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चुनाव, जानू.नागर

आज का दिन चुनाव का आखरी दिन था। 28/11/2008 की तारीख ही बची थी। ये तारीख बस्ती में एक उत्तेजना भरने से कम नहीं थी। पूरे दिन मस्ती का माहौल था। कोई किसी से कम नहीं सभी अपनी धारणाओं को तराशते काटते-छाटते फिरते गलियों में। सभी उम्मीदवार अपना नाम, अपना चुनाव निशान, अपने-अपने उम्मीदवार के जरिये सभी के घर-घर जा कर उनको यही बताते कि सिर्फ इनको वोट देना है और किसी को नहीं देना है। यहाँ तक की भाजपा वालों ने अपने चुनावी निशान वाले लिफ़ाफ़े पर गारजियन के नाम के साथ पूरे परिवार की पर्ची दी जिन्हें वोट डालना था।
कुछ पार्टी के लोग तो ऐसे ही घर-घर जा कर पर्ची दे रहे थे। सबका अपना -अपना रूल था। चुनाव निशान में घड़ी, कमल का फूल, हाथ का पंजा, हाथी, रेल का इंजन, इनके अलवा मोमबत्ती कहीं बुती पड़ी थी। इनमें बच्चो का सबसे बड़ा रोल दिख रहा था।
एक नीली गाड़ी, नीला हाथी का पुतला जो कार के छत पर खड़ा था। एक 22या 23 साल का लड़का कार की छत पर खड़ा होकर बच्चो में उनकी उत्तेजना का फोर्स भरने में लगा पड़ा था। जिसमें पोस्टर, स्टीकर, टोपी जिसमें हाथी छपा था। वो इन चीज़ों को बच्चो के बीच लुटा देता। बच्चे आपस में झगड़ जाते, रगड़ जाते पर उन लुटाई गयी चीज़ों को बीनने को टूट पड़ते और कुछ-ना-कुछ पा जाते। बच्चो में जो ताकतवर होता वो ज़्यादा लूट पाता है।
इन सामानों को लुटाने वाला सवालिया नारा लगाता कि "हाथी की क्या पहचान?”
बच्चे कहते "नीला झण्ड़ा हाथी का निशान।" यह नारे बाजी का हो-हल्ला एच, जी ब्लॉक की सड़क में हो रहा था।

कहीं से एक काले शीशे वाली गाड़ी आकर रुकी। बच्चे अब हाथी के पास से भाग चले। उस गाड़ी की तरफ उसके अन्दर झांकने के लिए। आम समय में यहाँ एकदिन में इतनी गाड़ियाँ देखना दूभर है पर अभी तो कॉलोनी में आयी कोई भी गाड़ी का कोई मायना नहीं था। सारी की सारी गाड़ी चुनाव वाली ही नज़र आती क्योंकि चुनावी प्रचार-प्रसार का भूत जो सवार है।

आम दिनों में एक वाहन की परिभाषा रखने वाली गाड़ियाँ इन दिनों में 'चुनावी गाड़ी' बन जाती हैं। और इतना ही नहीं ये सारी गाड़ियाँ बच्चो का खिलौना ही साबित हो रही थी। सारे के सारे वही नारों की आवाज़ करने में लग जाते जो चुनाव निशान दिख जाता। मानो हाथी वाला तो वही नारा लगाते, जीतेगा भाई जितेगा हाथी वाला जीतेगा। इस तरह पार्टी के सामने उसी की जय-जय कार करने में लग जाते। पर इस गाड़ी के पास गये तो कोई निशान नहीं। फिर भी बच्चे अन्दर वाले से बोले शीशा खोलो। शीशा नहीं खुला तो पूरी गाड़ी को पीटने लगे। ऐसे में गाड़ी वाले ने गाड़ी को चालू कर आगे चला गया।
बच्चे समझे थे नेता आया है। कुछ बाटने वाले नहीं है। तभी काले शीशे में आया है कि कोई देख ना ले।

