उर्मिला जी, Babli
पिछले वक्त की धुंधली सी तस्वीर हर किसी के दिमाग में काफी समय तक बिल्कुल ही तरोताज़ा रहती है। ये ताज़गी तब तक जुबान पर आती है, जब तक की नई यादों से बनती ख्वाहिशें पूरी ना हो जाऐ । उर्मिला जी से बात करते हुऐ ये बात लगी ।
उर्मिला जी :- एच. ब्लाक से
मैंने कहा :- आप कहाँ से हो ?
वो :- (बदन पर कोटन का घरेलू सा सुट डाले हुऐ ,बालो की उलझने बता रही थी कि इनको सँवारा नहीं गया है, उन्हीं पर बराबर हाथ फेरते हुऐ ) हम लोग नांगला मांची से आऐ हैं। नांगला माची में हमारे काफी सारे घर थे, जिनको हमने किरये पर दे रखा था। हमारे सारे बच्चों का जन्म भी नांगला मांची में ही हुआ है। पर ये सरकार हमको ज़मीन नहीं दे रही थी। हम तो पुलिस वालों के सामने बहुत रोये पर ये किसी के आसूं नहीं देखते हैं। रोने के चक्कर में हमारे कई थप्पड़ भी लगे कि सिर्फ "तेरा ही घर टूट रहा है या ये तेरे साथ ही नाईंसाफ़ी हो रही है। यहाँ पर सब ही ऐसे ही हैं।"
अंकुर संस्था से मिलकर बात करी। उन्होंने ही हमारे सारे बच्चों के कागज़ात निकलवाऐ और उन्हीं की वजह से ही हमें ये जगह मिली है। सरकार से लड़ना और पूरी तरह से लड़ने की ताक़त तो हमको इस जगह में आने के बाद ही मिली है। काफी समय तक तो हमको भी पी-98 ही करके रखा पर जब हमारी पर्ची कट गई तो हमको इस जगह पर भेजा गया। ज़मीन नापने वाले सभी से 100 रुपऐ की रिश्वत मुँह खोलकर माँग रहे थे पर हमने तो देने से मना कर दिया कि हमारे पास तो पैसे नहीं है और तुम किस बात के माँग रहे हो? पहले तो उसने ज़िद्द की पर बाद में बोला कि नहीं देना तो तुम रहने दो ।
अब मैं किसी से नहीं दबती।
(ये बात कहते हुऐ उनके चेहरे पर पूरी तरह से मुस्कुराहट फैल रही थी, उनकी हँसी उनके गालो के भराव को और ज़्यादा गहरा कर देती है।)
मैंने कहा :- पिछली जगह (नांग्ला माची) को इस नई जगह (सावदा) में किस तरह से याद करते हो?
उर्मिला जी :- इस नई जगह में कुछ भी नहीं है, जो भी ज़िन्दगी भर कमाने वाली उम्र में कमाया वो तो इस जगह को बनाने में काम आ गया। यहाँ तो कोई भी रोज़गार नहीं है। वहाँ तो हमारा होटल चलता था, किरायेदारों से किराया मिल जाता था।
मैं अपने मायके में भी बड़ी बहन की तरह रही हूँ बल्कि मुझसे बड़ी बहनें थी। घर की सारी ज़िम्मेदारी पापाजी के गुज़रने के बाद मेरे ऊपर ही आ पड़ी थी। सुबह से पन्खड़ियो (पालतू जानवर) की सेवा करती, उनके चारे-पानी का और कुट्टी काटने का काम करती।
एक दिन मैं ये काम खेत से करके आ रही थी। सिर पर घास का गठ्ठर था और लड़के वाले मूझे देखने आऐ हुए थे। उन मेहमानों को एक नज़र देखकर मैं घास का गठ्ठर रखने लगी तभी मुझसे किसी ने पूछा कि तुम्हारा नाम क्या है? मैं गुस्से में बोली कि उर्मिला! क्या तुम्हें कोई मतलब? एक तो धूप हो रही है, देख नहीं रहे कि काम करके आई हूँ, सुबह से कुछ नहीं खाया और आ जाते है दिमाग खराब करने के लिए।
