दो ज़िंदगी बदबू में jaanu
जीवन में होने वाले उतार चढाव को समझना।उसके साथ जीना,एक गहरी कला की तरह प्रतीत होती है। यहाँ से वहाँ तक का जीवन निर्वाह किस तरह होता है?ये आवों हवां अपना रूख किस तरह मोड़ती है? कभी स्वर्ग की कल्पना में जीते थे। काम भी उसी जगह पर था। जिस जगह को स्वर्ग की संज्ञा का नमा देते थे। दोनो के किनारे अलग-अलग एक इस पार तो,एक उस पार।
पहले वशीम अहमद जी-: जो महदिउल बनारस उत्तर प्रदेश से।
पहले वशीम अहमद जी-: जो महदिउल बनारस उत्तर प्रदेश से।
दूसरे पनवाड़ी जी-: जो लोगो में हि चर्चित नहीं अपितु बच्चो मे भी छाए हुए थे। नौजवानों की ज़ुबा मे पण्डित जी भी कहे जाते है।
इन दोनो लोगो का जीवनो पार्जन ही कुछ इस कदर है। अब उनकी इस कहानी को उनकी ही ज़ुबानी में गढते बुनते चलते है।कि उनकी जिन्दगी का बदबूं से क्या रिस्ता है?
पहले वशीम अहमद जी-: जो पहले भी नाली के ही ऊपर अपना ठीहा बनाया हुआ था। जिनका ठीहा नांगला माँची के मेन शौचालय के बगल में ही था।बाजार वाली गली ये वो गली थी जो रिंग रोड से चल कर देवी नगर और काली माता बस्ती का बटवांरा करते हुए। कलीम अण्डे वाले के घर के सामने अपना रास्ता जाम कर तीन घरो की दूरी के बाद पुस्ता का नाम
देती थी।
इस गली के दोनो ओर नाली बनी थी, जो दोनो बस्ती का गन्दा पानी ढोते हुए मुन्ना के एस.टी.डी की दुकान के पास बने नाले में ये दोनो नालियाँ आ कर गिरती गिरने के बाद नाला का पानी साथ मे इन दोनो का पानी साथ में मिल कर यमुना नदी के पानी से जाकर मिल जाती थी। शौचालय को छूती नाली के ऊपर बने अपने ठीहे में बैठ कर घड़ी को सुधारने का काम किया करते थे।वहां पर कोई बदबूं नही,बल्कि चहल-पहल की ज़िन्दगी थी।ये वहां पर ठिहें मे बैठ कर कलई में बंधी घड़ी को समय के साथ चलने का प्रशिक्षण देकर पुन: घड़ी को उसी कलाई में बांध दिया करते थे।
ऊपर वाले की क्या मर्जी थी?कि उनके उस ठीहें के पास भी एक पान का ही खोखा था।उस पान के खोखे की अपनी एक अलग पहचान थी।मेरे ख्याल से वह ठीहां भी एक दिवाल के कोने पर ही था। जिसकी ओट पर बैठकर पान को लगाने वाले चुपचाप गानो की धुन मे पान को लगा कर,लोगो के ओठो को रच कर शहर की दुनियाँ में धूमने के लिए आजाद कर "कहते टहलों बेटा शाम में फिर नजर आना इस पान वाले को मत भूल जाना”ये तो देवी नगर की नाली का करिश्मा था।
इधर काली माता बस्ती की नाली के ऊपर बने ठीहें का अन्दाज क्या था। पनवाड़ी जी (उर्फ पण्डित जी)-: यह भी अपनी दुकान को नाली के ऊपर ही बनाया हुआँ था। जो एक दुकान की छवि को गाढा करती थी। लगता भी था कि दुकान स्वर्ग पर ही थी।इनकी दुकान के दो दरवजे एक दुकान का दूसरा मकान का इन दोनो दरवाजो के बीच अपनी पान वाली चौकी को सजाया हुआ था। जिसमे सिर्फ बच्चों के हाथ ही.