लिया है। फिर से दवा का पचास रूपया दिया।
डाँ. ने फिर आवाज दिया शिवन के साथ कौन है।संदीप डाँ.के पास आकर बोला डाँ. साहब बुला रहे है।डाँ. के पास जाकर बोला हाँ सर कितना हुआ तो वह बोले कुल पाँच सौ रूपए। थोडा सा सोचा डाँ. भी मेरे सामय का फायदा उठा रहा है। शायद आज मेरी ही गरज थी डाँ. भी हमसे खेलने मे तनिक ना शर्माया चलो हमसे अपनी फीस सौ ले लेता दो सौ ले लेता वह तो पूरा का पूरा हमी से ले लिया।इंसानियत के नाम पर। शायद मै ही उसका आज का पहला ग्राहक था।
बच्चे को घर ले जाने के लिए मुझे ही रिक्शा लाना पड़ा। आज रिक्शा वाला भी नखरे के लिया कि 15रूपए लूँगा सायद वह भी मुझे अपना पहला ग्रहक गरज वाला समझा मैने कहा ये ले 15 रूपए चल राणा क्लनिक से एक बच्चे को एन ब्लाँक तक ले कर चलना है। रिक्शा वाल चल पड़ा क्लनिक की तरफ तब तक शिवम अपने सफेद पट्टियों से लिप्त अपने पेरों के बल दरवाजे पर खड़ था उसे खड़ा देख मन मे एक खुशी सी हुई कि चलो दाँत ही टूटे है और कही तो चोट नही आई। रिक्शा वाले की बात को सुन कर ऐसा लगा की आज मुझे अपने भी बेगाने से लग रहे थे।कि दुनियाँ मै ही अनजान हूँ।
रिक्शे पर संदीप शिवम दोनो आगे की तरफ बैठ गए। अनिल और दोस्त दोनो मोटर साइकिल पर सवार होकर आगे निकल गए । मैं संदीप को संतोष दिलाने के लिए रिक्शे के पीछले वाले हिस्से मे बैठ गया।रिक्शावाला रिक्शा चलाता हुआ चल दिया सफर थोड़ा लम्बा सा था। वह चुपचाप मेरी बातों को सुनता रहा पर वह अपनी गरीबी वाली बात पहले रख देता यह भी कह देता की भाई मेरी इंसानियत देख की मैने किसी का कहना नही मना नही तो सभी कह रहे थे कि संदीप तू कमप्लेन कर मैने किसी ना मानी मैने तो आपकी मानी तो मैने कहा कि आँग लगाने वाले बहुत होते बुताने वाले बहुत कम मिलते है। पर वह तो गरीबी वाली दिवार अपने और मेरे बीच खड़ा कर दिया था। जो मुझे बार बार कुछ भी सोचने से पहले मजबूर कर देती। मेरे मन मे ख्याल आया कि कह दू कि भाई गरीब तो गधई होती है जो दस बच्चों के साथ सामान ढोती है खाने को मिले या ना मिले पर अगर इंसान काम करते है तो शाम को दो वक्त की रोटी मिल ही जाती है। पर इस कहावत को अपने में ही समा कर रह गया।
संदीप पीछे पलटते हुए कहा कि मेरी पत्नी बहुत ही कमजोर दिल की है। अगर वह सुनेगी तो पागल ही हो जाएगी अभी छोटे वाले के इटा गिर गया था तो समझो बेहोस सी हो गई थी।वह तो बहुत ही दिल की कमजोर है। इस बात कोसुन कर बोला की उनको मत बताओं अब तो सब ठीक ही है जब घर पर आएगीं तो खुद पता हो जाएगा।फिर उसने पुरानी बात को ताजा कर दिया कि बच्चा तो बच्चा होता कितनी भी गल्ती हो सारी गल्ती तो आप की मानी जाएगी।
थोड़ी देर के बाद बोला की मै इसे पढाऊगा कम्प्यूटर सब कुछ सिखाऊगा जब तक कालोनी मे काम करूगां शिवम के उपर हाथ फेरते हुए संदीप मुझे देखे जा रहा था। रिक्शा अपनी धुन मे आगे की तरफ बढता जा रहा था।संदीप के इसारे को समझ कर रिक्शा संदीप की गली की तरफ मुड़ चुका था। गली मे पहले से ही लोगो की भीड़ जमा थी मेरा दोस्त जो पहले पहुँच चुका था। शिवम का दोस्त शिवम को देखकर  एक दम खामोश था। जो शिवम के साथ स्कूल से आ रहा था।
रिक्शा के रूकते ही एक 15 शाल की सावली लड़की रिक्शे पास दौडती हुई आई और शिवम को अपनी गोद मे उठा लिया मेरे कहने से पहले की उठाव मत शिवम चल सकता है। वह पहले ही गिरी चारपाई में लेटा दिया। आस-पड़ोस वालो की भीड़ और जमा होने लगी सभी यही कहते की भाई साहब तो नेक आदमी है। यह बात एक बूड़ी अम्मा ने कहा यह भी कहा की गल्ती ना होते भी इतना किया।जिस मै सड़क मे पड़े दाँतों को उठाया था तो वहा पर मौजूद लोगो ने कहा कि गल्ती तो बच्चों की थी। इतना कह कर वह अपने घर की तरफ चली गई।
शिवम के सर के नीचे तकियाँ को रखते हुए संदीप ने कहा कि जूस लाना इसको जूस पिलाते है।डाँ. ने कहा कि इसको ठण्डी चीजे ही देना। मैने अपने दोस्त से कहा कि जाओ यार जूस लेकर आना वह भी वही के एक 20-21 के आसपास का लड़का,जिसकी उघार बदन में टाँके ही टाँके दिख रहे थे। सीने पर मर्द लिखा था।उसके घाव को देखते हुए वो मर्द शब्द भारी पड़ रहा था। किसी ने उसके कंधे पर हाथ मारते हुए कहा कि ये तो अभी जेल से आया है। जेल नाम सुनकर थोड़ा कँपकपा सा गया। पीछे से एक ने आवाज़ दिया, जो शायद नशे में था। उसकी बातचीत में वो सच झलक रहा था। भाई एक दाँत टूँटने की सजा छः महिने होती है और इसके तो दो दाँत टूटे हैं,समझो कि पूरे एक साल की सज़ा है। इस कानून के लिए मैं नया था। उसकी इन अटपटी बातों को सुनकर चकित रह गया। ये तो इनकी इंसानियत देखो कि कुछ किया नहीं वरना पुलिस भी खाती और ईलाज़ भी करवाना पड़ता। धीरे-धीरे भीड़ छँट गई। गली में सूअरों का झुंड टहल रहा था।
3 लोग फिर से मेरे पास आऐ पर मैं अकेला था। उन्होने मुझे बहुत इज्ज़त और तेहज़ीब के साथ अपने घर के अंदर बैठा लिया। अब तक मैं बहुत कुछ सोच समझ लिया था कि ये सब हमसे क्या माँग करेंगे,शायद पैसा माँगेगे या फिर पुलिस को बुलाऐंगे। पर मैँ ये सोच लिया था कि बात को यहीं पर रफ़ा-दफा. कर दूँगा। 2000 या 3000 देकर। उन लोगो के मन में भी ऐसा ही कुछ था,उनकी बातों से लग रहा था। दिमाग में 12000 रुपए का डिमान्ड बनाया हुआ था। शायद शिवम का पूरा खर्च वो मुझसे ही लेना चाहते थे। अब तक दोपहर के 2 बज चुके थे। घेवरा गाँव से जूस लेकर मेरा दोस्त आ चुका था। शिवम को जूस पिलाने की तैयारी होने लगी। शिवम मुँह नहीं खोल सकता था तभी संदीप ने कहा " जा यार किसी पेप्सी वाली दुकान पाईप तो ले आना"। एक लोग दौड़ पड़े। वापिस एक छोटी सी पाईप लेकर आ गऐ। जूस अबतक स्टील की गिलास में पलटा जा चुका था। गिलास को झूकाकर पाईप को मुँह में सटा दिया। शिवम जूस को साँस के जरिए घसीटने लगा। जूस पिलाने के बाद हमने संदीप को अपने साथ आर्काइव चलने के लिए कहा। वो भी हमारे साथ चलने को तैयार हो गया। हम 2 दोस्त एक मोटर साईकिल में और संदीप भी अपने दोस्त के साथ दूसरी मोटरसाईकिल में। जो शायद मूझे मारने के लिए तैयार हुआ था। इस समय वो बिल्कुल नार्मल था। हमने उसे 5000 रुपऐ देने का वादा किया। 1000 अपने दोस्त से लिया और बाकी 4000 रुपए दूसरे से लेकर,5000 रुपए नक़द गिनकर संदीप को दे दिया। संदीप और उसका दोस्त लेकर चले गऐ। बाकी के सारे दिन अपने किए पर पछताता रहा। गलती तो गलती होती है,समझदार भी किसी को समझाने का साहस नहीं किया। मन को ही समझाया कि हमारा उस बच्चे के साथ कुछ पुराना कर्ज़ा रहा होगा,इस तरह के ख्यालाती सवालो से खुद को और अपने सभी दोस्तों को समझाता रहा।
