कब बड़ी हो गई, Jaanu
रोज का देखना, सोचना एक दिन सवाल बन कर आया। गाँव और शहर में कोई ज़्यादा फासला नही था। गाँव जो दिल्ली के ही हैं। शहर से आये विस्थापित लोग जिन्हें सावदा घेवरा जे.जे. कॉलोनी का नाम मिला। उसमें हर तरह के लोगों को अपना अशियाना मिला। जिसमें हर तरह की भाषा, हर तरह के पर्व और हर तरह का पहनावा देखने को मिलता है। जो अपनी ठोस गाढ़ी छवि को लिए हुए है।
ठण्ड की फुहार लिए अक्टूबर का महीना आया। सूरज कहीं आसमान में दिखता तो कहीं बदली में छुपता-निकलता और अंधेरे की परछाई में गुम हो जाता। रात सन्नाटे में कट जाती।
रोज का देखना, सोचना एक दिन सवाल बन कर आया। गाँव और शहर में कोई ज़्यादा फासला नही था। गाँव जो दिल्ली के ही हैं। शहर से आये विस्थापित लोग जिन्हें सावदा घेवरा जे.जे. कॉलोनी का नाम मिला। उसमें हर तरह के लोगों को अपना अशियाना मिला। जिसमें हर तरह की भाषा, हर तरह के पर्व और हर तरह का पहनावा देखने को मिलता है। जो अपनी ठोस गाढ़ी छवि को लिए हुए है।
अगर इनका आकलन करें तो हमें दो दर्पण मिलेंगे। एक सावदा गाँव और घेवरा गाँव जिसमें शहरी कॉलोनी का मुखौटा साफ-साफ दिखता है।
रिक्शों का चलना, बसों का आना-जाना, बिजली की चमका-चमकी और इधर-उधर फैली केबल जिसमें हर समय फिल्मी गानो के साथ, सतरंगी फिल्मो का दिन भर चलते रहना।
एन.डी.पी.एल का बड़ा सा पावर हाऊस का बन जाना, खरंजो का बिछना, पानी के टैक्करों का समय-समय के साथ आना, शाम में बाज़ारों का लगना, देर रात के ग्यारह बजे तक लोगों का आना-जाना और चहल-पहल का बना रहना। इन सारी छवियों के साथ हल्की-हल्की रोशनी को जलाए हुए बसों का आना-जाना ये सारी शहरी परछाई उन दोनों दर्पणों में साफ दिखती है।
सावदा गाँव की ओर जाती सड़क रात के सन्नाटे में कटती जबकि घेवरा गाँव की तरफ पहुँचते हुए यही सड़क चहल पहल की निशानी बनती जा रही है। रिक्शा के आवागमन के साथ-साथ बीच में पानी की टंकी बनाने वाली फैक्टरी में शोर-गुल होता रहता है।
सड़क के दोनों किनारे (सावदा गाँव-घेवरा गाँव) अपना एक अलग रंग दर्ज करते रहते हैं।
सावन से पहले और सावन के बाद तक कर्वी, ढाँचा, बरसिम, गेहूँ से सजे सभी खेत अपनी खुशहाली को दर्ज कर रहे थे। खेतों के आस-पास लगे कई ट्यूबवेलों में रात को जलती रोशनी पूरी फसल पे पहरे मार रही थी। कुछ दिनों बाद ये फसलें चली जाती और दूसरी फसलें आ जाती। ये फसलों का अपना समय चक्र बनता बिगड़ता रहता ये सब देखते -देखते तीसरा साल पूरा होने वाला है।