(ये बात बोलने के बात वो काफी देर तक मुस्कुराती रही और उनकी बेटी बात को सुनकर बहुत गौर से देख रही थी, लग रहा था काफी समय तक बेटी के साथ इस याद को बतयाती रही हैं।)
दुल्हन बनकर पहला कदम नांगला में ही रखा था। वहीं से सारी दुनिया को देखा। क्या था नाग्ला में ...सारी तरफ़ राख, मिट्टी थी और खाली बंजर सी जमीन थी। जहाँ पर मर-मार्किट, पानी-बिजली जैसी कई तरह की सुविधा नहीं थी। ये सब रौनक तो बहुत बाद में आई। ये सब सुविधा यहाँ तक बढ़ गई थी कि पानी पूरे दिन आता था और बिजली जाती नहीं थी। पर ये सब छुट गया। दिल्ली में खाली हाथ आने वालो का न्यौता तो इसी जगह मे मिलता था। बहुत ज़िन्दगी के मारे, गाँव की ज़मीन के छूट जाने के बाद इस वजह से यहाँ पर आऐ और यहीं के होकर रह गये।
ससुर जी बहुत दूर से जब रात में कमाकर आते तो कहीं जाकर हम खाना पकाते थे। वहाँ पर भी हर तरह की दिक्कत को सहने के बाद ही हमें खुशहाली मिली थी पर वहाँ जैसा आराम या अपनाईयत यहाँ देखने को नहीं मिलती है। नांगला मांची में ही अपने दोनों देवरों को दुल्हा बनाया था मैंने।
(जिस तरह वो नांगला मांची की परेशानियों या वहाँ की शुरुआत को समझा रही थी ।लग रहा था कि जगह में 'बसने' शब्द को समझ चुकी हैं और वो जगह के उन तत्वों को जानती है जिससे ज़िन्दगी की बसावट को समझने में आसानी होगी। बहुत बार नांगला को दोहरा चुकने के बाद उनसे किसी ओर तरह के सवाल को पूछना चाहिऐ...)
मैंने कहा :- कहते है ना कि हर किसी के पास बहुत सारे अनुभव होते हैं और आपके पास तो दोहरा अनुभव है। आप समझ सकती हो कि किसी जगह पर ज़िन्दगी का बसना किस तरह से मुमकिन हो पाता है ?
जैसे नांगला में पहले कुछ भी नहीं था पर धीरे-धीरे आया। सावदा में भी कुछ भी नहीं था पर आ रहा है पर यहाँ आपका जीवनयापन चल ही रहा थी, यहाँ पर किस तरह से बसना-बसाना शब्द है? नागंला में ज़िन्दगी को बसा चुकी हैं पर यहाँ पर उस बसावट को कैसे पहचानती हो?
उर्मिला जी :- नांग्ला मांची में हमारे पास काम था। पैसा बहुत ज्यादा आता था पर खर्चे कम थे । हमारे समय में मंहगाई इतनी ज्यादा नहीं थी, जितनी की अब है । बहुत ज्यादा सहुलियत की आदत भी नहीं थी। लेकिन अब हमारे बच्चो को ही देखो बिना टी.वी. के जीना दूभर कर रखा था तो यहीं घेवरा गाँव से ये टी.वी. 7500 रुपऐ का खरीद का लाई हूँ। यहाँ काम का कोई जरिया दिखता ही नहीं है। कुछ सालों के बाद अगर कारोबार चला तो फिर देखते हैं पर अभी तो जिन्दगी यूँही चल रही है। बिजली तो आ गई है पर पानी और खरन्जे के बाद शरीर थोड़ा कम थकेगा। पर हाँ ये जगह बस तो जाऐगी। आज भी यहाँ से कई औरतें वहीं कमाने जाती हैं। कुछ लोग नांगलोई, बहादुरगढ़ में चीनी और ग्लास की फैक्टरी है वहाँ मजदूरी पर जाते हैं । पर नागला जैसा आराम या कारोबार यहाँ नहीं मिलेगा।
मैंने कहा :- आपने इस जगह में कितने तरह के बदलावों को देखा है?