पर दिमाग में तो वो सुबह वाली गठरी मन में बसी थी कि लेकर जाना है। पर लाइट तो सुबह से ही नहीं थी। अरे! ऊपर वाले ने कहाँ पर लाकर फाँसा। चक्की भी उसी ब्लाक में है,जिसमें शिवम का घर था। फिर ना कहीं कोई कुछ मुझे कहने लगे? ये सोच-सोचकर अपनी काली पैंट की मोहरी को मड़ोरता रहा। अचानक पूरी कलोनी में शोर हुआ। दिन भर की गई हुई लाईट वापिस आई थी। ऊपर छत पर लटके पँखे की हवा मेरे आऐ हुए पसीने को ठंडा करने लगी। अब एक आशा की किरण मन में फूट पड़ी कि चलो गेहूँ तो पिस जाऐगा। अभी तो 4 ही बजे हैं,घर तो शाम 5 बजे तक ही जाऊँगा। आँख बंद किए हुए अपने साथ हुई घटना को सोच-सोचकर पछताता जरुर रहा कि अगर अपने मन कि मानकर पैदल चला गया होता तो ये समय तो देखने का ना मिलता।
उधर आसमान में घने हो गऐ ,हवाऐं इठलाकर मुझे मुँह चिढ़ाकर निकल जाती। अब फिर वही आटे वाली गठरी याद आती। दोस्त को सलाम करता हुआ,अपने किताबों वाले बैग को साइकिल में दबाकर उसी ब्लाक की तरफ़ चल पड़ा, जिसने इस नई घटना ने जन्म लिया था। पर गुम था कि जो ऊपर वाला करता है,सोच-समझकर करता है। आसमान में उड़ते बादलों से पूछा,बहती हुई ठंडी हवाओं से पूछा कि क्या मेरी ही गलती थी? सबने मना किया। पर बच्चा तो बच्चा ही होता है। गलती तो आपकी है।
अब तक सुबह वाली चक्की की जगह आ गई। ओ-ब्लोक में चक्की और एन-ब्लोक में शिवम का घर।  चक्की चल रही थी। पूछा,आलोक वाली गठरी पिस गई क्या?
वो चक्की की गाति को धीमा करते हुए बोला,हाँ। कई गठरियों पर हाथ मारा कि क्या ये है? नहीं,ये है? नहीं? तीसरे नम्बर वाली है। वो गठरी को उठाकर तराजू पर रख दिया। तराजू के दोनो पलड़ो को बराबर करते हुए कहा कि 20 रुपए देना। आज मुझमें बहस करने कि क्षमता नहीं थी कि कितने रुपए किलो पीसा है? गठरी का मोहरा सुतली से बाँधकर चल दिया। आसमान में बादल उडकर, आपस में अटकले बाजी करके,खेतों में मोरो को नाचने में मजबूर कर रहे थे। हवा भी मेरी साइकिल के खिलाफ़ थी।
सुबह की तरह बीच-बीच में गठरी को टटोता जाता कि कहीं गिर तो नहीं रही है? अब बादल भी मेरी मज़बूरी का फ़ायदा उठाने लगे। बेहरमी से मेरे और गठरी के ऊपर मोटी-मोटी पानी की बूँद गिराने लगे। मजबूर होकर साईकिल की रैस को बढ़ाया। नहीं तो पीछे रखा गठरी का आटा भीगकर जम जाता। मुझे अपना काम गठरी का ख्याल ज्यादा था। जब तक मोटी-मोटी बूँद पतली होती, जब तक घर पहुँच गया। गठरी को आलोक की मलकिन को लाकर दे दिया। इस समय मेरे पास मज़ाक के लिए वक्त नहीं था। अपने कमरे के दरवाज़े खोलकर ,किताबों वाला बैग अलमारी में रखकर अपने घर-परिवार को सोचने लगा। अगर वो सुनेंगे तो मुझे कितना भला-बुरा कहेंगे। मैं अपने आपसे शर्मिंदा हो रहा था। शरीर कुछ हल्का सा होने लगा कि कल क्या होगा?
मन से समझौता किया कि कल की कल देखी जाऐगी। आज कुछ अनमन सा था। आज वो नमी वाला गला कहीं सूख सा गया था। जो आज मेरे आस-पड़ोस को सूनेपन का एहसास दिया। मीनू और कुसूम से हल्की मुलाक़ात हुई थी, अभी 2 दिन ही हुए थे उनको जयपुर से आऐ हुए। उनके मम्मी-पापा राजस्थान गऐ हुए थे। उन्होने आवाज़ दिया,”भैया ऊपर तो आना।" और “आज आप बहुत खामोश हो?” मेरे मन में एक सवाल था कि अभी दो दिन हुए नहीं कि इन दोनो ने मेरी खामोशी को कैसे समझ लिया? शायद जूली, पूजा ने या फिर कुसुम ने बताया होगा? इतना सोचते हुए ज़ीना चढ़कर छत की मुँडेर पर बैठ गया। कुसुम ने कहा कि पानी पिओगे। जवाब में नहीं निकला। कुसुम थोड़ा रुकते हुए कहा अभी हम-तुम कलोनी चलेंगे। प्रेम भाई का फोन दुर्गेश के फोन पर आया था। दुर्गेश कह रहा था कि आपका फोन नहीं लग रहा है।
उनकी इतनी बातों को सुनकर अपनी पूरी घटना को कह सुनाया। मीनू पूरी घटना को सुनकर अपने पापा के साथ हुए वाकयो को कह सुनाया। भाई आज के ज़माने में नेक़ी करना ही बदी बन जाता है। मैं भी अपने आपको समझाता हुआ,कई मुहावरों को कह सुनाया। "नेक़ी कर जूता खा,मैं भी खाया तू भी खाँ"। "नेकी कर दरियाँ मे डाल"
मीनू के पापा की बात को सुनकर मुझे अपने पापा की याद आ गई।अभी दो दिन पहले ही पापा को मोटर साइकिल मे बिठा कर उसी कालोनी में आया था।तो लड़को के झुण्ड़ को देखर उनकी निराली हरकतों को देख कर वह मुझसे कहने लगे कि बेटा यहा पर गाड़ी धीमी चलाया कर नही तो अपनी साइकिल से आया कर।पापा की बात को सहमती मे लेते हुए कहा पापा आप तो देख ही रहे हो कि कितने धीमी चला रहा हूँ।
पापा ने जवाब में कहा कि बेटा तेरी बात तो ठीक है। लेकिन कालोनी के बच्चे बिना देखे सुने ही सड़क पर दौड़ पड़ते है।तब उनकी कोइ गल्ती नही देखेगा। सब तेरी ही गल्ती बताएगें।शायद उनकी जुबा मेरे लिए सच ही थी। उनकी सभी बातें मुझे सच की तरफ ले कर जा रही थी। मुझ में अभी भी इतनी हिम्मत ना थी कि उनको फोन कर इस घटना के बारे में बता दूँ।
उसी क्षण मेरी सपना का मिस काल आया सपना नाम के मिसकाल को देख झूठला ना सका पर अपनी आवाज़ मे खिलापन लाते हुए बोला कि वह समझ ना सके कि आज मैं परेशानी में हूँ। बिलकुल पहले वाले अन्दाज़ में कहा कि हैलो कैसी हो? यहां पर सबकुछ ठीक आप ठीक है ना। मेरा झूठ बोलकर बात करने का मन नही कर रहा था। कल बात करता हूं, अबी प्रेम सर से मिलने जाना है पर वह शायद अभी बात करना चाहती थी। वह मेरे बहाने को पकड़ लिया और बोली कि शाम को कौन सा स्कूल खुलता है,झूठ मत बोलो,जबकि मैं सच बोल रहा था। कुसुम के एडमिशन के बारें में बता करना है। इतना कहकर फोन काटना चाहा पर उसने बड़े ही लहज़े से कहा कि सुनों आज हमने बहुत बुरा सपना देखा है। उसके इस सवाल का जवाब देना उचित समझा और बहुत ही हल्के पन मे आज का सारा दिन कह सुनाया कि आज 6000 रूपए की चपत लग गई है। वह फिर से बोली तुम तो ठीक हो मैने रसीले स्वर में कहा कि हाँ बिलकुल ठीक हूँ। उसको सायद मेरी आमदनी का पता था।वह मुझसे कहने लगी कि भानू के हाथ पैसा भेजू क्या? मेरे पास कुछ पैसे रखे है। उसकी इस तरह की बात को सुनकर दिल बाग-बाग हो गया। नही करते हुए उससे कल बात करने को कह कर फोन काट दिया।  
फिर से प्रेम सर को फोन किया कि सर पानी की झिरफन ने मुझे रोक रखा है।अगर आपकी इजाजत हो तो कल मिले या फिर आप ही सुबह मेरे कमरे मे आ कर मिल लेना एक बार मुझे भी तो चाय पिलाने का मौका दो।वह नमी आवाज़ को लेते हुए कहा कि ठीक तो फिर हम सुबह ही मिलते है।अब ये सारी बाते छत की मुड़ेर पर ही खत्म हो गई।
अगली सुबह प्रेम मुझसे मिलने मेरे घर आए उनसे मिलकर मुझे बहुत ही खुशी का आभास हुआ हम दोनो को आशिष की मम्मी ने चाय पिलाया। उसको भी समय नही था कि वह मुझे बैठ कर चार बाते करते हम दोनो चाय पीते हुए कुसम से कहा कि पापा को जितनी जल्दी हो सके बुला लो बिना प्रूब के काम नही होगा तो कुसुम ने कहा कि मेरे पापा राजस्थान से चल चुके है। शाम तक तो वह आ ही जाएगें।प्रेम कफ मुझे पकड़ा कर रोड मे दौड़ते हुए निकल गए। मै फिर से अपने कमरे मे जाकर पापा का कल वाला काम आज तो निपटाना ही था।नही तो शाम को पापा पूछ ना बैठे की पैसा जमा किया है या नहीं?
