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हसीना जी, बबली

अभी हाल-फिलाल में एक औरत से मुलाक़ात हुई जिनका नाम हसीना है। उनकी उम्र 60 या 65 साल तक की होगी। रंग-साँवला, चेहरा छोटा और भरा हुआ, बाल उम्र के तकाज़े से झड़े हुऐ पर मेहंदी लगाने की वजह से लाल बाल और लाल बालो में सफेदीपन की चमक भी। लाडली फार्म के चक्कर में हमसे मुलाकात हुई।
वो:-क्या मुझे एक लाडली फार्म मिल सकता है, मुझे किसी ने बताया कि यहाँ पर मिलेगा?
हम:-हाँ मैं देखकर देती हूँ। (फाईल में लाडली फार्म खत्म हो गया था।) हम आपको सोमवार को लाकर दे देंगे । आपका नाम क्या है ?
वो:- हसीना। यहाँ से लेकर, सारे लक्ष्मीनगर के लोग मुझे अम्मा जी या बुआ के नाम से जानते हैं ।। मैं तरह-तरह के सरकारी कामों के कागज़ात बनवाने का काम करवाती हूँ। जन्मपत्री, मरनी का फार्म या मृत्यु का प्रमाणपत्र, राशन कार्ड, पेंशन का काम, विधवा पेंशन, विकलांगता का फार्म, लाडली फार्म का काम, दहेज़ को दिलवाने का काम और पहचान पत्र का काम। ये सब कामों की वजह से तो मेरी पहचान है। पर हर तरह का फार्म बनवाने के 1000 रुपए लेती हूँ। बड़े कामों का 5000 रुपऐ लेती हूँ, जैसे की विधवा पेंशन, दहेज का काम, राशन कार्ड का काम। यही सब काम श्यामा भी करवाती है, जो की c-ब्लॉक में रहती है पर वो मुझसे ज़्यादा पैसे लेती है।
एक ही तरह के काम करने वालों के बीच में ये संवाद तो होता ही है पर श्यामा भी बहुत मजबूत औरत है। उनका काम दाई माँ ‌वाला है । जो पूरे सावदा के घरो को क़दमो से मापती है। एक तरह से सलाहकार के रुप में पूरे सावदा में घूमती हैं लेकिन उनका कागजात वाला रुप नहीं सुना था कभी।)

हसीना जी:- श्यामा को तो मैं काफी समय से जानती हूँ। वो ये भी काम करती है आपसे मिलने का तरीका और हमसे रोज़ मिलने का तरीका तो अलग होगा ही।
(वो भी बहुत ही मशहूर हस्ती है। सावदा का हर घर उनको जानता है। ये भी लग रहा था कि इस बातचीत में शायद कुछ नया नहीं हो सकता है। दोनों की हस्ती ही मशहूर लगी। अपने-अपने दर्जे पर। लेकिन रोज़ का मिलना और कभी-कभी के मिलने को शायद समझा रही थी। ये मिलना हमारे काम से और वजहों से बदल भी जाता है। हमारे सामने खुद को उन्होनें एक दाई के रुप में प्रस्तुत किया पर जहाँ वो रहती हैं उस जगह के रिश्तों को वो अपने तरह से जीती होंगी।)

हम:-एक तरह के कागज़ात किस तरह से तैयार होते हैं?
हसीना जी:- मैं एक तरह के कागज़ात बनवाने के 1000 रुपऐ लेती हूँ। जिसमें कि 500 रुपये मेरे होते हैं और बाकी के पैसे उन अफ़्सरों के होते हैं जो कि ये काम करते हैं। मेरे वाले 500 रुपऐ में मेरा किराया और मेरा खाना-पीना। मैं सुबह साढ़े आठ बजे तक उठकर दिल्ली गेट वाली बस लेती हूँ। ये अफ़्सर भी सारे काम यूँ ही नहीं करते क्योंकि इनको भी फँसने का डर होता है तो मुझे इन सब चीज़ों का ख्याल रखना होता है।