पहुच पाते थे। चौकी से सटा एक छोटा सा गेट जो दकान कि अन्दर की तरफ खुलता था। दुकान के अन्दर रखी फ्रीज़ जिसका रंग महरूम था।जिसके अन्दर गर्मी से राहत देने वाली ठण्डी बोतले होती थी।उसी के ऊपर बनी अलमारी में कापी किताबों के साथ हर तरह के पेन भी होते थे। पनवाड़ी जी चौकी में बेठ कर सारा का सारा दिन पान लगाते जिसमे कत्था,चूना,गुलकन्द,मीठा पान इसके अलवां जो जिस तरह का पान मांगते उनको उसी तरह का पान लगा कर दे देते। कुछ को पत्ते मे भी लिपेट कर देतो वह इन सूखे पत्तो को पानी में भिंगा कर रखते थे।
उनका चमकता चेहरा ओठ हमेशा पान के चबाने से रचे होते,गले मे पड़ा लाल कलर का गमछा जिसका उपयोग पान लगाने के बाद हाथ को साफ करने का काम करता। मौका मिलते ही ये अपने पीतल के सरौते से सुपड़ी को बारिख-बारिख काटने मे लग जाते।बाकि के पानो को लाल कपड़े मे लिपेट कर रखते,जिससे पान सूखने ना पाये।रात के ग्यारह बजे तक सफेद रोशनी मे बैठे रहते।
एक दिन मेरा दोस्त (सुधीर) मावां खा कर मेरे में आया।और कहा कि कोने वाले पण्डित जी बहुत अच्छ मावां बनाते है।इस वक्त हम दोनो इस जगह मे नये थे।वही दो तीन माह हुए थे।कि इस दुकान का पता चला। कुछ दिन बाद मेरा दोस्त मुझको भी पण्डित जी की दुकान पर ले गया। और कहा जरा दो मावां बनाना। हम दोनो उन्ही के पास में खड़े हो गये। पण्डित जी खुश सुन्दर चेहरा,ओठ रचे हुए।गले मे पड़ा लाल गमछा हाथ मशीन की तरह काम करते। मावां नाम मेरे लिए नया,पर उन दोनो के लिए पुरानाथा।
मेरी नजरे उनको हाथो पर ही थी कि मावां बनता कैसे है? पण्डित जी ने दो कागज़ के टुकड़े लिए और एक ही चीज़ दोनो में रखना शुरू किया। जिसमे सुपाड़ी,पतली-पतली गरी के छिल्को को डाला।एक काला महक वाला पउडर,लाँची,सौफ एक चिपचिप सा पदार्थ डाला जो खुशबू को देने वाला था। पुड़िया बना कर दिया।एक को दोस्त ने खाया और एक को मैने खाया। दोस्त ने बताया कि ये पूरी नांगला माँची मे सबसे अच्छा पान लगाते है।"अरे वाह तब तो ये बहुत अच्छा पैसा कमाते होगें।" पूरी बस्ती मे सबसे ज्याद इतना ही नही कालेखाँ से भी आते है पान खाने।दोस्त धुमक्ड़ था।वो हर शाम मुझे मेरे कमरे मे आ कर बस्ती की एक नई बात सुनाया करता था।
इस तरह सुनते-सुनाते ढेड़ दो साल गुजर गये। शाम का मिलना-जुलना जारी रहा।फिर इसी तरह की एक शाम दोस्त कमरे में आकर चारपाई में बैठ गया। मैं खाना बना रहा था।बाहर पानी की फुहार लगी पड़ी मेरी छत पर,छत पर पड़ी तिरपाल से पट-पट की आवाज आए जा रही थी।
आज दोस्त के तेंवर कुछ बदले-बदले क्या यार तुम भी अजीब आदमी हो पढते हो पढाने मे लगे रहते हों? कुछ बाहर भी निकल के देखा करो। पतीले में चमची चलाते हुए पूछा।आज तेरी दुनियाँ मे क्या हो गया?"दोस्त मेरी ही दुनियाँ मे नही पूरी बस्ती में"बस्ती मे ऐसा क्या?