फिर मेरे दिन पहले की तरह कटने लगे। कलोनी में घूमना लोगो से बातें करना,पर जब भी शिवम के ब्लोक की तरफ़ जाता तो अंतर आत्मा मुझे धिक्कारती कि तूणे सही नहीं किया। एक दिन शाम के वक़्त फिर से मैं और मेरा दोस्त संदीप के घर जा पहुँचे। शिवम चारपाई पर लेटा हुआ दूध-बिस्कुट खा रहा था। उसे खाता-पीता देखकर मुझे का एहसास हुआ और उस कमज़ोर दिल वाली माँ से भी मिला। जिसके जिगर में एक उम्मीद जिन्दा थी कि मेरा बेटा जल्द ही ठीक हो जाऐगा। वह हम दोनो को देखकर कहने लगी,भैया आपके ही भाग्य से बच गया मेरा बेटा,यहीं बहुत अच्छा हुआ वरना आजकल की दुनिया में कौन किसका है? इतना कहते हुए वो अन्दर पानी लेने चली गई। हम दोनो ना में गर्दन हिलाकर चल दिए। संदीप ने कुछ सोचते हुए कहा कि आते रहिएगा,ये बच्चा आपका ही है।
एक या दो दिन बाद संदीप एक हज़ार का नोट लेकर आया और कहा कि ये तो नकली है,ये तो शुक्र है कि मुझे ओर किसी ने नहीं पकड़ा वरना डंडे बजा देता और पूछता कि कहाँ से लाऐ हो? उसकी इस हँसीदार बात को सुनकर मेरे चेहरे का रंग ही उड़ गया और मैं संदीप से बहस नहीं कर पाया। उसे दूसरा नोट देकर वापिस लौटा दिया। उस नकली नोट का मुआयना अपने ही कई दोस्तो से करवाया।
2-3 दिन के बाद फिर से फोन आया। वही 11:30 मिनट पर और तारीख़ थी 8/9/09। उस समय मैं लेख को टाईप कर रहा था। फोन को रिसीव करते हुए पूछा कौन? जवाब में वही एक्सीडैन्ट वाला। फिर से पूराना वाक़या दिमाग में घुम गया। उससे पूछा कि क्या बात है?वो थोड़ा आहिस्ता से बोला,”घर पर आ जाना भाई,कब तक आओगे।" मैंने भी समय को देखते हुए कहा कि 2 बजे तक आऊँगा। "ठीक है" इतना कहते हुए ही उसने फोन काट दिया।
इधर अब काम करने में मन ही नहीं लगता। 2-4 शब्द टाईप करता और शिवम का पूरा चेहरा मेरे मोनिटर के सामने घुम जाता। दिल ने फिर से आवाज़ दिया,चलो यार । पहले मिलकर आता हूँ। अपने ऊँचे दरवाज़े की तरफ़ आकर बाहर देखा कि मौसम भी बेगाना सा लग रहा था पता नहीं कौण सी बला मेरे ही गले आ पड़ गई। किस घड़ी में अपना कदम बाहर निकला था। किया तो था भला पर ना जाने काहँ से ऊपर वाले ने किससे हमको मिलाया? जो हमसे भी गरीब निकला। हम भी तो गरीब हैं पर कुछ तो करते हैं। इस बात को मन में गुड़ता हुआ साइकिल में सवार होकर चल पड़ा। मन को समझाता हुआ कि उसके पास जाकर बोल दूँगा कि यार जो भी देना था,दे दिया। अब हमें माफ़ कर दो। अपनी लाचारी सुनाऊँगा तो शायद मान जाऐगा।
देख, कलर फटी शर्ट पहन रखा है। देख मेरे स्लीपर भी नीचे से टूटे हैं। बाहर रहता हूँ और नौकरी नहीं करता। मान लेगा तो ठीक है और अगर ज़िद्द भी करेगा तो बोलूँग कि अगर 3000-4000 रुपए कमाता भी हूँ तो उससे क्या होता है,आज के जमाने में। अगर तुम्हें विश्वास ना हो तो किसी से भी पूछ सकते हो। इन्हीं सारी सोचो के साथ उदास मन से साइकिल को चलाता हुआ,उधर की तरफ़ ही बढ़ता जा रहा था,जिधर शिवम का घर था। उसके घर के आस-पास रहने वालें लोगो से कहूंगा कि अरे यार मेरी इंसानियत का गला मत घोटो। फिर तो शायद मान ही जाऐगा। बी-ब्लोक पार कर ओ-ब्लोक के पास पहुँचाने वाला ही था कि संदीप अपनी मस्तानी चाल से मेरी ही तरफ़ चला आ रहा था। आने-जाने वाले तो बहुत थे पर दिमा में वही दो चेहरे घूम रहे थे,जिससे मैं मिलने जा रहा था। साइकिल को उसकी तरफ़ ही मोड़ दिया और ब्रेक मारता हुआ उसके नज़दीक खड़ा हो गया। पहले से ही सोच लिया था कि शायद ये हमसे ही मिलने आ रहा है। इस भावना को तोड़ते हुए राम-राम किया वह मेरा भी हाथ पकड़ कर राम राम किया।मेरे बोलने से पहले ही बोल पड़ा की जी हम तो बहुत गरीब है।अभी कल ही शिवम का एक्सरा नांगलोई से करा कर आया हूँ।बच्चे के तो पेट मे भी दर्द बता रहा है। लड़का तो मेरा सूख गया है।खून की कमी सी लगती वह तो बिलकुल कँपकपाता रहता है। लोग बता रहे थे कि उसका खुन बहुत निकल गया है। खाना भी नही खाता बस समझो एक लीटर दूध लगा रखा है।उसी को पीकर रहता हैं।दाँत जो टूटे है।अब भाई तू ही ठण्डे दिमांग से सोच की सामने के दाँत जाने से उसकी तो पूरी की जिन्दगी बर्बाद हो गई ना अब तुम दाँत ला सकते हो ना ही मै ला सकता हूँ। उसकी तो जिन्दगी बर्बाद हो गई ना।