उर्मिला जी :- जब हम आऐ थे तो बिल्कुल खाली जगह थी पर अब तो यहाँ पर आबादी बढ़ती जा रही है। पानी के टैंकरों का आना, बिजली की भी सुविधा हो गई । बच्चों को पढ़ने के लिऐ स्कूल खुल गऐ। राशन की दुकानों से राशन मिलने लगा । बसों की सुविधा हो गई है और धीरे-धीरे ये बढ़ती ही जाऐगी पर इसके सिवा एक ज़रुरी बात है लोगों के रोज़गार। उसके बारे में सरकार को सोचना चाहिए । अगर बाहर काम पर जाने का सोचते हैं तो किराया इतना है कि आने-जाने में ही सारी कमाई निकल जाऐगी। कुछ बचने की उम्मीद ही नहीं होती तो लोग एक हफ्ते, दो हफ्ते काम करके जाना ही छोड़ देते हैं।
(यहाँ पर वो बातें सिर्फ अपने लिए नहीं कह रही थी। लग रहा था कि वो काफी सारे परिवारों से मिलती-जुलती रही हैं।)
मैंने कहा :- और कितने तरह की बदलावों की ज़रुरत है इस जगह में। जो आपको लगता है? (लग रहा था जैसे कि मैंने कुछ गलत सवाल पूछ लिया हो, बदलाव की ज़रुरत को वो नेता की कल्पना की तरह ही ब्यान ना कर दे कि ये भी और वो भी चाहिए।)
उर्मिला जी :- वो बात तो देखने पर ही पता चल जाती है कि और भी बहुत सारी दिक्कतों का सामधान होना चाहिऐ । अभी तो पानी तक बाहर निकालने की जगह नहीं है। पहले हम घर के ही किसी कोने में नहाते हैं और फिर उसी पानी को बाहर हाथ से निकालकर फेंकना पड़ता है तो क्या हम साफ-सुथरे हुऐ?..
(अपनी बात को वो आगे कहती, तभी पानी के टैंकर आ ये और वो सलवार के पायचों को ऊपर करती हुई पानी भरने के लिऐ चली गई।)
पिछले वक्त की धुंधली सी तस्वीर हर किसी के दिमाग में काफी समय तक बिल्कुल ही तरोताज़ा रहती है। ये ताज़गी तब तक जुबान पर आती है, जब तक की नई यादों से बनती ख्वाहिशें पूरी ना हो जाऐ । उर्मिला जी से बात करते हुऐ ये बात लगी ।
मैंने कहा :- आप कहाँ से हो ?