“ऐसा क्या नही? ये बस्ती दो तीन महिने मे टूट जायेगी।"
अरे नही!
अरे नही देख लेना मैं तो बाजार वाली मस्ज़िद से सुन कर आ रहा हूँ।इतना कहते हुए अपने बुआ के घर चला गया। कुछ महिने ही बाद बस्ती का सर्वे शुरू हो गया। इसके बाद कुछ घरो को गिराया जिसमे एन.डी.एस. सी.ओ.एम और लॉग लिखा हुआँ था। उन घरो को चुन-चुन कर गिरा दिया। छोड़ा उन घरों को जिन्के दरवाजे पर पी-98 या जिसमे कुछ भी नही लिखा था।इन सारे घरो मे रहने वाले लोगो ने तीन चार महिने तक कस्मकस की जिन्दगी को गुज़ारा बिना रोशनी बिना पानी और बिना बिना राशन की दुकान के सब कुछ अपने पास से। उस समय भी वशीम भाई अपना घड़ी वाला काउन्टर लेकर उन्ही टूटी फूटी जगाहों पर अपना रियाज़ कायम रखा।
दूसरी तरफ पनवाड़ी जी अपनी दुकान की रौनक उड़ती देख चेहरा भी मुर्झा गया। आज पहले दिन वाला चेहरा नही था।।
मेरा दोस्त (सुधीर) भी अपने गाँव समदहा मानी कलॉ जौनपुर चला गया। अब मेरी भी जिन्दगी मे सूनापन आ गया वाकया ही इस कदर था।
इस स्वर्ग वाली जगह को इन तीन चार महिनों ने नर्क वाली जगह बना दिया। यहा तो जानवर भी रहने के राज़ी नही।ये स्वर्ग सिर्फ तीन चीजो के खो जाने से,एक पानी,दूसरा बाजार, तीसरी बिजली।दुकाने के हट जाने से दूध,आटा वो सारी चीजे जो मन के चलते ही मिल जाया करती थी।
एक पल मे सारे घरो का विस्थापन कर दिया।पुनर्वाषित होने के लिए सावदा घेवरा जे.जे. कॉलोनी मे भेज दिया। स्वर्ग का सुख भोग कर नर्क का कलमा पढते-पढते आज भी वही जुबा चल रही है।विस्थापन के बाद एक नांगला ही नही अपितु और भी जगाहो के लोग इसी तरह की कहानी के शिकार हुए।
जिसमे-: लक्ष्मी नगर,(7,8,16)ठोकर नम्बर,गाँधी नगर,रधुबीर नगर,ओखला, इन्द्रलोक जखीरा,दिलशाद गार्डेन,इंद्रागाँधी एयरपोर्ट,बारा पुला कालेखाँ,इत्यादि अन्य जगाहे से भी विस्थापित होकर सावदा घेवरा जे.जे. कॉलोनी मे पुर्नवाषित हुए है। ये सारे लोग हर तंगी का सामना करते हुए। जिनमे पानी,बिजली,सड़क, बगैर मकानो के ।
स्कूलों के,डिस्पेन्सरियों के,यातायात के साधनो के बिना अपने दिन गुज़ारे। तीन साल बाद कही 25% ही साधन हो पाये है। जिसमे नाली,4स्कूल,1डिस्पेंसरी, इन स्कूल में तालिम की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। साथ मे लोगो ने अपना आसियाना बनाना शुरू कर दिया।कुछ बना रहे है।बनाने में लगे पड़े है।बनाने की उम्मीद बना रहे है।
किसी ने अपना रूप बदला तो,किसी ने अपना काम बदला।पर इन दोनों ने अपनी पुरानी कहानी के वजूदों को पुख्ता किया।पुराने दोनों को याद मे रखते हुए इनकी नयी राह की अनूठी अनोखा नग्मा सुनते है।काम वही जगह वही पर रूप बदला हुआ।
जीवन के कार्य भार के साथ जीवनों पार्यजन का नया तरिका उसी तरह की चौडी सड़क जो स्कूल को छूते हुए यूके लिप्टस वाली सड़क पे जा कर मिलती है। फिर यही सड़क के,जे.डी.आई ब्लाँक से मिलती हुई एच ब्लाँक के सड़क पर जा कर मिल जाती है। जिसके सामने एक शौचालय और स्कूल बना हुआ है। जहा पर सड़क खत्म होती है।