थोडा से बे रूखी आवाज में बोला की यार आप तो इस तरह बात कर रहे हो।जैसी सारी की सारी मेरी ही गल्ती हो।वह फिर बोल पड़ा भाई गल्ती हो या ना हो अगर मैं उस समय लोगो की बात मान लेता तो ठीक रहता पुलिस मे ही कमप्लेन करता तो ही अच्छा रहता। यार देख मेरे पास बिलकुल पैसा नही देखा नही उस दिन भी मैने पैसा मांग कर काम चलाया। भाई मै नही  जानता दो दिन मे देख लेना। डाँ. बारह हजार बताया था। तब क्यों नही ना किया था।तभी मना कर देता कि मै नही दूँगा आज तुम इस तरह से बात कर रहे हों। अच्छा अब तुम मुझे 5000रूपए और दे दो बाकी का मै खुद समझ लूँगा ना आप रहेगे उसके दाँत लगने तक पता नही कहा चले जांव तुम।दाँत निकले या ना निकले लगे या ना लगे। फिलहाल जब तक उसके मसूडे पक नही जाते तब तक तो दाँत लग ही नही सकते। वह इन सारी बातो को बकवास समझा अन्त में कहा कि आप के पास दो दिन का समय है देख लेना। पाँच हजार रूपया और दे दे भाई हमारा तुम्हार रफा दफा हो जाएगा नही तुम ले जाओ बच्चे का उसके दाँत लगवा कर दे जाना। मन मे बिचार बना लिया की जीतू जी से लेकर दे देता हूँ। उनको तो अगले महिने में दे दूँगा इस भावना को समझ कर ज्यादा बात करना अच्छा ही नही समझा। अब तक की ये सारी बाते उसी सड़क के किनारे ही खड़े होकर हो रही थी।
उससे पूछा आप हमसे मिलने तो नही आ रहे थे। नही भाई सइकिल बनवाने के लिए दे रखा है।उसी को लेने जा रहा था।अच्छा चलो मै तुम्हे छोड़ देता हूँ।वह मेरी पीछे बनी कैरियल पर बैठ गया। वह फिर अपनी गरीबी को दोहराने लगा कि भाई हम तो बेरोजगार है। नही तो मै एक भी पैसा ना मांगता। मै तो अपनी गरीबी को अपने में ही पी गया मुझमे हिम्मत ही ना था।कि मै अपनी गरीबी की कहानी सुनाता उसकी गरीबी को अन सुना करते हुए साइकिल से ऊतार कर कहा भाई वो रही दुकान।इतना कह कर लैब मे आकर दो तीन लाइन ही टाईप किया जहा पर उसका फोन आया था।
दिमांग उचट गया कि इतना बच-बच कर चलने वाला ना जाने कहा से यह आफत मोल ले लिया।क्या उस जन्म मे बिगाडा था जिसका फल इस जन्म में मिला।उस जगह के कई लोगो को यह घटना कह सुनाया सबने मेरी बात को मान दिया की आप ने बहुत अच्छा किया और कोई होता तो एक रूपया भी  नही देता चार गाली और उपर दे देता। अगर वह फिर पाँच हजार मांग रहा तो आप के साथ अनार्थ कर रहा है। उसको मागना ही नही चहिए था। वह कहने लगा कि जो इस तरह के लोग होते है वो तो किसी की नही मानते है। उनकी घर वाली भी उसी ओछी बुद्दी की होती है। पर मैने हा नही का जवाब नही दिया। मुझे तो उसी की वो बात छेदे जा रही थी कि देख लूंगा। दो दिन का समय है आपके पास।
अपने मन को समझाता हुआ सोचा कि दुनिया तो ना जाने क्या-क्या बोलती है।भौकने वाले तो बहुत से होते है, पर सच कह कर करने वाले बहुत कम होते है। यह बात मन मे बस कर आज से पहले कभी उस कमरे सोने की चेष्टा ना की पर ना जाने आज क्यों उसी कमरे मे सोने का मन कर रहा था। कब आँख लग गई जगने के बाद पता चला की एक घण्टे से ज्याद सोया था। इस नींद मुझे कुछ राहत दिया। लेकिन बदन अभी भी भारी-भारी सा लग रहा था।
मन मे एक अज़ीब खटास ने जन्म ले ही लिया था।अब तो उस जगह से गुजरने का मन ही ना करता। लोग भी दिमांग से उतरने से लगे कि जिसने गरीब को गरीब ने नही समझा तो रहीस कैसे समझेगें।दिलवाले फिल्म का एक डायलाँग याद आया।
"हमे गरीबों ने लूटा,अमीरो मे कहा दम था।"
“मुझे वही पर लूटा, जहा मुझे डर ना था।"
आज तो उस दिन से ज्यादा बेचैन था।आज तो मेरा वो साथी भी ना था कि सारा हाल कह सुनाता। अब हर गली हर चेहरे अजनबी से लगते।किस-किस को सुनाऊ अपनी दासता अब तो अपनों से भी डर लगता कि कही वह भी हमसे नाता ना तोड़ ले।मम्मी पापा का डर बहुत ही डरा रहा था।इस घटना को सुनकर कही वो भी हमसे कही नाता ना तोड़ बैठे।गैरो की तरह कही कुछ कह ना सुनाए।अब तो सबसे छुपाने का सोच लिया था। चाहें अपने हो या गैर हो।जिनके साथ इतना भला किया वों ना हमारे हुए तो ये क्या हमारे होंगे।
अब तक शाम के पाँच बज चुके थे।कालोनी की शाम वाली बाजार सजने के लिए तैय्यारी में थी।अभी बाजार की बीच वाली सड़क बिलकुल खाली सी थी बस सड़क के दोनो किनारो पर दुकान दार ही अपनी दुकानों का ठीहा लगा कर अपनी समानों को सही से सुब्यवस्थित कर रहे थे। सुनी सड़क से गुजरता हुआ इ ब्लाँक की दुकान पर गया जो दुका थी वह बिल्डिंग मटेरियल की दुकान थी। उस दुकान के सामने सड़क के किनारे ही कुर्सी पर राम नाथ आग्रवाल जी अपनी गहरी मुस्कान को मारते हुए कहा कि हम तो आप को ही याद कर रहे थे।दुर्गेश कुर्सी को छोड़ता हुआ खाड़ा हो गया यह बात कहते हुए की आज कल तो आप का फोन भी बहुत मुश्किल से लगता है।बन्द है क्या?