एक बार फिर से सब नीली वाली कार की तरफ भाग खड़े हुए, उसके ही नारे फिर से गाने लगे।
"बटन किस पर दबेगा?”
"हाथी पर।"
जैसा रूख दिखता वैसी ही हवा बहने लगती। इस तरह सारे दिन गर्मा-गर्मी मची रही। इसी ढोल-ताशों के साथ कई बड़ी-बड़ी रैली आयी। जिनकी आवाज़ कानो की लय बन कर रह गयी, जो एक आन्नद की अनुभूति देकर चली गयी।
हर पार्टी ऊतना ही शक्तिशाली दिखती जितना पहले वाली पार्टी दिखाकर जाती। सबसे पहले भाजपा की रैली, दोपहर के समय कांग्रेस की रैली। जिसमें कॉलोनी के लोग भी शामिल हैं जैसे कि आलम प्रधान, मुन्ना, साथ में ढेर सारी महिलाए जो हर ब्लॉको में जाकर नाच कूद करते ढोल-ताशो के साथ। कहते "राहुल गाँधी ज़िन्दाबाद, सोनिया गाँधी ज़िन्दाबाद।" भाईयों हाथ के निशान को भूल ना जाना जो हमारे शरीर का अभीन्न अंग है।
लास्ट रैली तो और भी भीड़ को लेकर कॉलोनी में निकल पड़ी। जिसमें केमरा वाला, एक वैन, कुछ औरतें भी, साथ में चुनाव निशान रेल का इंजन। शाम की हवा भारी हो रही थी क्षैतिज दिशा को देख कर ऐसा लगता की गाँव के घरों का सारा धुआँ कॉलोनी के चारों कोनों पर छाने लगा हो। ऐसा लगा मानो कुहासा अभी से बढ़ चला हो। सूरज कहीं नीले आकाश के क्षैतिज में ठहर सा गया हो।
चारों तरफ सिर्फ काना-फूसी ही चल रही थी कि कौन जीतेगा। हर जगह सिर्फ यही बात पता करने में लगे पड़े थे। बताओ आपका वोट किस में जायेगा?
अभी तो अपने आप पर भरोसा नहीं तो दूसरों का क्या बताए?
किसी पार्टी के नेता ने पूछा कि यहाँ पर किसका दबदबा है?
जवाब दिया अभी कुछ साफ़ नहीं है। यहाँ पर दो पार्टी का दम दिख रहा है।
वो कौन सी हैं?
कांग्रेस और दूसरी भाजपा है।
देखते हैं इन दोनों में कौन ज़्यादा वोट ले जाता है। समाजिक पासा पलटने में टाइम नहीं लगता। देखते हैं कौन ऊपर होगा और कौन नीचे होगा?
जिसे एक नवाब जी ने बड़े ही अदब लहज़े में कहा कि वादा कोई कितना भी करे पर जितना काम कांग्रेस सरकार ने किया ऊतना काम आज तक किसी सरकार ने नहीं किया है। जो सच है। दिल्ली की जितनी भी जे.जे. कॉलोनी है सब कांग्रेस की सरकार में बसी है। सब में 'पुरी' का ज़्यादा इस्तेमाल किया है।
जैसे-: कल्याणपुरी, त्रिलोकपुरी, सुलतानपुरी, गौतमपुरी जहाँगीरपुरी, मंगोलपुरी, मंगलापुरी, दक्षिणपुरी, विकाशपुरी, सीमापुरी, इनके अलावा होलम्बी कला, नरेला, नांगलोई, मादीपुर, मदनपुर खादर, भलस्वा, बवाना, सावदा-घेवरा, बक्करवाला, बपरौला, और भी हैं इत्यादी।
पर इन सब में बवाना एक ऐसी कॉलोनी है जिसको भाजपा ने बसाया है।
जिस तरह ताश के खेल में चार लोग खेलने के लिए बैठते है। दांव चालू होता है। सभी अपना -अपना दांव मारते हैं। सब एक-एक पत्ता फेंकते हैं पर पूरी बाजी एक ही पत्ते से पलट जाती है। वही सारा खेल अपनी तरफ कर लेता है। किसी को गड्डी पीसना पड़ता है। तो एक-दो बार खेल कर बचा लेता तो है।तो किसी पर कोट चढ़ जाता है। यही खेल चुनावी मैदान में है। देखते है कौन बाजी मारकर ले जाता है।
सभी अन्दरूनी चुप हैं और चुनाव के नतीजे आने के इंतज़ार में।
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