पर ये दोनो लोग उस जगह पर महजूद है। जिसे अभी बस स्टैण्ड के नाम से जाना जाता है। आज ये अपना ठीहा मिलकर नाली के ही ऊपर बनाया हुआ है।जबकि वशीम भाई ई ब्लाँक में रहते है। और पनवाड़ी जी एच ब्लाँक में रहते है।पर ठीहा बी ब्लाँक के स्कूल के बगल से जाती हुई नाली के ऊपर स्कूल की दिवाल के साथ बैठ कर उन दिनो को याद करके यहाँ की हकीकत को बया करते है।
इस जगह में हर मौसम का अनन्द लिया है। जिसे वह अन्य लोगो के सामने किस तरह से रखते है। जिस समय नाली का निर्माण हो रहा था।गर्मी की गर्म हवां अपने साथ उड़ती धूल हम लोगो के ऊपर झोक कर आगे निकल जाती।उस समय घड़ी को बनाने से रोकना पड़ता पान को दूबारा से धोना पड़ता।
शाम के समय जब घर पे हम आपने बालों को धोते तो सर से धूल ही धूल निकलती।मौसम की हर तपन को यही पर बैठ कर सहन किया।वर्षा की आई बूँदो को रोकने के लिए महने मिल कर तिरपाल लगाया।इसी दौरान जब नाली का निर्माण होने लगा तो यह जगह अस्त ब्यस्त हो गयी।उस समय हमारे ठीहें भी बदल गए इस कारण हमको दो या तीन दिन की छुट्टी सी करनी पड़ गयी।
उस समय सड़क भी क्या हो गयी थी?इतना गन्ध मचां हुआ था। लेकिन जब इसका निर्माण हो गया तब हमने फिर से उसी दिवाल के सहारे फिर ठिहा बना लिया।इस चौराहे मे सबसे पहले वशीम भाई फिर पनवाड़ी ने पर आज तो चौराहा ठोहों से भरे पड़े है।चाय की,चाऊमीन की,अण्डे की,सब्जी की छोले भटूरे के ठीहे पनप रहे है।तो कभी ये गायब भी हो जाते है। पर ये दो जिन्दगी हमेशा नजर आते है। चाऊमीन,समोसे,अण्डे,ये सभी साम को ही नजर आते है।
लेकिन वशीम के साथ पनवाड़ी जी सुबह के सात बजे से रात आठ बजे तक अपने ठीहे सजाए रखते है। और भी इन दोनो लोगो का एक खास रोल भी है।जब दिन मे भूख लगती है तो एक लोग देख रेख करते है। दूसरे खाने खा कर आ जाते है।साथ मे पनवाड़ी जी अपनी साईकिल भी रखते है।
वशीम भाई अपने घड़ी के काउण्टर के साथ एक स्टूल भी रखते है जिसमे घड़ी को बनावाने वाले आराम से बैठ सके। जबकि पनवाड़ी जी के पास ऐसा कुछ नहीं। ये तो सिर्फ एक छोटी सी चौकी ही बनाया हुआ है। वशीम जी काम को ध्यान मे रखते हुए एक आइडिया का नम्बर भी रखे हुए जिससे देश विदेश बात कर सकते है। पनवाडी के दो चीनी मिट्टी के बने पात्र जिसमे चूना और कत्था रखते है। अरे! हा एक बात तो रह ही गयी। वशीम जी दिन में पाँच बार मस्जिद मे जाकर नवाज़ अदा करने के लिए जाते है।पनवाडी जी उनके ठीहे की देख रेख करते है। क्योकि घड़ी और कोई नही बना सकता ।लेकिन जब पनवाड़ी जी कभी भी कही जाते है तो वो अपना एक आदमी बैठा कर जाते है,पान तो कोई भी लगा सकता है।
इन बदलती तस्वीरों का वर्णन अभी और ही निराला है।
इन दोनो लोगो का जीवनो पार्जन ही कुछ इस कदर है। अब उनकी इस कहानी को उनकी ही ज़ुबानी में गढते बुनते चलते है।कि उनकी जिन्दगी का बदबूं से क्या रिस्ता है?