हम:- एक तरह के फार्म बनवाने में आपकी किस तरह की ज़िम्मेदारी होती है?
हसीना जी:- देखिए, मैं पढ़ी-लिखी तो हूँ नहीं। लोग मुझे अपना फार्म भरकर देते हैं ठीक-ठाक। मैं उस फार्म को दिल्ली गेट पर ले जाकर पहले मुहर लगवाने का काम करती हूँ और फिर फार्म को जमा करवा देती हूँ और फिर बनकर आ जाता है। उनसे लेना और जमा करने वाली पर्ची लाकर उनको दे देना। मेरी सिर्फ यहीं ज़िम्मेदारी होती है। बाकी बनकर आया या नहीं ये ज़िम्मेदारी मेरी नहीं होती। अगर कुछ गलती हुई तो उसकी ज़िम्मेदारी मेरी नहीं होती।पर मैं इसमें भी मदद करती हूँ ।

हम:-कितना समय लगता है एक तरह के कागज़ात तैयार करने में ?
हसीना जी:-देखिए, मैं तो सिर्फ फार्म जमा करवाने का काम करती हूँ पर बाकी का काम तो उन लोगों का होता है। एक या दो महीने में ये काम होकर आ जाता है। अब देखो मैं तो वो काम करवाती हूँ पर मेरी ही पोती की जन्मपत्री नहीं बनी है। अभी मैं अपनी छोटी बेटी का पहचान पत्र का काम करवाया है। जब भी मैं कोई 2 फार्म बनवाती हूँ तो मेरा एक फार्म का काम बिना पैसों के सस्ते में ही हो जाता है। एक कागज़ात बनवाने में मुझे बहुत ही ज़्यादा दौड़-धूप, भागा-दौड़ी करनी पड़ती है। जो लोग जरुरतमंद होते हैं उनका काम में सस्ते में करवा देती हूँ।

हम:-कितने तरह के हाथों में जाकर एक तरह का फार्म बनता है और कितने तरह के लोगों से पहचान बनी है इस काम की वजह से ?
हसीना जी:-मैं काफी कुछ तो जान पाई हूँ कि कोई भी सरकारी काम किस तरह से होता है। कितने तरह के नेताओं के पास से गुज़रने की वजह हमारा काम होता है।
मैंने जब अपनी बेटी की शादी की थी तो दहेज़ के लिए दरख़्वास्त दी थी। बेटी की शादी हो गई लेकिन ये वाला काम नहीं हुआ। सारे जगह से तो वो काम पास था, जैसे की पहले सरकारी ओफ़िस, फिर एम. एल. ए. के पास से। फिर भी जब मैं वहाँ जाती तो वो बहाना कर जाता और मुझे सुनाता कि आपको पैसों की क्या कमी है? मेरा तो यही पेशा है। जब मैं इतनी तंग थी तो आम लोगों का क्या हाल होगा ।
इस तरह से चक्कर काटते हुए मुझे काफी समय हो गया था। तब मैं सुबह-सुबह ही 10 औरतों के साथ अपनी लड़की को लेकर ताज़दार बाबर के घर पर पहुँच गई। उसने मुझे देखा और 20000 हजार का चैक काटकर दे दिया और मेरे कंधे पर हाथ रखकर कहा कि "हमारी बुआ का काम तो जल्दी कर दिया करो।" पर मैंने ताजदार बाबर को समझा दिया था कि ये पैसा सरकार की तरफ से आता है। आप मुझे अपनी तरफ से नहीं देती हो। मेरा चैक जब मुझे मिला तो मैंने वापिस कर दिया ताजदार बाबर को। पर दहेज़ के सिलसिले में मुझे कई तरह की जानकारी मिल गई। जिसे मैं बाकी लोगों तक पहुँचाती रहती हूँ। कोई भी नेता भीड़ से डरता है, तुम जितनी आबादी लेकर जाओगे, तुम्हारी उतनी ही सुनी जायेगी और आपका काम तेज़ी से होगा। कोई भी जानकारी बाँटने से ज़्यादा मज़बूत होती है।
कोई भी काम करवाने की ख़ास जगह और ख़ास नेता होते हैं। जो सिर्फ उसी काम के लिए होते हैं। कई तरह की तह होती है नेताओं की। पहले तुम्हारे इलाके का नेता, फिर उस इलाके का बड़ा नेता और ओफिस। फिर वो ओफिस जहाँ से वो काम पक्का होगा और फिर उस जगह जहाँ से आपको फार्म प्राप्त होगा। फार्म किसी दूसरी जगह जमा करो और फायदा उठाने के लिए किसी दूसरी जगह जाओ। बहुत मेहनत का काम है ये कागज़ात वाला भी।
हम:- किस तरह से आप इस काम में जुड़ी हो और कितने साल हो गए आपको ये काम करते हुए ?
हसीना जी:-मेरे मियाँ दिल्ली गेट पर ही सरकारी ओफिस में काम करते थे और उनके मरने के बाद मुझे वो काम मिला। लेकिन वो इस तरह का काम नहीं करवाते थे। उनका काम तो फाईलों के रख-रखाव का था। कागज़ात तो बनवाते थे पर कभी-कभार ख़ास जरुरतमंद लोगों का। आज तक उन्होनें उन लोगों से पैसे नहीं लिए। उनके मरने के बाद वहीं के सरकारी ओफ़िसरों ने मुझे ये काम करने की सलाह दी। तब से मैं ये काम करने लगीं। हर औरत को थोड़ा-बहुत अनुभव हो ही जाता है जो उनका पति काम करता है जैसे मुझे अपने मियाँ के काम था। अनपढ़ हूँ पर कागज़ातों की पूरी तरह से पहचान है। मेरे पास हर तरह के फार्म मिलेंगे आपको।