वो :- (बदन पर कोटन का घरेलू सा सुट डाले हुऐ ,बालो की उलझने बता रही थी कि इनको सँवारा नहीं गया है, उन्हीं पर बराबर हाथ फेरते हुऐ ) हम लोग नांगला मांची से आऐ हैं। नांगला माची में हमारे काफी सारे घर थे, जिनको हमने किरये पर दे रखा था। हमारे सारे बच्चों का जन्म भी नांगला मांची में ही हुआ है। पर ये सरकार हमको ज़मीन नहीं दे रही थी। हम तो पुलिस वालों के सामने बहुत रोये पर ये किसी के आसूं नहीं देखते हैं। रोने के चक्कर में हमारे कई थप्पड़ भी लगे कि सिर्फ "तेरा ही घर टूट रहा है या ये तेरे साथ ही नाईंसाफ़ी हो रही है। यहाँ पर सब ही ऐसे ही हैं।"
अंकुर संस्था से मिलकर बात करी। उन्होंने ही हमारे सारे बच्चों के कागज़ात निकलवाऐ और उन्हीं की वजह से ही हमें ये जगह मिली है। सरकार से लड़ना और पूरी तरह से लड़ने की ताक़त तो हमको इस जगह में आने के बाद ही मिली है। काफी समय तक तो हमको भी पी-98 ही करके रखा पर जब हमारी पर्ची कट गई तो हमको इस जगह पर भेजा गया। ज़मीन नापने वाले सभी से 100 रुपऐ की रिश्वत मुँह खोलकर माँग रहे थे पर हमने तो देने से मना कर दिया कि हमारे पास तो पैसे नहीं है और तुम किस बात के माँग रहे हो? पहले तो उसने ज़िद्द की पर बाद में बोला कि नहीं देना तो तुम रहने दो ।
अब मैं किसी से नहीं दबती।
(ये बात कहते हुऐ उनके चेहरे पर पूरी तरह से मुस्कुराहट फैल रही थी, उनकी हँसी उनके गालो के भराव को और ज़्यादा गहरा कर देती है।)
मैंने कहा :- पिछली जगह (नांग्ला माची) को इस नई जगह (सावदा) में किस तरह से याद करते हो?
उर्मिला जी :- इस नई जगह में कुछ भी नहीं है, जो भी ज़िन्दगी भर कमाने वाली उम्र में कमाया वो तो इस जगह को बनाने में काम आ गया। यहाँ तो कोई भी रोज़गार नहीं है। वहाँ तो हमारा होटल चलता था, किरायेदारों से किराया मिल जाता था।
मैं अपने मायके में भी बड़ी बहन की तरह रही हूँ बल्कि मुझसे बड़ी बहनें थी। घर की सारी ज़िम्मेदारी पापाजी के गुज़रने के बाद मेरे ऊपर ही आ पड़ी थी। सुबह से पन्खड़ियो (पालतू जानवर) की सेवा करती, उनके चारे-पानी का और कुट्टी काटने का काम करती।
एक दिन मैं ये काम खेत से करके आ रही थी। सिर पर घास का गठ्ठर था और लड़के वाले मूझे देखने आऐ हुए थे। उन मेहमानों को एक नज़र देखकर मैं घास का गठ्ठर रखने लगी तभी मुझसे किसी ने पूछा कि तुम्हारा नाम क्या है? मैं गुस्से में बोली कि उर्मिला! क्या तुम्हें कोई मतलब? एक तो धूप हो रही है, देख नहीं रहे कि काम करके आई हूँ, सुबह से कुछ नहीं खाया और आ जाते है दिमाग खराब करने के लिए।
(ये बात बोलने के बात वो काफी देर तक मुस्कुराती रही और उनकी बेटी बात को सुनकर बहुत गौर से देख रही थी, लग रहा था काफी समय तक बेटी के साथ इस याद को बतयाती रही हैं।)
दुल्हन बनकर पहला कदम नांगला में ही रखा था। वहीं से सारी दुनिया को देखा। क्या था नाग्ला में ...सारी तरफ़ राख, मिट्टी थी और खाली बंजर सी जमीन थी। जहाँ पर मर-मार्किट, पानी-बिजली जैसी कई तरह की सुविधा नहीं थी। ये सब रौनक तो बहुत बाद में आई। ये सब सुविधा यहाँ तक बढ़ गई थी कि पानी पूरे दिन आता था और बिजली जाती नहीं थी। पर ये सब छुट गया। दिल्ली में खाली हाथ आने वालो का न्यौता तो इसी जगह मे मिलता था। बहुत ज़िन्दगी के मारे, गाँव की ज़मीन के छूट जाने के बाद इस वजह से यहाँ पर आऐ और यहीं के होकर रह गये।
ससुर जी बहुत दूर से जब रात में कमाकर आते तो कहीं जाकर हम खाना पकाते थे। वहाँ पर भी हर तरह की दिक्कत को सहने के बाद ही हमें खुशहाली मिली थी पर वहाँ जैसा आराम या अपनाईयत यहाँ देखने को नहीं मिलती है। नांगला मांची में ही अपने दोनों देवरों को दुल्हा बनाया था मैंने।
(जिस तरह वो नांगला मांची की परेशानियों या वहाँ की शुरुआत को समझा रही थी ।लग रहा था कि जगह में 'बसने' शब्द को समझ चुकी हैं और वो जगह के उन तत्वों को जानती है जिससे ज़िन्दगी की बसावट को समझने में आसानी होगी। बहुत बार नांगला को दोहरा चुकने के बाद उनसे किसी ओर तरह के सवाल को पूछना चाहिऐ...)