बन्द क्या ? इस तो मेरी किस्मत भी बन्द चल रही है।फोन भी आज कल अपने मन का राजा हो गया है। साइकिल को ताला मारता हुआ। दुर्गेश ने जिस कुर्सी को खाली किया था उसी पर बैठ गया। उन्हो ने मजाकिया अन्दाज़ मे कहा कि आपके एटीयम में कुछ पैसे पड़े हे क्या?देना यार किसी को पेमेन्ट देना है। पैसा तो है पर देने के लिए कोइ ताजी ही नही।वह यह सब कह रह थे तब तक मै चुप बैठा था।मुझे उस बात को कहने के लिए बजबूर सा कर दिया जिसको ना बतानी की ठान रखी थी। इन बातो ने कह दिया की आज वह फिर से पाँच हजार रूपए मागने आया था।
वो हमसे कुछ कहते कि उनके बोलने से पहले एक स्कूटर आकर रूका जिस तरह मै आ कर रूका था। उसके कुछ कहने से पहले ही रामनाथ जी ने कहा कि यार कही से कोई पेमेन्ट नही मिला कल देखेगें। वह मेरी बात को दोहराते हुए अपने साथ शामिल कर लिया।वह भी मेरी बातो को सुनते रहे।अन्त मे कहा कि केश सुलझ गया या नही इसको आपस में ही सुलझा लो तो ज्यादा अच्छा होगा। नही एक दाँत टूटने की सजा छ: महिना होती है। इस बात ने पुराने सारी कही हुई का दोहरा सा दिया जो शिवम के घर के पास सुनने को मिली थी।वह भी यही कहा इसको जल्दी से जल्दी निपटा लो।
क्या करू कुछ समझ में नही आ रहा था। मुझे ऐसा लगने लगा की कल ही सब कुछ रफा दफा कर दूँ।दुनियाँ मे तो और ही दुनियाँ भर की महा मारी चल रही है। कही और में तौर ना हो जाए।स्वाइन फ्लू तो आपनी चरम सीमा है हि कितनो को अपने आवोस मे ले लिया है।इस तरह के कई ख्याली सवालों ने मुझे झकझोर कर रख दिया। और भी कुछ चीजो को जन्म देने से पहले ही दफन कर दिया।
जिस चीज को खरीदने के लिए बैठा था। वह दुकान अपनी तरफ बुलाने का इसारा किया। राम नाथ जी से कहा घर पर मिलते है। अच्छा चलते है। दुर्गेश पूछा चलोगे क्या वह बोला कुछ पैसे आ जाए तो सब्जी लेकर आएंगे आप चलो। इतना कह कर वह मेरी खाली वाली कुर्सी पर बैठ गया।साइकिल का ताला खोलते हुए दुकान के पास पहुँजा जिससे मुझे कुछ लेना था। दुकान अभी अपनी दुकान की सारी चिजों को सही सभाल कर रख ही रहा था। वह शरीर से पतला दुबला लम्बाई तो बिलकुल ठीक ठॉक। उससे बीस रूपए कास मसाला बनाने के लिए कह दिया वह अपनी अन्दाज से मेरा सारा का सारा मशाला बना दिया। बना कर मुझे पालीथीन मे भर कर पकड़ा दिया। मशाला को पकड़ते हुए उसे सौ का नोट दिया वह बीस काट अस्सी हमे वापस कर दिया।मेरे पैसे को वह अपने माथे पर लगाते हुए। गोलक पर छुआ कर अपने गोलक के अन्दर वाले हिस्से मे डाल दिया। उससे बिना कुछ पूछे समझ गया था। कि शायद हमे इसके पहले ग्राहक है।
सारी बाजार पर नजर डालता चला गया पर कोई भी चीज मन को ना भॉती। ज्यादा कोई खॉस भीड़ ना थी छुटपुट भीड़ धीर-धीर बढने के सुरूर में थी। किसी राम जोहार भी नही किया बस उसी की बातों मे खोया था। कि कल देख लेना। साइकिल चलाता हुआ मेड़ खेतो के रास्ते कमरे तक पहुँच गया।रोज की तरह साइकिल को खड़ा किया। हिमांशू ,विशाल जो मेरे ही कमरे बगल मे रहते है।वह मुझे बहुत प्यार करते है। मुझे देख कर मेरे ही कमरे में आकर कही टी.वी चला देते है। तो कभी बिछी चारपाई पर चढ कर बैठ जाते है।जो मेरे अकेले पन को दूर करते है। कभी तो उनके साथ खेलता तो कभी झूठला कर उनको उनकी मम्मी के पास भेज देता। जो अभी सही से चलना भी नही जानते। उम्र वही 14या18 महिने के आस पास होगी।
आज वह भी बेगाने से लग रहे थे। आज मुझे ऐसा ना जाने क्यों लग रहा था कि मै इनकों इतना प्यार क्यो करता हूँ?शायद आज से पहले कभी इस तरह ख्याल भी मन में नही आया था। इस घटना मुझे कमजोर बना सा दिया ता ।शायद इसलिए ख्याल कुछ बदले-बदले से। मेरी मम्मी एक बात बहुत याद आ रही थी।कि"खेलाए मेलाए का नाम नही दै मारे का नाम"
उनको अपने कमरे से निकालते हुए अपने पहने हुए कपड़ो का बदला कमरे मे रखे सुबह के झूठे बर्तन धोने के लिए बाहर रख दिया। फूलो की मम्मी ने चाय के गिलास को दिखाते हुए पूछा चाय पियोंगे । ना करते हुए भी हा कर दिया। ना जाने आज क्यो? मुझे लगा कि वह मुझे जो चाय दिया वह अपने पीने के लिए लेकर बैठी थी। रोज की तरह। उन्ही के बगल मे रखी कुर्सी पर बैठ कर चाय पीने लगा बिना कुछ बोले जबकि पहले कभी इस तरह चुप चाय नही पिया था।
उधर अमन की मम्मी अपने जूठे बर्तनो को मेरे बर्तनों मे गबड़ते हुए सारे बर्तनों को धोने लगी।जब तक मै चाय पीता तब तक वह मेरे बर्तनों को धुल चुकी थी। मैने चाय पीने के बाद कहा कि।इतना मत करो मेरे साथ "मुझे अपने में ही जीने दो" बर्तन को उठाता हुआ कमरे मे रखने चला गया। शर्ट को पहनता हुआ कमरे से बाहर निकल कर चुप उसी कुर्सी पर फिर से बैठ गया। वह थोडा सा टोन मारती हुई बोली कि आज तो भैया उदाश है।घर पर कुछ बात हो गई क्या? नही मेरे घर पर तो हमेशा ठीक ठॉक रहता है। उनको इस बात से झुठलाना चाहा जो मेरे साथ हुआ था।पर झूठला ना सका पर उनका भी समझना सही था। वह कहती ही रही मानों या ना मानो बात कुछ जरूर है। अरे! नही करता हुआ चुप हो गया।वह अपने मन मुताबिक फूलो की मम्मी से बाते करती रही। मै चुप-चाप सुनता रहा।अन्त मे कह ही दिया की हमेसा खिलता चेहरा आज इतना उदास कैसे? हसी मजाक करने वाला इतना शान्त क्यों? शायद वह मेरी रोज वाली हरकतों को देखना चाहती थी।आज वो सारी बाते हरकते कही छुप सी गई थी। अभी तो वही बात दिमाग मे खटक रही थी की देख लेना।
शाम धीरे-धीरे अन्धेरे की तरफ बढती जा रही थी। विशाल की मम्मी ने सब्जी की इस तरह छौक लगाई की सब उठ कर अपने-अपने कमरे मे चले गए। मै भी कुर्सी को खाली करके चला गया। कमरे भी एक उदासी का माहोल था।टूयूब लाइट भी अपनी रोशनी खो चुकी थी। टी.वी मे आते गाने बे सुरे से लग रहे थे।फोन को भी स्वीच आँफ कर दिया कही घर से कोई फोन ना आ जाए।चारपाई मे रोज की तरह बिछा गद्दा उसमे पड़ा खाने दार हर चद्दर। तकिया भी उसीसे रखी थी।गद्दे पर लेटते हुए तकिया को सर से सटा लिया। कल की उधेड़बुन मे लगा गया। कि कैसे करू कि देख लू वाली भाषा को भूल जाऊ हमेशा के लिए। दरवाजे अधखुले कम रोशनी मे जलती टियूबलाइट भी जलती रही।
नींद पूरी होने लगी। अगल बगल वाले कमरे मै कौन आया कौन गया। इन सब से बे खबर था।कितना सोया मुझे खुद मे ताजूब हो रहा था। कि कतना कम सोने वाला कितना सोया पापा भी नही की  डिस्टर्ब करते। अचान नींद खुली समझा चार बज गया होगा रोज की तरह पर घड़ी पर नजर डाला तो देखा की रात के दो बज रहे है। शायद प्यास की वजह से आँख खुल गई थी।  बाहर मौसम भी अपनी झडी मे मस्त था। पानी पिया लेट कर सोचने लगा कि वारे ऊपर वाला भी क्या विधा रचता है? आँख लगने का नाम ही ना लेती।