पानी से नहाये खेत सारा पानी पी चुके थे और मिट्टी नमी बनाए हुए थी। इसी दौरान सुबह शाम खेतों में ट्रैक्टर चलते दिखते। खेत में हल पहटा (हल के साथ लगा एक चौड़ी लकड़ी का पट्टा) एक साथ चलते हल मिट्टी को खुरेदता जाता और पहटा मिट्टी बराबर करता जाता।इन्हीं हल पहटा के साथ खाद, बीज बोने वाली मशीन भी साथ दे रही होती है। मशीन में बीज डाल देते हैं जो एक नलकी से गिरता जाता और पहटा से दबता जाता। अगले दिन यही लगता कि खेत में कुछ नही बोया गया ।
अब सड़क के इस तरफ भी देख लेते है। खेतों का काम एक जैसा पर थोड़ा सा परिवर्तन लगा। पहले सूखी कर्वीं को काट कर अपने घर ले गये। जिस तरह उधर के खेतों में किया ठीक वैसे ही इधर भी उसी तरह से बीज बोया गया।
सुबह की ओस सूखी नहीं। खेत की मिट्टी नमी के साथ मुस्कुरा रही थी। एक ताऊ अपने खेत में सफेद कपड़े पहने हुए, पैरो में स्पोर्ट के सफेद जूते, गले में पड़ा मुलायम शॉल। हाथो में पाँचा लिए हुए साथ में ताई जो सलवार-कुर्ता, काली जूती, हरा शॉल। वह भी अपने हाथ पाँचा के डोरी पकड़े हुए दोनों साथ-साथ मिलकर मिट्टी की मोटी-मोटी रगीनी बना रहे थे।
गुड़ बेचने वाला व्यापारी सड़क से कॉलोनी की तरफ जा रहा था। ताई ने अवाज दिया "ओ गुड़ वाले रूकना जरा" वह घोड़े की लगाम को टाईट करता हुआ रूक गया। ताऊ पाँचे को रगीने में रखते हुए घोड़ा गाड़ी के पास पहुँचे और गुड़ के उपर पड़े तिरपाल को हटाते हुए कहा "कैसे दे रहे हो?" व्यापारी ने जवाब दिया "बीस रुपये किलो।" ताऊ ने पाँच का नोट देकर गुड़ का एक चीपा उठा लिया ।तिरपाल को वैसे ही छोड़ दिया। सही से गुड़ को ढकते हुए फिर से लगाम को ढीला कर व्यापारी कॉलोनी की तरफ चल दिया। सड़क अपने पुराने रफ्तार से जीने लगी।
दिन यूँही गुज़रते गये। शाम का वक्त था। कोहरा नुमा धुआँ दोनों गाँव को छुपाने में लगा था।वही सड़क, वही पुराना माहौल खाली मैदान। मैदान में खेलते सारे गाँव के नौजवान। अपने खेल वाले वर्दी के साथ बॉली-बॉल खेलते। यह तो उनका रोज का नियम था। इनकी मंहगी से मंहगी गाड़ी मैदान में खड़ी होकर इनका उत्साह बढ़ाती रहती। एम.सी.डी.का दफ्तार आराम फरमाता रहता अपने बन्द दरवाज़े के साथ।
पानी की टंकी वाली कम्पनी में काम करने वाले कर्मचारी की आवज़ें। ट्रक में पानी की टंकी लोड करते और लोड करके कीकर के पेड़ों के नन्हीं-नन्हीं पत्तियों को सड़क पर गिराते हुए निकल जाते। कभी-कभार पुलिस की सहायता वाली गाड़ी उन्हीं पेड़ों के नीचे खड़ी नज़र आती पर आज नहीं।
ठण्डी का एहसास करते हुए बोला "ये देखो कितनी जल्दी बड़ी हो गयी।" मेरा मन कहीं और था नज़र पूरी सड़क पर दौड़ाते हुए बोला पर मुझे समझ नही आया। दोस्त ने कहा "दिमाग कहाँ है आपका?”