पहले वशीम अहमद जी-: जो पहले भी नाली के ही ऊपर अपना ठीहा बनाया हुआ था। जिनका ठीहा नांगला माँची के मेन शौचालय के बगल में ही था।बाजार वाली गली ये वो गली थी जो रिंग रोड से चल कर देवी नगर और काली माता बस्ती का बटवांरा करते हुए। कलीम अण्डे वाले के घर के सामने अपना रास्ता जाम कर तीन घरो की दूरी के बाद पुस्ता का नाम
देती थी।
इस गली के दोनो ओर नाली बनी थी, जो दोनो बस्ती का गन्दा पानी ढोते हुए मुन्ना के एस.टी.डी की दुकान के पास बने नाले में ये दोनो नालियाँ आ कर गिरती गिरने के बाद नाला का पानी साथ मे इन दोनो का पानी साथ में मिल कर यमुना नदी के पानी से जाकर मिल जाती थी। शौचालय को छूती नाली के ऊपर बने अपने ठीहे में बैठ कर घड़ी को सुधारने का काम किया करते थे।वहां पर कोई बदबूं नही,बल्कि चहल-पहल की ज़िन्दगी थी।ये वहां पर ठिहें मे बैठ कर कलई में बंधी घड़ी को समय के साथ चलने का प्रशिक्षण देकर पुन: घड़ी को उसी कलाई में बांध दिया करते थे।
ऊपर वाले की क्या मर्जी थी?कि उनके उस ठीहें के पास भी एक पान का ही खोखा था।उस पान के खोखे की अपनी एक अलग पहचान थी।मेरे ख्याल से वह ठीहां भी एक दिवाल के कोने पर ही था। जिसकी ओट पर बैठकर पान को लगाने वाले चुपचाप गानो की धुन मे पान को लगा कर,लोगो के ओठो को रच कर शहर की दुनियाँ में धूमने के लिए आजाद कर "कहते टहलों बेटा शाम में फिर नजर आना इस पान वाले को मत भूल जाना”ये तो देवी नगर की नाली का करिश्मा था।
इधर काली माता बस्ती की नाली के ऊपर बने ठीहें का अन्दाज क्या था। पनवाड़ी जी (उर्फ पण्डित जी)-: यह भी अपनी दुकान को नाली के ऊपर ही बनाया हुआँ था। जो एक दुकान की छवि को गाढा करती थी। लगता भी था कि दुकान स्वर्ग पर ही थी।इनकी दुकान के दो दरवजे एक दुकान का दूसरा मकान का इन दोनो दरवाजो के बीच अपनी पान वाली चौकी को सजाया हुआ था। जिसमे सिर्फ बच्चों के हाथ ही.पहुच पाते थे। चौकी से सटा एक छोटा सा गेट जो दकान कि अन्दर की तरफ खुलता था। दुकान के अन्दर रखी फ्रीज़ जिसका रंग महरूम था।जिसके अन्दर गर्मी से राहत देने वाली ठण्डी बोतले होती थी।उसी के ऊपर बनी अलमारी में कापी किताबों के साथ हर तरह के पेन भी होते थे। पनवाड़ी जी चौकी में बेठ कर सारा का सारा दिन पान लगाते जिसमे कत्था,चूना,गुलकन्द,मीठा पान इसके अलवां जो जिस तरह का पान मांगते उनको उसी तरह का पान लगा कर दे देते। कुछ को पत्ते मे भी लिपेट कर देतो वह इन सूखे पत्तो को पानी में भिंगा कर रखते थे।