रिमोट से टीवी को चालू किया वही जी सिनेमा वाला चायनल खुला जिसमे एक मन को मस्त कर देने वाला गाना आ रहा था। आवाज को तेज करना चाहा पर रात का समय है सभी सो रहे है कोई कुछ बोले ना। धीरे सी ही आवाज में,पूरा गाना सुना ।नींद कही खो सी गई थी लिखने का मन करता पर मै तो देख ली की कहानी को सोच समझ रहा था। अब पूरी फिल्म को देखा। सुबह के पाँच बज गए। भक्ती गीतों वाला चायनल लगा कर कमरे की साफ सफाई किया जिस बिस्तर में सोया था। उसको भी सही हलियाते हुए सही कर दिया। पापा आए नही थे। इस वजह से खाना सिर्फ अपने लिए ही बनाना था।
धीरे-धीरे एक के बाद एक करके सबके दरवाजे कुल गए सभी रोज की तरह अपने अपने कामों मे लग गए। सभी बच्चे स्कूल जाने के लिए बाकी के सभी काम मे जाने के लिए मै भी खाना बना कर ढक कर रख दिया और एटीयम जा कर पैसा लाया।वही पाँच हजार जो उसने मांगे थे।आशिष के पापा को तो हर पल पल की कहानी को बताया था। कमरे मे पैसा रखने के बाद सोचा की चलो इनके कान मे यह वाली बात भी डाल देते है। आज मामला का रफा दफा करना है जरा आप भि डी-157 मे ग्यरह बजे तक आ जाना तो मुझे समझा कर कहने लगे की अब पैसा नही देना और भी कुछ लोगो को बुला लेना हा एक बात याद रखना उमेश के साथ मनोज को भी बुला लेना। उनकी बात को सुनकर मेरे ही ख्याल में कुछ लोग थे।जिनको बुलाने के लिए सोचा।
अब रज की तरह नहा का कर दोपहर का लंच लेकर निकल पड़ा। साइकिल पर सवार होकर की आज इस काम को निपटा देते है नही तो वह मुझे सवत के हस चार ठुनके रोज मारता रहेगा। कि आज मै यह करा कर आया कल यह करा कर आया। आज इतना दे दो कल इतना दे देना मुझे तो रज उसी रास्ते से निकलता हूँ। इससे यही अच्छा है कि एक बार रो लो वह ज्यादा अच्छा होगा। इतना सोचते हुए अपनी साइकिल को शिवम की घर की तरफ मोड़ दिया संदीप कुछ कर रहा था। शिवम अपने हाथों को धो रहा था। उसको खड़ा देख मेरा दिल खुशी से झूम उठा उसने बैटने के लिए अपने कमरे के अन्दर चारपाई भी डाल दिया।कि बैठो उसकी इस बात का मान देकर बोला की अभी टाइम नही है। जरा उस दिन वाले भाई को लेकर आ जाना संदीप ने कहा कि वह अभी काम पर गया है। एम.सी.डी मे काम करता है दो बजे तक आएगा आच्छा तो आप ही चले आना। इतना कह कर फिर से चल दिया।
जी.एम.आर के कमरे के अन्दर गया तो वहा पर अनिल दिनेश दोनो लोगो नमस्कार करते हुआ बोला यार अनिल वह तो कल फिर से पाँच हजार रूपया मांग रहा था। वही पर मौजूद महिला ने कहा कि आपकी तो गल्ती ही ना थी तो आप पैसा क्यों दिया। अब मांगे तो मत देना। कहना अब किस बात का चहिए।अरे! जो दिया सो दिया। उनकी बात भी सही ही लगी जिसने पैसा ना देना को कहा अगर इसी तरह से सब लोग कह देगें तो पैसा देन नही पड़ेगा। अनिल दिनेश कहा डी-157 मे आ जाना ग्यारह बजे।
आर्काईव में आकर चाभी कमरे मे सफाई करने वाली को देखर जी ब्लाँक की तरफ निकल पड़ा। उमेश डाँ. से मिलने के लिए जाना था धूम कर पर ना जाने क्यों? जी ब्लाँक वाला शौचालय खुला मिल गया जिससे उसी के अन्दर से होकर बाहर निकलता की दरवाजे पर हौ बुआ मनोज दोनो कुछ बाते कर हरे थे।मनोज से कहा कि यार जरा आना तुमसे थोडा काम है। आज तो मै बुआ से ही राम जोहार करना भूल गया इसका मुझे बहुत अपसोश हुआ कि मेरी बुआ क्या सोच रही होगी की आज बेटा बोला नही क्या सोच रही होगीं मेरे बारे में।यह सब उमेश जी घर पहुने से पहले ही विचार विमर्श कर डाला साइकिल को खडा करता हुआ आवाज दिया भाई जी कहा हो मनोज मेरे पीछे था। पर्दा को हटाते हुए बोले कौन ? मुझे देख कर कहने लगे दुकान पर बैठो मै आया।
मनोज के साथ दुकान मे बैठ गया यार मनोज पंखा तो चलाना वह भी अपनी हसी वाली आवाज मे बोला क्या यार तुम्ही को गर्मी लग रही है। हा यार साइकिल चला कर आया हूँ ना। मनोज का सरा का सार हाल सुनाने लगा जिस -जिस तरह से मेरे साथ हुआ था। वह अभी मेरी पूरी बातों से अन्जान था वह सुन कर हक्का-बक्का रह गया। कि यार तुमने पहले क्यों नही बताया यह सवाल मेरे लिए नया नही बहुतों ने कहा पर किया कुछ नही पर मै उसकी सारी बातों को सहमती लेता गया बहुत सारी मेरी बाते उमेश जी भी सुन चुके थे। उमेश को इसलिए बुलाना चाहता था।कि वह भी पेसे से एक डाँ. है वह भी हा नही का जवाब दे सके। दोनो लोगो से कहा कि आप दोनो लोग डी-157 मे आ जाना ग्यारह बज़े तक।
चलते चलते मनोज ने कहा कि यार मसला एन ब्लाँक का है ऐसा करो तुम सुरेस प्रधान के कान यह बात डाल दो जाके उन्हे भी बुलाकर कह दो कि वह भी डी-157 मे आ जाए मनोज की बात को मान कर सुरेश जी के घर की तरफ चल दिया। यह बोलते हुए कि निपट जाए तो ठीक ही वह भी गरीब है हम भी गरीब है।   मनोज इस बात को सुनकर हस पड़ा। सायद मै उसकी नज़र मे बड़ा था।
जी ब्लाँक के शौचालय की तरफ गया क्योकि वह वही पर हमेशा बैठे देखते है कई बार तो मिल कर आया हूँ। शौचालय में जाकर देखा तो वह उस समय थे नही एक छोटी सी बिटिया चारपाई पे चद्दर के साथ उछल कूद रही थी। उससे पूछे तो वह बोली कीकर के पेड़ के पास गए है। थोडा आगे बढ कर देख कि वह अपनी गुवार की तरफ खड़े थे गुवार के आस-पास छोटे-छोटे सुअर के बच्चे टहल रहे थे। कुछ बडे नर मादा गन्दे पानी लेदा माग रहे थे। दो बुजुर्ग चार पाई पर पहले से ही बैठे थे। सुरेश जी से हाथ मिलाता हुआ। उनको पीछे की तरफ चारपाई पर बैटाते हुए सारा का सारा हाल कह सुनाया वह भी चकित हुए कि इतना पैसा कैसे ले लिया फिर बोले बच्चा बालमिकियों का होगा मैने कहा नही मुझे इस बात का बिलकुल भी अनुमान नही कि वह किस बिरादारी  का बच्चा है। मै भी डर इस वजह से रहा हूँ कि उसके दो दाँत जो टूट गए है। बुजुर्ग थोडा सा झलाते हुए बोला जब पैसा ही देना था सारे दाँत ही ना तोड़ देता। ये सारे बालक ना सुधरने वाले ये तो पूरे रासते मे मटकते हुए चलते है। बस बात वही कि वह पहले भि पैसा पा गया है।फिर से पैसा मांग रहा उसके अन्दर तो लालच बैठ गया है। ठीक है अच्छा प्रधान जी आ जाना वह मेरी पूरी बात को ना सुनते ही कह दिया कि जब सब लोग आ जाए तो मुझे फोन कर देना मै आकर देख लूगा। हा मे गर्दन हिलाता हुआ चल पड़ा।  