मेरे मियाँ को हर फाइल की पहचान थी। किसी ना किसी रंग या निशान से वो उसको पहचानते थे। जब भी घर से बाहर निकलते थे तो पूरी तैयारी के साथ निकलते। जेब में एक तरह की खास जानकारी को बटोरे हुए। उनके पास आपको एक डायरी मिलेगी, जिसमें सबके फोन नम्बर होते थे। उनका कहना था कि अगर रास्ते में कुछ हो गया तो घर तो पहुंच ही जाऊँगा वरना लोग लावारिस समझ लेंगे।

हम:-(अपने काम से बहुत ही खुश थी वो।लग रहा था कुछ खास काम कर रही हैं।) आप ये काम कब से कर रही हो?
हसीना जी:-समझ लो लक्ष्मीनगर से ही। उनको को मरे हुऐ भी 12-14 साल हो गऐ हैं। तब से ही ये वाला काम कर रही हूँ। यहाँ पर भी मैं सबका काम करवाती हूँ। लक्ष्मीनगर वालों का भी और नंगला माँची वालों का भी।

हम:-लक्ष्मीनगर में तो आपकी खूब पहचान होगी यह मैं जानती हूँ पर सावदा में किस तरह से पहचान बनी है आपकी?
हसीना जी:-अगर जगह पर तुम अच्छा काम करोगे तो लोग तुम्हें पहचानेंगे भी। वैसे ये काम है भी तो ज़रुरी। हर किसी को इस काम की ज़रुरत पड़ती है। किसी ने मुझसे कोई काम करवाया और फिर किसी दूसरे को मेरे बारे में बताना या उसे मेरे पास लाना, बस इसी तरह से पहचान बनी है।
क्या तुम भी किसी तरह का सरकारी काम करवाते हो?

(वो आरकाईव रुम में टंगी हर चीज़ को बड़ी ही ध्यान से देख रही थी । शायद फाईलों को देखकर लगा हो कि हमारा भी कोई सरकारी ओफिस है। तरह-तरह के बड़े-बड़े चार्ट का टंगे होना, हर चीज़ को एक तरह के सवाल के साथ देखती और पूछती।)

हम:-आपको क्या लगता है लोग खुद ना जाकर आपसे डॉक्युमेंट का काम क्यों करवाते हैं?
हसीना जी:-यहाँ पर लोगो की बहुत ज़्यादा कमाई तो है नहीं। रोज़ का कमाना और रोज़ का खाना होता है सबको ही। फिर ऐसे हालात मैं कोई क्यों अपना रोज़ का काम छोड़कर हर सुबह साढ़े-8 की बस को पकड़कर दिल्ली गेट जाये, कंझावला जाये और बेकार की तक़लीफ करे। वैसे भी एक दिन में काम थोड़े ही न हो जाता है। इसलिए लोग इससे अच्छा 1000 रुपऐ देना और घर बैठे काम करवाना पसंद करते हैं।

हम:-क्या आपके पास कभी कोई ऐसा कागज़ात बनाने का काम आया है, जो बनाना बहुत ही मुश्किल हो पर आपने बनाकर दिया हो?
हसीना जी:-हर कागज़ात में कई तरह की उलझन होती है बनवाने में। सरकारी ओफिसर कुछ भी नहीं समझते, वो तो बस अपना काम करने की ही सोचते है, जिससे किसी का कुछ भी बिगड़ता हो उनको कोई मतलब नहीं। दस्तावेज़ की गंभीरता उनके लिए कुछ भी नहीं। रमेश भाई जो मेरा काम करवाते हैं, वो उम्र में मुझसे छोटे हैं पर मुझे भी डांट देते हैं। मुझे उनके पास फोन करके जाना होता है। अगर मन ठीक होता है तो काम करवा देते हैं वरना टाल देते हैं। समस्या का हल तो तभी बताते हैं जब मन ठीक हो ।