उनका चमकता चेहरा ओठ हमेशा पान के चबाने से रचे होते,गले मे पड़ा लाल कलर का गमछा जिसका उपयोग पान लगाने के बाद हाथ को साफ करने का काम करता। मौका मिलते ही ये अपने पीतल के सरौते से सुपड़ी को बारिख-बारिख काटने मे लग जाते।बाकि के पानो को लाल कपड़े मे लिपेट कर रखते,जिससे पान सूखने ना पाये।रात के ग्यारह बजे तक सफेद रोशनी मे बैठे रहते।
एक दिन मेरा दोस्त (सुधीर) मावां खा कर मेरे में आया।और कहा कि कोने वाले पण्डित जी बहुत अच्छ मावां बनाते है।इस वक्त हम दोनो इस जगह मे नये थे।वही दो तीन माह हुए थे।कि इस दुकान का पता चला। कुछ दिन बाद मेरा दोस्त मुझको भी पण्डित जी की दुकान पर ले गया। और कहा जरा दो मावां बनाना। हम दोनो उन्ही के पास में खड़े हो गये। पण्डित जी खुश सुन्दर चेहरा,ओठ रचे हुए।गले मे पड़ा लाल गमछा हाथ मशीन की तरह काम करते। मावां नाम मेरे लिए नया,पर उन दोनो के लिए पुरानाथा।
मेरी नजरे उनको हाथो पर ही थी कि मावां बनता कैसे है? पण्डित जी ने दो कागज़ के टुकड़े लिए और एक ही चीज़ दोनो में रखना शुरू किया। जिसमे सुपाड़ी,पतली-पतली गरी के छिल्को को डाला।एक काला महक वाला पउडर,लाँची,सौफ एक चिपचिप सा पदार्थ डाला जो खुशबू को देने वाला था। पुड़िया बना कर दिया।एक को दोस्त ने खाया और एक को मैने खाया। दोस्त ने बताया कि ये पूरी नांगला माँची मे सबसे अच्छा पान लगाते है।"अरे वाह तब तो ये बहुत अच्छा पैसा कमाते होगें।" पूरी बस्ती मे सबसे ज्याद इतना ही नही कालेखाँ से भी आते है पान खाने।दोस्त धुमक्ड़ था।वो हर शाम मुझे मेरे कमरे मे आ कर बस्ती की एक नई बात सुनाया करता था।
इस तरह सुनते-सुनाते ढेड़ दो साल गुजर गये। शाम का मिलना-जुलना जारी रहा।फिर इसी तरह की एक शाम दोस्त कमरे में आकर चारपाई में बैठ गया। मैं खाना बना रहा था।बाहर पानी की फुहार लगी पड़ी मेरी छत पर,छत पर पड़ी तिरपाल से पट-पट की आवाज आए जा रही थी।
आज दोस्त के तेंवर कुछ बदले-बदले क्या यार तुम भी अजीब आदमी हो पढते हो पढाने मे लगे रहते हों? कुछ बाहर भी निकल के देखा करो। पतीले में चमची चलाते हुए पूछा।आज तेरी दुनियाँ मे क्या हो गया?"दोस्त मेरी ही दुनियाँ मे नही पूरी बस्ती में"बस्ती मे ऐसा क्या?
“ऐसा क्या नही? ये बस्ती दो तीन महिने मे टूट जायेगी।"
अरे नही!