जो सड़क कभी पक्की थी आज वह रात की बारिस से साथ मै रोज के पानी गिरने से खराब हो चुकी थी जहा देखो वही पर टैंक्कर के पानी से बने गड्डे तो निकले मे मजबूर कर रहे थे। ऊपर से रात की बारिस ने और ही पूरी सड़को दल दल बना दिया था। अब तो साइकिल से चढ कर निकला किसी खतरे से खाली ना था। जब साफ रास्ता आया तो गुवार के पीछे हो रहा काम याद आया देखो तो कैसे एक सुआर को कैसे खरपतावर से भून रहे थे। उसको इस तरह पलट रहे थे जिस तरह से आग मे रोटी को सेका  जाता है। बिलकुल उसी तरह से उसको भी अलट-पलट कर उसके सारे ऊपरी बालो को जला चुके थे। बस मांस ही भून रहा था।
एक आदमी मुझसे छुपने के लिए गुवार की तरफ छुपता जा रहा था। पर मेरी नजरों ने उसे ताक ही लिया छेड़ने से अच्छा था कि मै ही उसे भूल जाउ। दूसरा एक और पत्थर के ऊपर चाकू को रगड़-रगड़ कर चाकू मे धार ला रहा था।एक परात मे भुने सुअर को पानी से धो रहे थे। पता नही उसके साथ और क्या-क्या करेगें? वह उसके साथ चीड़फाढ का काम करने लगे वह मुझसे देखा ना गया। अब तक मेरी साइकिल इब्लाँक की दुकान पर आकर रूकी जहाँ बीती शाम को बैठा था। राम नाथ जी कुर्सी में नही अन्दर कमरे में बीछे चौकी पर बैठे थे। मुझे देखते ही कहा कि वो आया है क्या शायद शाम वाली बात अभी इनको लगता है याद है।
वह मुझसे कहने लगे की आए भी तो देना मत मै उस से बात करके देखता हूँ। डरना बिलकुल भी नही कल शाम ही मैने एक पुलिस वाले के कान आवज डाल दिया है वह अपना आदमी ही है। उनकी यह बात मुझे कुछ भाइ नही कि पुलिस वाले से कह दिया है। मेरे कहने से पहले ही कहने लगे की बोलो कितने बजे आना है। ग्यारह बजे आना है जो सब को टाइम दिया वह उनको भी दे दिया पर वह कहने लगे की मै ति दस पचास पर ही आ जाऊँगां।
उनके पास से होता हुआ उस कमरे मे आया जहाँ पर सब को आने के लिए कह कर आया था। उस कमरे मे चद्दर बीछाया पीने के लिए पानी रखवाया काम करने वाली से।इतना होते होते दस बीस होने वाले थे। मेरा रोज वाला दोस्त आ गया।अभी वह कल वाली बात चीत से अन्जान था । आते ही कहा जनाब क्या हाल है। आज बहुत ब्यस्त लग रहे हो। कहो कोई आने वाला है क्या? हाँ कुछ लोगो को बुलाया फैसला कराने के लिए वह थोडा अपनी भौ को सिकोड़ता हुआ। क्यों? क्यों क्या वह तो कल मुझसे फिर से पाँच हजार रूपए मागने आया था। अच्छा जी मुझे तो पहले ही लग रहा था कि दूबारा से पैसा मांगने आएगा तुम्हे नही लग रहा था। बबली भी तो बोल रही थी ये बन्दा चालाक दिखता है यह बिना दूबरा लिए मानेगा नही। इतने मे जैसवाल साहब आ गए बैठो अभी कोई आया नही ऐसा कहते हुए वह भी गद्दे की ऊपर बैठ गए। हम दोनो की बाते रूक सी गई वह अपने काम मे लग गया फाईल को सभालने में मै भी बाहर की तरफ झाकता कही आ तो नही रहे है। इधर जैसवाल जी अपना चश्मा निकाल कर पढने लेगे समाचर पत्र वह समाचार पत्र को अपने मुँह के पास सटा कर रखा था। जिनका भरकीला शरीर बाल सफेद लाल हो रहे थे। चेहरे पर एक चमक थी। दाढी जो बना कर आए थे।
एक दम बाइक की आवाज आई मुझे लगा कि वह आ गया पर वो तो था नही रामनाथ जी थे ।वह बाहर से आवाज दिया आ गया क्या नही करते हुए बोला अभी नही तो ठीक है मै अभी एक पार्टी से मिलकर आता हूँ।अगर जल्दी आ जाए तो काल कर लेना ठीक है। ग्यारह बज चुके थे। उम्मीद बढने लगी थी कि लोग आएगे जब-जब बाहर की तरफ देखता वो चेहरे ही नजर ना आते जिनको बुलाकर  आया था। और तो चेहरे बार-बार दिख रहे थे। जिनको बुलाया नही था।पर सोच रहा था कि सब लोग मिलकर किस तरह का फैसला करेगे। कर पाएगे या नही वह किसी की मानेगा या नही मानेगा।
यह सब रास्ते मे ही सोच रहा था दूबरा से सुरेश,मनोज,उमेश को बुलाने जो जा रहा था। पहले की तरह उमेश के दरवाजे पर आवाज दिया बिलकुल पहले की तरह वह पर्दे को हटाते हुए कहा कि आए खाना खा लिजिए अभी आता हूँ ठीक है आप मनोज को लेकर आ जाना थोडा मै पर्धान जी को भी बुला लाऊ। तुम वही पहुँचों कमरे पर तुम्हारे जी.जी भी बैठे है।
इतना कहते हुए निकल गया उसी गुवार की तरफ जिधर चीढफाढ होते हुए देखा था।उस जगह वह दोनो बुजुर्ग मांस के बारिख टुकडो कोखाने मे लगे थे। दारू भी पी रहे थे। उनसे बात करना सही समझा गुवार के पीछे जा कर देखा की खरपतवार मे खून के छीटे कुछ एक आध मांस की छिटकन पडी हुई थी। मन भिनक गया देखा कि बहुत दूर खेतो मे सुआर के बच्चे को खोजने गए थे। ऐसा कुछ महसूस हुआ। अन्त मे उन्ही दोनो बुजुर्गों से कह कर चला की वह आए तो बोल देना की वह लड़का फिर से तुम्हे बुलने के लिए आया था।
जी ब्लाँक के किनारे वाली सड़क से होता हुआ डी-157 मे आ गया। देखा कि छाया जी दोस्त की फाइलों को सही कराने मे लगी पडी थी। वह मुझे देखते हुए कहा कि आपका क्लइण्ट तो आया नही शयद दोस्त ने उनको सबकुछ बता दिया था।आज के बारे मे आज भी वह अपने पुराने लिवास मि लिपटी बैठी हुई थी। मैने कहा तभी लोगों को जमा कर रहा हूँ।वह अन्दाज लागते हुए कहा कि लगता है वह आएगा नही इस तरह के लोग बहुत ही चलाक होते है। वह समझ गया होगा की जरूर वहा पर कोई झमेला होगा । इस बात को सुनकर याद आया कि वह भी कुछ झमेला के बारे मे ही बोला था।कि जो देना हो यही पर दे दो पर मै तो उसे बुला कर आया था। अब तक ग्यारह चालिस हो गया। छाया जी की यह बात कुछ फिट सी लगी मैने अपने दोस्त का फोन मांगते हुए उसे काल किया। वह जवाब मे बोला की मै दो बजे आऊगा मुझे समय नही है मिझे कही जाना है।
मैने अब दूसरे अन्दाज मे कहा कि आज तुझे समय नही है कल मुझे समय नही इससे भाई तू बारह तीस तक आ जा वह बोला ठीक है। अभी तक बुलाने वालो मे से  कोई नही आया था। सब अपने-अपने काम करने मे मसगूल थे। कि वह बारह बीस पर आ गया। उसको आता देख मन मे थोड़ा तसल्ली सी मिली की चलो यह तो आ गया। उसके कमरे मे आते ही उसे बैठने के लिए कहा ।वह बेंच पर बैठ गया। जैसवाल जीअपने चश्मे को हाथ मे रखते हुए बोले यही है। क्या इशरे मे हाँ कर दिया। वह भी शान्त दोस्त फाइल के काम को रोकता हुआ बोला छाया जी यही है वो भाई साहब। छाया जी ने अपने चश्मे से झाकते हुए मुझे देखा मै शान्त था। यही सोच रहा था कि क्या होगा? वह बोली आपका बेटा सही है। वह तीखी आवाज मे बोला कि सही क्या है। वह तो जिन्दगी भर के लिए कजहील हो गया।अब तो उसके दाँत ना भाई ला सकता ना ही आप ला सकती है। छाया जी ने कहा कि अब आप क्या चाहते है?