देखो, इन सरसो के खेतों को देखो। मैं सरसो की बात कर रहा हूँ। अब दोस्त को पुराने दिनों को दोहराते हुए सारे खेतों की कहानी को कह सुनाया कि उस समय यह भी नही पता था कि इसमें क्या बोया गया था। इस खेत में छ: सात दिन पहले ताऊ इसमें पानी दे रहे थे और कुछ ही दिन बाद 'कितनी बड़ी हो गयी।' सरसो के पीले-पीले फूल भी खिल आये। दोस्त बोला कि "हमें देखते -देखते तीसरा साल चल पड़ा है पर इस खेत में हमने बस यही फसल देखी है और हाँ बहुत बिकट सरसों पैदा होती है इसमें ।" नयी पनपती फसल को देखते हुए कहा कि यार "प्यारी फसल पर नजर मत लगाओ।"
रोज का देखना, सोचना एक दिन सवाल बन कर आया। गाँव और शहर में कोई ज़्यादा फासला नही था। गाँव जो दिल्ली के ही हैं। शहर से आये विस्थापित लोग जिन्हें सावदा घेवरा जे.जे. कॉलोनी का नाम मिला। उसमें हर तरह के लोगों को अपना अशियाना मिला। जिसमें हर तरह की भाषा, हर तरह के पर्व और हर तरह का पहनावा देखने को मिलता है। जो अपनी ठोस गाढ़ी छवि को लिए हुए है।
अगर इनका आकलन करें तो हमें दो दर्पण मिलेंगे। एक सावदा गाँव और घेवरा गाँव जिसमें शहरी कॉलोनी का मुखौटा साफ-साफ दिखता है।
रिक्शों का चलना, बसों का आना-जाना, बिजली की चमका-चमकी और इधर-उधर फैली केबल जिसमें हर समय फिल्मी गानो के साथ, सतरंगी फिल्मो का दिन भर चलते रहना।
एन.डी.पी.एल का बड़ा सा पावर हाऊस का बन जाना, खरंजो का बिछना, पानी के टैक्करों का समय-समय के साथ आना, शाम में बाज़ारों का लगना, देर रात के ग्यारह बजे तक लोगों का आना-जाना और चहल-पहल का बना रहना। इन सारी छवियों के साथ हल्की-हल्की रोशनी को जलाए हुए बसों का आना-जाना ये सारी शहरी परछाई उन दोनों दर्पणों में साफ दिखती है।
सावदा गाँव की ओर जाती सड़क रात के सन्नाटे में कटती जबकि घेवरा गाँव की तरफ पहुँचते हुए यही सड़क चहल पहल की निशानी बनती जा रही है। रिक्शा के आवागमन के साथ-साथ बीच में पानी की टंकी बनाने वाली फैक्टरी में शोर-गुल होता रहता है।
सड़क के दोनों किनारे (सावदा गाँव-घेवरा गाँव) अपना एक अलग रंग दर्ज करते रहते हैं।
सावन से पहले और सावन के बाद तक कर्वी, ढाँचा, बरसिम, गेहूँ से सजे सभी खेत अपनी खुशहाली को दर्ज कर रहे थे। खेतों के आस-पास लगे कई ट्यूबवेलों में रात को जलती रोशनी पूरी फसल पे पहरे मार रही थी। कुछ दिनों बाद ये फसलें चली जाती और दूसरी फसलें आ जाती। ये फसलों का अपना समय चक्र बनता बिगड़ता रहता ये सब देखते -देखते तीसरा साल पूरा होने वाला है।
पानी से नहाये खेत सारा पानी पी चुके थे और मिट्टी नमी बनाए हुए थी। इसी दौरान सुबह शाम खेतों में ट्रैक्टर चलते दिखते। खेत में हल पहटा (हल के साथ लगा एक चौड़ी लकड़ी का पट्टा) एक साथ चलते हल मिट्टी को खुरेदता जाता और पहटा मिट्टी बराबर करता जाता।इन्हीं हल पहटा के साथ खाद, बीज बोने वाली मशीन भी साथ दे रही होती है। मशीन में बीज डाल देते हैं जो एक नलकी से गिरता जाता और पहटा से दबता जाता। अगले दिन यही लगता कि खेत में कुछ नही बोया गया ।