अरे नही देख लेना मैं तो बाजार वाली मस्ज़िद से सुन कर आ रहा हूँ।इतना कहते हुए अपने बुआ के घर चला गया। कुछ महिने ही बाद बस्ती का सर्वे शुरू हो गया। इसके बाद कुछ घरो को गिराया जिसमे एन.डी.एस. सी.ओ.एम और लॉग लिखा हुआँ था। उन घरो को चुन-चुन कर गिरा दिया। छोड़ा उन घरों को जिन्के दरवाजे पर पी-98 या जिसमे कुछ भी नही लिखा था।इन सारे घरो मे रहने वाले लोगो ने तीन चार महिने तक कस्मकस की जिन्दगी को गुज़ारा बिना रोशनी बिना पानी और बिना बिना राशन की दुकान के सब कुछ अपने पास से। उस समय भी वशीम भाई अपना घड़ी वाला काउन्टर लेकर उन्ही टूटी फूटी जगाहों पर अपना रियाज़ कायम रखा।
दूसरी तरफ पनवाड़ी जी अपनी दुकान की रौनक उड़ती देख चेहरा भी मुर्झा गया। आज पहले दिन वाला चेहरा नही था।।
मेरा दोस्त (सुधीर) भी अपने गाँव समदहा मानी कलॉ जौनपुर चला गया। अब मेरी भी जिन्दगी मे सूनापन आ गया वाकया ही इस कदर था।
इस स्वर्ग वाली जगह को इन तीन चार महिनों ने नर्क वाली जगह बना दिया। यहा तो जानवर भी रहने के राज़ी नही।ये स्वर्ग सिर्फ तीन चीजो के खो जाने से,एक पानी,दूसरा बाजार, तीसरी बिजली।दुकाने के हट जाने से दूध,आटा वो सारी चीजे जो मन के चलते ही मिल जाया करती थी।
एक पल मे सारे घरो का विस्थापन कर दिया।पुनर्वाषित होने के लिए सावदा घेवरा जे.जे. कॉलोनी मे भेज दिया। स्वर्ग का सुख भोग कर नर्क का कलमा पढते-पढते आज भी वही जुबा चल रही है।विस्थापन के बाद एक नांगला ही नही अपितु और भी जगाहो के लोग इसी तरह की कहानी के शिकार हुए।
जिसमे-: लक्ष्मी नगर,(7,8,16)ठोकर नम्बर,गाँधी नगर,रधुबीर नगर,ओखला, इन्द्रलोक जखीरा,दिलशाद गार्डेन,इंद्रागाँधी एयरपोर्ट,बारा पुला कालेखाँ,इत्यादि अन्य जगाहे से भी विस्थापित होकर सावदा घेवरा जे.जे. कॉलोनी मे पुर्नवाषित हुए है। ये सारे लोग हर तंगी का सामना करते हुए। जिनमे पानी,बिजली,सड़क, बगैर मकानो के ।
स्कूलों के,डिस्पेन्सरियों के,यातायात के साधनो के बिना अपने दिन गुज़ारे। तीन साल बाद कही 25% ही साधन हो पाये है। जिसमे नाली,4स्कूल,1डिस्पेंसरी, इन स्कूल में तालिम की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। साथ मे लोगो ने अपना आसियाना बनाना शुरू कर दिया।कुछ बना रहे है।बनाने में लगे पड़े है।बनाने की उम्मीद बना रहे है।
किसी ने अपना रूप बदला तो,किसी ने अपना काम बदला।पर इन दोनों ने अपनी पुरानी कहानी के वजूदों को पुख्ता किया।पुराने दोनों को याद मे रखते हुए इनकी नयी राह की अनूठी अनोखा नग्मा सुनते है।काम वही जगह वही पर रूप बदला हुआ।
जीवन के कार्य भार के साथ जीवनों पार्यजन का नया तरिका उसी तरह की चौडी सड़क जो स्कूल को छूते हुए यूके लिप्टस वाली सड़क पे जा कर मिलती है। फिर यही सड़क के,जे.डी.आई ब्लाँक से मिलती हुई एच ब्लाँक के सड़क पर जा कर मिल जाती है। जिसके सामने एक शौचालय और स्कूल बना हुआ है। जहा पर सड़क खत्म होती है।
