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मीडिया, जानू नागर

मीडिया का नाम अब किसी से छुपा नहीं कि कोई मुझसे आकर पूछे कि मीडिया क्या है? मीडिया कहाँ है,कि उसका रूप क्या है। कभी सुर्खियों का हवाला सुनाता हुआ। ,कही गुप्तचर की भाँति खोए हुए जुल्मों को सच करता हुआ। झूठी अफ़वाहों का शिकार हुआ।कही तो अपने नाम से बादलों की तरह समाजिक आसमान में उड़ा दिया।

कभी तो यह सच्ची लगती है। तो कही ना कही इससे भागने का मन करता है। जिसको साधन नही बनाना होता उसको भी अपना साधन बना डालते है। इसके इतने नाम बढते चले जा रहे कि एक को याद रखो तब तक दूसरा खुद में भूल जाता है।

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इंसानियत, Jaanu Nagar


किसी से मिलने जाना था। किसी का इन्तजार था,कि वो आए हम जाए।वो आ गए पर ना जाने क्यों वो इतना लेट क्यों आए? पूछना चाहा पर पूछ ना पाया।क्योकि मुझे भी किसी से मिलने जाना था। उनकें आते ही दो चार मीठी-मीठी बातें किया। चाभी के गुच्छें को नचाते हुए स्टूल पर रख कर उन्हे छोड़ने चला गया। कुछ देर बाद वापस आया तो देखा की,पापा निकल चुके थे।उनकी रोज की रूपानी चप्पले खाली पन को दोहरा रही थी।पानी से भींगे उनके कदमों के निशानों को अभी फर्श ने सोखा नही था।तौलियाँ नमी को लिए कमरे की खिड़की पर पड़ी पंखे की हवा में हिल रही थी। चूल्हे के पास रखी जूठी थाली में रखा पानी भी हिलकोरे मार रहा था। उनका तहमत चारपाई पर योहि पड़ा था। जिसमे जूठन के चावल के दो चार सीत दिख रहे थे। तहमत को हलियाते हुए दूसरी चारपाई पर रख दिया।

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