वह बीते वाले कल की बात कह दिया जो मैने भाई से कहा वह भाई कर दे बस वही मुझे चाहिए। देख लेना वाली बात को लेकर तो हर घड़ी हर करवट मे रात भर सोचता रहा था। कि पाँच हजार दे दो बाकी का खर्चा मै खुद उठा लूंगा ना आप रहगे इतने दिन ना हम रहेगे इतने दिन अभी तो दँत लग नही सकते अब दाँत तभी लगेगें जब इसके पूरी तरह से मशूड़े पक नही जाएगें। देख भाई मै बहुत वैसा आदमी हूँ।आप की इंसानियत की कदर कर रहा हूँ।
उसकी इन कल वाली बातो को दोहराना चाहा कि इतने में राम नाथ जी आ गए। दरवाजे पर आते ही पूछा आ गया क्या? क्योकि वह दो बार वापस हो चुके थे। मैने कहा कि बस आपका ही इन्तजार हो रहा ता।वह अन्दर आकर मेरे ही बगल गद्दे पर बैठ गए। बैठते ही उसे समझाने का प्रयास किया वह तो झल्लाते हुए बोला की यार तुमको इस तरह करना ता तो हमे बताते हम भि तो दो तीन आदमी लेकर आते इतना कहते हुए बाहर निकल कर अपनी साइकिल को पकड़ने लगा । उसको फिर से आवाज दिया कि यार भाई सुनो तो सही  आप तो इस तरह भाग रहे हो जैसे हमने तोप ही लगा दिया हो। तोप वाली क्या बात है? ये भाई तो इस तरह से बात ही कर रहा है।वह अपनी पुरानी वाली जगह मे आकर बैठ गया।
राम नाथ जी कहने लगे कि हम वो आदमी है हर सुख दु:ख मे काम आने वाले है। जब चाहे पैसा ले जाना घर वर बनाना हो तो मटेरियल का सामान ले जाना पैसा हमे कम दे जाना। हम तो दूध पानी की तरह दोस्ती करते है। आप भौ गरीब यह भी गरीब है। दो तीन हजार की सेलरी मे क्या होता है? आज के जमाने में। वह तो पहले से ही हंस की तरह दूधको दूध पानी को पानी कर दिया था। वह तो पहले ही चालाक लोमड़ी की तरह बोला हम तो बहुत ही गरीब आदमी है।चलो ये तो इतना भी कमा लेते है। हम तो बिलकुल बेरोजगार है। कुछ भी कमाता होता तो भाई का वह वाला भी पैसा वापस कर देता। मै खुद इंसानियत के नाते खुद भाई को परेशान ना करता।
छाया जी ने कहा कि भाई यह भी तो गरीब है।हम सब तो इसकी हैसियत से पर्चित है।आप ये मत समझो कि यह रोज अच्छे कपडे पहन कर आता है तो रहिस जायदा है।यह भी बिलकुल आप लोगो की तरह गरीब ही घर परिवार का लड़का है। कोई दौलत वाला नही है। पर अभी भी वह सब इन बातो को जूठ ही समझ रहा था। संदीप फिर से तीखी आवाज मे बोला की इनका तो पैसा ही गया। मेरे लड़के की तो जिन्दगी ही बर्बाद हो गई। अब आप ही सोचो की वह किस लायक बचा है। इतना कहकर फिर से उठने लगा। आप तो मुझे ही फसाने काप्रयास कर रहे हो। अगर मै रहीस होता तो भाई का वह भी पाँच हजार वापस कर देता।
मेरी तरफ इशारा करते हुए बोला कि भाई करने के लिए बुलाया था तो मुझे पहले बता देता मै भी दो चार अपनो को लेकर आता। राम नाथ जी नहा कि आप तो कटी मछली की तरह तिलझ रहे हों।  बैठो तो सही वह फिर बोला कि तू बोल भाई मै जाऊ मेरे पास समय नही है।बी.बी काम पर गई है।बच्चे स्कूल गए है।शिवम घर पर अकेला है। जो भी करना है जल्दी करों।राम नाथ जी ने फिर से कहा कि हम तो आपके छोटे भाई की तरह है। यार आप भी क्या बात करते हो मेरी उमर के तो आप के बच्चे होगें। बड़े भाई तो आप है। जैसवाल जी ने कहा कि यहा पर कोई पंचायती नही बैठे है ये तो सब इनकी आँफिस के लोग है। रामनाथ जी इसलिए बोल रहे है कि इन्होने इसे पैसा दिया है।
दोस्त बोला आपका पहले वाला पैसा खत्म हो गया कि। तुमने तो उसको पैसा वाला ही समझ लिया है। नखरीली टिन मे बोला यार तू बोल मुझे किस लिए बुलाया था। भाई तू भी तो कुछ मेरे पास वक्त बहुत कम है। बी.बी काम पर गई है। बच्चा अकेला घर पर है।मै तो बेरोजगार हूँ।इस तरह से एक घण्टे हो चले वार्तालाप होते हुए। सब लाँख समझाया पर हर एक इंसानितय का गला सा दबा दिया था। वह हर लाइन मे एक ही बात बोलता की हम बहुत गरीब है। बेरोजगार है।
अन्त मे सब को चुप कराता हुआ बोला की भाई अगर ये पाँच हजार रूपए दे दूगा तो फिर से तो नही मांगेगा। वह अपनी सफेद चेक दार शर्ट के साथ अपने काले स्पोर्ट वाले पैण्ट के साथ अपनी पतली बद्दी दार चप्पलो को सभालते हुए बोला मै कागज पर साइन कर देता हूँ।कि बाकी जिम्मदारी मेरी अब कुछ भी होगा तो मै अपना घर जमीन भी बेच कर लगा दूँगा बच्चा तो मेरा है। कोई अपने बच्चे को साधरण से मरने नही देता है। फिर वही की गरीब हूँ कमता हूँ नही ।
उसकी यह सारी बाते मुझे कोसने के साथ-साथ जलील भी कर रही थी। हमने तुरन्त एक सहमती पत्र लिखा की हम इस घटना को यही पर रफा दफा करते है। अब बच्चे की सारी जिम्मेदारी संदीप अपने ऊपर लेकर हमसे दस हजार रूपए नगद लिया और इन पाच लोगो के सामने कहा कि अब से इनके ऊपर कोई भी बात नही होगी। बच्चा मेरा है मै। तो उसको सही कराने घर भी बेच दूगा पर इस भाई को कभी किसी मामले मे आगे नही लाउगा। संदीप ने बहुत ही हसी खुशी के साथ दूबारा से पाँच हजार रूपए लेकर सहमती पत्र मे साइन भी किया की हाँ हमने पहले दिन के इलाज अलावा दस हजार रूपया 09/09/09 को नगद ले लिया।
जब यह पत्र लिख गया तो संदीप बोले साइन हम तभी करेगे जब आप हमे पाँच हजार दे दोगे। छाया जी ने कहा कि तुममे इतनी भी इंसनियत नही क्या? हम आपको पैसा नही देगे।वह नही मिला तो क्या करूगा।  हमने सुबह के समय एटीयम निकाले पाँच हजार के कररे नोट दिया लेकिन वह कहने लगा इन पर अपने साइन कर दो अगर नकली निकल गए तो। फिर राम नाथ जी ने कुछ मे साइन किया तो हमने कहा कि हर नोट मेरे नाम का पहला अच्छर बना दो वह बनया भी।हर नोट मे जा-जा बना दिया।भाई जा अब मुझे मत परेशान करना। उसके चलते वक्त कहा भी की इलाज सही से करना। इस समय बिमारी भी नाना प्रकार की चल रही।शिवम का इलाज अच्छी तरह कराना नही तो अब मेरी कोई जिम्मेदारी नही है।जो छ: महिने के बाद भी बोले के मेरे बेटे के पेट मे दर्द हो रहा है। जो इस धटना को बार-बार अन्जाम देता रहे।संदीप ने कहा कि अब मेरी जिम्मेदारी है।
चलते-चलते मैने हाथ मिलाया दोस्त वकील जी ने भी हाथ मिलाया जैसवाल जी ने हाथ मिलाया,छाया जी ने नमस्ते किया। यह भी सभी ने कहा कि आपने तो अपना टेक निभाया किसी कीतो मानी नही।जो पहले दिल बोला वो तो सब आप ने ले लिया। आपने तो सबकी इंसनियत के चिथड़े उडा दिए। वह बोला आप जो भी समझोंइतना कह कर पाँच हजार रूपए जेब में डाल कर चल दिया। उनसे भी हाथ मिलाना चाहा राम नाथ जी से दरवाजे के पास बेठे थे। राम नाथ हाथ बढाने की बाजय पीछे कर लिया कि हम ऐसे लोगो से हाथ नही मिलाते जिसमे इंसनियत कह कर इनसानयत की कदर ना किया।वह अपना सा मुँह लेकर साइकिल के साथ चला गया।धीरे-धीरे भीड़ छटने लगी सभी मुझे फिर से अकेला छोड दिया। अपने को समझाने के लिए कई उसी तरह की लाइनो को अपने दोस्त को सुनाया जो आज मुझसे मेल खा रहे थे।
 "दुनिया मे कितना गम है मेरा गम फिर भी कम है"।
"जिन्दगी की राहों मे रंज गम के मेले मे भीड़ है कयामत की फिर भी हम अकेले है।"
“ मै मरा तेरे लिए तू ना मरा मेरे लिए"
“ये गरीबी भी क्या?चीज होती है ना जीने देती ना मरने देती है"।  
“कभी अपने गैर होते है। तो कही गैर भी अपने से होते है"।
दोस्त भी चला गया उसे भी जल्दी जाना था। यह कहते हुए कि छोडो यार जो हुआ उसे भूल जाओ। अब तक अकेला हो गया था। तरह-तरह के ख्याल आ रहे थे। पर इंसनियत शब्द कटे धाँव की तरह चीभता रहा।कि इंसानियत को समझ कर भी नही समझ पाया की इंसानियत होती कैसी है?
 

   

Comments (1)  Permalink

comments

David @ 09.12.2009 15:30 CET
u should write it in part david

gzb1284@gmail.com

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