पर ये दोनो लोग उस जगह पर महजूद है। जिसे अभी बस स्टैण्ड के नाम से जाना जाता है। आज ये अपना ठीहा मिलकर नाली के ही ऊपर बनाया हुआ है।जबकि वशीम भाई ई ब्लाँक में रहते है। और पनवाड़ी जी एच ब्लाँक में रहते है।पर ठीहा बी ब्लाँक के स्कूल के बगल से जाती हुई नाली के ऊपर स्कूल की दिवाल के साथ बैठ कर उन दिनो को याद करके यहाँ की हकीकत को बया करते है।
इस जगह में हर मौसम का अनन्द लिया है। जिसे वह अन्य लोगो के सामने किस तरह से रखते है। जिस समय नाली का निर्माण हो रहा था।गर्मी की गर्म हवां अपने साथ उड़ती धूल हम लोगो के ऊपर झोक कर आगे निकल जाती।उस समय घड़ी को बनाने से रोकना पड़ता पान को दूबारा से धोना पड़ता।
शाम के समय जब घर पे हम आपने बालों को धोते तो सर से धूल ही धूल निकलती।मौसम की हर तपन को यही पर बैठ कर सहन किया।वर्षा की आई बूँदो को रोकने के लिए महने मिल कर तिरपाल लगाया।इसी दौरान जब नाली का निर्माण होने लगा तो यह जगह अस्त ब्यस्त हो गयी।उस समय हमारे ठीहें भी बदल गए इस कारण हमको दो या तीन दिन की छुट्टी सी करनी पड़ गयी।
उस समय सड़क भी क्या हो गयी थी?इतना गन्ध मचां हुआ था। लेकिन जब इसका निर्माण हो गया तब हमने फिर से उसी दिवाल के सहारे फिर ठिहा बना लिया।इस चौराहे मे सबसे पहले वशीम भाई फिर पनवाड़ी ने पर आज तो चौराहा ठोहों से भरे पड़े है।चाय की,चाऊमीन की,अण्डे की,सब्जी की छोले भटूरे के ठीहे पनप रहे है।तो कभी ये गायब भी हो जाते है। पर ये दो जिन्दगी हमेशा नजर आते है। चाऊमीन,समोसे,अण्डे,ये सभी साम को ही नजर आते है।
लेकिन वशीम के साथ पनवाड़ी जी सुबह के सात बजे से रात आठ बजे तक अपने ठीहे सजाए रखते है। और भी इन दोनो लोगो का एक खास रोल भी है।जब दिन मे भूख लगती है तो एक लोग देख रेख करते है। दूसरे खाने खा कर आ जाते है।साथ मे पनवाड़ी जी अपनी साईकिल भी रखते है।
वशीम भाई अपने घड़ी के काउण्टर के साथ एक स्टूल भी रखते है जिसमे घड़ी को बनावाने वाले आराम से बैठ सके। जबकि पनवाड़ी जी के पास ऐसा कुछ नहीं। ये तो सिर्फ एक छोटी सी चौकी ही बनाया हुआ है। वशीम जी काम को ध्यान मे रखते हुए एक आइडिया का नम्बर भी रखे हुए जिससे देश विदेश बात कर सकते है। पनवाडी के दो चीनी मिट्टी के बने पात्र जिसमे चूना और कत्था रखते है। अरे! हा एक बात तो रह ही गयी। वशीम जी दिन में पाँच बार मस्जिद मे जाकर नवाज़ अदा करने के लिए जाते है।पनवाडी जी उनके ठीहे की देख रेख करते है। क्योकि घड़ी और कोई नही बना सकता ।लेकिन जब पनवाड़ी जी कभी भी कही जाते है तो वो अपना एक आदमी बैठा कर जाते है,पान तो कोई भी लगा सकता है।
इन बदलती तस्वीरों का वर्णन अभी और ही निराला है।
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