इलेक्शन, शमशेर
आज हवा में धूल नहीं है। इसका कारण देर रात हुई बारिश है। रोज़ आसमान में चमकता सूरज आज ला-पता है। बादलों के घेरों ने आज घेवरा के लोगों की परछाई उनसे जुदा करदी है।
तेज़ और सर्द हवा हर तरफ ज़ोर-शोर से बह रही है। जैसे घेवरा में ठण्ड का आगमन हो गया है। बदन पर जर्सी, शोल जैसे कपड़े कुछ ने लादे हुए और कुछ ने पहन रखे हैं। कोहरा अब धीरे-धीरे कुछ खुलता हुआ सा है। बहते हुए कोहरे में पूरा माहौल स्लोमोशन में चलते हुए लगता है।
रोज़ाना के धूप की तरह आज लोग भी खिले हुए और तादाद में नहीं है। जैसे हवाओं ने उन्हें छितरा दिया है। खुले रूप में दिखने की जगह लोग अलग-अलग जगह समुह में दिखाई दे रहे हैं।
अपने में मग्न होने वाला हमेशा का माहौल जो सबसे बनता है पर फिर भी कहीं उसमें हर कोई अकेला(इंडिविज़्युल) होता है आज वह नहीं था। माहौल की गति भांपने के लिए अपने पैरो से दूर ब्लॉकों को पार करते हुए नज़र दौड़ाई तो कानों में आती आवाज़ें जैसे हवा में खो गई हो और एक गहरा सन्नाटा सा महसूस हुआ। मैं दो क़दम चलता और मौसम से देखने में बदलाव नज़र आता। जो कभी लगता के प्राकृतीक अहसास हो रहा है तो कभी लगता के यह मेरा खुद का ज़बरन दर्ज करना है।
ऐसी रंगत में शरीर लबादों से भारी और अकड़न से सिकुड़ जाता है। इन्हीं में चर्चाओं का सिलसिला करवटें लेता हैं और अंगड़ाई लेकर पिछले कई दिनों को दोहराने के लिए तैयार होता है। अखबारों की सरगर्मी और चाय की चुस्की में जैसे एक रिश्ता है जो नुक्कड़ पर चार पत्थर लगाकर भी अपना वजूद बना लेती है।
कई दिनों से इलैक्शन की तैयारी ज़ोर शोर से चल रही है। जहाँ देखो अलग-अलग पार्टियों के अपने अलग-अलग चर्चा करने के पर्चे ज़मीन पर हवा से इधर-उधर उड़ रहे हैं।
सावदा में कारों का कारवां इससे पहले इतना नहीं था जितना कि अभी के समय में है। हर एक दिन छोड़कर दूसरे दिन कोई ना कोई पार्टी का एक काफ़िला अपने ढेर से नारेवादी और नारों के साथ पहुँच जाते हैं।
एक ब्लॉक के सामने से गुज़रते हैं और फिर दूसरे ब्लॉक के पास अपना जमावड़ा बना लेते हैं। वादों का सिलसिला शुरू होता है और इन्हीं के साथ प्रचार करने के हर तरीके या हथकण्डे मौजूद होते हैं। ढोल-ताशे भीड़ बनाने के लिए बेहद ज़रूरी होते हैं और गाड़ियों पर लगे भौंपू अपनी बात कहने के लिए।
कभी-कभी यह काफ़िला रैली बन जाता है। रैली जो एकता का और ताकत का निशान बनता है। जितनी लम्बी गाड़ियों की लाइन और उसमें सवार लोग होगे उतनी मजबूती आती है पार्टी की छवि में। भारी तादाद में आना और बहुत तादाद में लोगों को इकट्ठा करना ही अपने में बहुत बड़ी सफलता ज़ाहिर करता है।
सावदा के लोगों के लिए यह सब होना आम नहीं है। सभी होती इन क्रियाओं से भलीभाँती परिचित हैं लेकिन यहाँ सब नया सा है। रिसेटलमेंट कॉलोनी जो सभी यहाँ आने से पहले बस्ती हुआ करती थी। वहाँ घर के दरवाज़ों पर ऐसा मजमा पहले नहीं देखा गया है। तंग गलियों में खड़े होना ही बहुत बड़ी बात हुआ करती थी गाड़ियों की रेलगाड़ी बनते देखना तो बहुत असाधारण दृश्य है। इसके नये होने के और भी कारण है जैसे पहली बार सावदा में इलेक्शन होना।
एक समुह में होती बातचीत से पता चला कि सावदा गाँव में तो पहले भी वोट डलते थे पर पहली बार इतनी जनगणना से यहाँ मतदान हो रहा है और इसकी वजह हम हैं क्योंकि सावदा जे.जे. कॉलोनी में ही आधे से भी ज़्यादा मतदाता है। लगभग 20हज़ार मतदाता है यहाँ जो आसपास के इलाके में इतनी आबादी है नहीं।