अब सड़क के इस तरफ भी देख लेते है। खेतों का काम एक जैसा पर थोड़ा सा परिवर्तन लगा। पहले सूखी कर्वीं को काट कर अपने घर ले गये। जिस तरह उधर के खेतों में किया ठीक वैसे ही इधर भी उसी तरह से बीज बोया गया।
सुबह की ओस सूखी नहीं। खेत की मिट्टी नमी के साथ मुस्कुरा रही थी। एक ताऊ अपने खेत में सफेद कपड़े पहने हुए, पैरो में स्पोर्ट के सफेद जूते, गले में पड़ा मुलायम शॉल। हाथो में पाँचा लिए हुए साथ में ताई जो सलवार-कुर्ता, काली जूती, हरा शॉल। वह भी अपने हाथ पाँचा के डोरी पकड़े हुए दोनों साथ-साथ मिलकर मिट्टी की मोटी-मोटी रगीनी बना रहे थे।
गुड़ बेचने वाला व्यापारी सड़क से कॉलोनी की तरफ जा रहा था। ताई ने अवाज दिया "ओ गुड़ वाले रूकना जरा" वह घोड़े की लगाम को टाईट करता हुआ रूक गया। ताऊ पाँचे को रगीने में रखते हुए घोड़ा गाड़ी के पास पहुँचे और गुड़ के उपर पड़े तिरपाल को हटाते हुए कहा "कैसे दे रहे हो?" व्यापारी ने जवाब दिया "बीस रुपये किलो।" ताऊ ने पाँच का नोट देकर गुड़ का एक चीपा उठा लिया ।तिरपाल को वैसे ही छोड़ दिया। सही से गुड़ को ढकते हुए फिर से लगाम को ढीला कर व्यापारी कॉलोनी की तरफ चल दिया। सड़क अपने पुराने रफ्तार से जीने लगी।
दिन यूँही गुज़रते गये। शाम का वक्त था। कोहरा नुमा धुआँ दोनों गाँव को छुपाने में लगा था।वही सड़क, वही पुराना माहौल खाली मैदान। मैदान में खेलते सारे गाँव के नौजवान। अपने खेल वाले वर्दी के साथ बॉली-बॉल खेलते। यह तो उनका रोज का नियम था। इनकी मंहगी से मंहगी गाड़ी मैदान में खड़ी होकर इनका उत्साह बढ़ाती रहती। एम.सी.डी.का दफ्तार आराम फरमाता रहता अपने बन्द दरवाज़े के साथ।
पानी की टंकी वाली कम्पनी में काम करने वाले कर्मचारी की आवज़ें। ट्रक में पानी की टंकी लोड करते और लोड करके कीकर के पेड़ों के नन्हीं-नन्हीं पत्तियों को सड़क पर गिराते हुए निकल जाते। कभी-कभार पुलिस की सहायता वाली गाड़ी उन्हीं पेड़ों के नीचे खड़ी नज़र आती पर आज नहीं।
ठण्डी का एहसास करते हुए बोला "ये देखो कितनी जल्दी बड़ी हो गयी।" मेरा मन कहीं और था नज़र पूरी सड़क पर दौड़ाते हुए बोला पर मुझे समझ नही आया। दोस्त ने कहा "दिमाग कहाँ है आपका?”
देखो, इन सरसो के खेतों को देखो। मैं सरसो की बात कर रहा हूँ। अब दोस्त को पुराने दिनों को दोहराते हुए सारे खेतों की कहानी को कह सुनाया कि उस समय यह भी नही पता था कि इसमें क्या बोया गया था। इस खेत में छ: सात दिन पहले ताऊ इसमें पानी दे रहे थे और कुछ ही दिन बाद 'कितनी बड़ी हो गयी।' सरसो के पीले-पीले फूल भी खिल आये। दोस्त बोला कि "हमें देखते -देखते तीसरा साल चल पड़ा है पर इस खेत में हमने बस यही फसल देखी है और हाँ बहुत बिकट सरसों पैदा होती है इसमें ।" नयी पनपती फसल को देखते हुए कहा कि यार "प्यारी फसल पर नजर मत लगाओ।"
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