इस जगह पर उम्र नहीं ओहदा देखा जाता है। एक बार मेरे पास विधवा पेंशन का काम आया। उसको अपने पति के मरनी का फार्म बनवा था ताकि विधवा पेंशन मिल सके। वो जब एम.सी. डी. के ओफिस गई तो उन्होनें 8 साल बाद का बनाकर दिया। यानि उसका पति मरा था 2002 में और तारीख डाली 2008 की जब इसमें ज्यादा घुसे तो उन्होनें कहा कि हमारे यहाँ पर इसका रिकोर्ड नहीं है, जहाँ पर मरे थे वहाँ का प्रूफ लाओ और ये उस औरत के लिए नामुमकिन था। तब मैंने एफिड-डेफिट बनवाया, मजिस्ट्रेट की मुहर लगवाई और काम हो गया। हर चीज़ का हल होता है, देर है पर काम हो जाता है बस दिमाग लगाना होता है।

मैं:-आप किस तरह से ये काम करती हो?
(इस सवाल को पूछते हुऐ लग रहा था कि जरुर वो अपने सफ़र को लेकर या तरीक़े को लेकर बात करेंगी ।)
हसीना जी:-मेरा रोज का सावदा से दिल्ली गेट जाने का काम है।हर दिन 2-4 फार्म को लेकर जाने का काम करती हूँ और फिर शाम को वहाँ से वापिस आती हूँ। जब ये काम ज्यादा चलता है तो रोज जाना पड़ता है। वरना हफ्ते में 3 या 4 बार जाती हूं। पर रोज जाने से जगह में अपना असर बढ़ता है। जब मेरे फार्म का काम हो जाता है तो वो भी मुझे फोन करके बुला लेता हैं। वैसे उस जगह पर मुझे सब बुआ जी के नाम से हीजानते हैं ।

मैं:-रोज निकलने पर किस तरह की तैयारी होती है आपकी?
हसीना जी:-देखो मेरी उम्र हो गई है।वहाँ पर हमेशा दुपहर का खाना खाने को नहीं मिलता।कई बार तो रास्ते में ही चक्कर आ जाते हैं। उम्र के तक़ाजे की वजह से मैं अपनी पन्नी में सदा ही एक डायरी रखती हूँ, जिसमें मेरा नाम, पता और फोन नम्बर होता है ताकि अगर कोई हादसा हो जाए तो कोई घर तो पहूँचा ही दे। ये मैं सिर्फ अपने लिऐ करती हूँ। उसमें हर जगह का नम्बर होता है। ये कहती हुई वो एक छोटी सी कुचली, पसीजी हुई डायरी दिखाने लगी।

"बेटा तुम भी अपनी पहचान की चीज़ अपने पास रखा करो। वो बाहर हिफाज़त करती है।"
मैं किसी को अपने पेशे में जोड़ती नहीं हूँ क्योंकि मैंने एक को जोड़ा था वो मेरे से ही सिखकर, मेरी ही रोज़ी-रोटी पर लात मारने में लगा था। उसका नाम मनोज था, जब वो सीख गया तो जिसे करने के मैं 1000 रुपये लेती हूँ वो 800 रुपऐ में करवाने लगा था।जिससे मेरा काम मंदा हो गया पर मेरे सरकारी ओफिसर ने उसको डांट दिया कि ये जगह हमारी बुआ की है। तब से वहाँ उसके किसी भी काम की कोई एन्ट्री नहीं होती।

(वो अपनी ज़िन्दगी का बहुत ही हसीन पल हमारे साथ बांट रही थी। सरकारी कामो में फंसना और फिर निकलना, रोज़ की रुटीन में अपना ही एक तरह का सफ़र तैयार करके निकलती है हसीना बुआ। जो बहुत ही महत्वपूर्ण रुख खोलती हैं अपना। कितनी ही तरह की रुटीन से निकलती हुई ये अपना रुटीन तैयार करती हैं। सावदा को देखने की नज़र बहुत ही सटीक सी लगी, काम से जुड़ने की।)
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