छोटे-बड़े, हर कोई इस होती हलचल में कहीं-न-कहीं शामिल है। बच्चे जहाँ इन इवेंट को खेल में ले रहे हैं तो वहीं व्यसक मतदान के दिन के इंतज़ार में है।
रोज़ाना के धूप की तरह आज लोग भी खिले हुए और तादाद में नहीं है। जैसे हवाओं ने उन्हें छितरा दिया है। खुले रूप में दिखने की जगह लोग अलग-अलग जगह समुह में दिखाई दे रहे हैं।
अपने में मग्न होने वाला हमेशा का माहौल जो सबसे बनता है पर फिर भी कहीं उसमें हर कोई अकेला(इंडिविज़्युल) होता है आज वह नहीं था। माहौल की गति भांपने के लिए अपने पैरो से दूर ब्लॉकों को पार करते हुए नज़र दौड़ाई तो कानों में आती आवाज़ें जैसे हवा में खो गई हो और एक गहरा सन्नाटा सा महसूस हुआ। मैं दो क़दम चलता और मौसम से देखने में बदलाव नज़र आता। जो कभी लगता के प्राकृतीक अहसास हो रहा है तो कभी लगता के यह मेरा खुद का ज़बरन दर्ज करना है।
ऐसी रंगत में शरीर लबादों से भारी और अकड़न से सिकुड़ जाता है। इन्हीं में चर्चाओं का सिलसिला करवटें लेता हैं और अंगड़ाई लेकर पिछले कई दिनों को दोहराने के लिए तैयार होता है। अखबारों की सरगर्मी और चाय की चुस्की में जैसे एक रिश्ता है जो नुक्कड़ पर चार पत्थर लगाकर भी अपना वजूद बना लेती है।
कई दिनों से इलैक्शन की तैयारी ज़ोर शोर से चल रही है। जहाँ देखो अलग-अलग पार्टियों के अपने अलग-अलग चर्चा करने के पर्चे ज़मीन पर हवा से इधर-उधर उड़ रहे हैं।
सावदा में कारों का कारवां इससे पहले इतना नहीं था जितना कि अभी के समय में है। हर एक दिन छोड़कर दूसरे दिन कोई ना कोई पार्टी का एक काफ़िला अपने ढेर से नारेवादी और नारों के साथ पहुँच जाते हैं।
एक ब्लॉक के सामने से गुज़रते हैं और फिर दूसरे ब्लॉक के पास अपना जमावड़ा बना लेते हैं। वादों का सिलसिला शुरू होता है और इन्हीं के साथ प्रचार करने के हर तरीके या हथकण्डे मौजूद होते हैं। ढोल-ताशे भीड़ बनाने के लिए बेहद ज़रूरी होते हैं और गाड़ियों पर लगे भौंपू अपनी बात कहने के लिए।
कभी-कभी यह काफ़िला रैली बन जाता है। रैली जो एकता का और ताकत का निशान बनता है। जितनी लम्बी गाड़ियों की लाइन और उसमें सवार लोग होगे उतनी मजबूती आती है पार्टी की छवि में। भारी तादाद में आना और बहुत तादाद में लोगों को इकट्ठा करना ही अपने में बहुत बड़ी सफलता ज़ाहिर करता है।
सावदा के लोगों के लिए यह सब होना आम नहीं है। सभी होती इन क्रियाओं से भलीभाँती परिचित हैं लेकिन यहाँ सब नया सा है। रिसेटलमेंट कॉलोनी जो सभी यहाँ आने से पहले बस्ती हुआ करती थी। वहाँ घर के दरवाज़ों पर ऐसा मजमा पहले नहीं देखा गया है। तंग गलियों में खड़े होना ही बहुत बड़ी बात हुआ करती थी गाड़ियों की रेलगाड़ी बनते देखना तो बहुत असाधारण दृश्य है। इसके नये होने के और भी कारण है जैसे पहली बार सावदा में इलेक्शन होना।
एक समुह में होती बातचीत से पता चला कि सावदा गाँव में तो पहले भी वोट डलते थे पर पहली बार इतनी जनगणना से यहाँ मतदान हो रहा है और इसकी वजह हम हैं क्योंकि सावदा जे.जे. कॉलोनी में ही आधे से भी ज़्यादा मतदाता है। लगभग 20हज़ार मतदाता है यहाँ जो आसपास के इलाके में इतनी आबादी है नहीं।
छोटे-बड़े, हर कोई इस होती हलचल में कहीं-न-कहीं शामिल है। बच्चे जहाँ इन इवेंट को खेल में ले रहे हैं तो वहीं व्यसक मतदान के दिन के इंतज़ार में है।
comments
add a comment
The Trackback URL to this comment is:
http://nangla-maachi.freeflux.net/blog/plugin=trackback(433).xml
This blog is gravatar enabled.
Your email adress will never be published.
Comment spam will be deleted!