मैंने कहा :- कहते है ना कि हर किसी के पास बहुत सारे अनुभव होते हैं और आपके पास तो दोहरा अनुभव है। आप समझ सकती हो कि किसी जगह पर ज़िन्दगी का बसना किस तरह से मुमकिन हो पाता है ?
जैसे नांगला में पहले कुछ भी नहीं था पर धीरे-धीरे आया। सावदा में भी कुछ भी नहीं था पर आ रहा है पर यहाँ आपका जीवनयापन चल ही रहा थी, यहाँ पर किस तरह से बसना-बसाना शब्द है? नागंला में ज़िन्दगी को बसा चुकी हैं पर यहाँ पर उस बसावट को कैसे पहचानती हो?
उर्मिला जी :- नांग्ला मांची में हमारे पास काम था। पैसा बहुत ज्यादा आता था पर खर्चे कम थे । हमारे समय में मंहगाई इतनी ज्यादा नहीं थी, जितनी की अब है । बहुत ज्यादा सहुलियत की आदत भी नहीं थी। लेकिन अब हमारे बच्चो को ही देखो बिना टी.वी. के जीना दूभर कर रखा था तो यहीं घेवरा गाँव से ये टी.वी. 7500 रुपऐ का खरीद का लाई हूँ। यहाँ काम का कोई जरिया दिखता ही नहीं है। कुछ सालों के बाद अगर कारोबार चला तो फिर देखते हैं पर अभी तो जिन्दगी यूँही चल रही है। बिजली तो आ गई है पर पानी और खरन्जे के बाद शरीर थोड़ा कम थकेगा। पर हाँ ये जगह बस तो जाऐगी। आज भी यहाँ से कई औरतें वहीं कमाने जाती हैं। कुछ लोग नांगलोई, बहादुरगढ़ में चीनी और ग्लास की फैक्टरी है वहाँ मजदूरी पर जाते हैं । पर नागला जैसा आराम या कारोबार यहाँ नहीं मिलेगा।
मैंने कहा :- आपने इस जगह में कितने तरह के बदलावों को देखा है?
उर्मिला जी :- जब हम आऐ थे तो बिल्कुल खाली जगह थी पर अब तो यहाँ पर आबादी बढ़ती जा रही है। पानी के टैंकरों का आना, बिजली की भी सुविधा हो गई । बच्चों को पढ़ने के लिऐ स्कूल खुल गऐ। राशन की दुकानों से राशन मिलने लगा । बसों की सुविधा हो गई है और धीरे-धीरे ये बढ़ती ही जाऐगी पर इसके सिवा एक ज़रुरी बात है लोगों के रोज़गार। उसके बारे में सरकार को सोचना चाहिए । अगर बाहर काम पर जाने का सोचते हैं तो किराया इतना है कि आने-जाने में ही सारी कमाई निकल जाऐगी। कुछ बचने की उम्मीद ही नहीं होती तो लोग एक हफ्ते, दो हफ्ते काम करके जाना ही छोड़ देते हैं।
(यहाँ पर वो बातें सिर्फ अपने लिए नहीं कह रही थी। लग रहा था कि वो काफी सारे परिवारों से मिलती-जुलती रही हैं।)
मैंने कहा :- और कितने तरह की बदलावों की ज़रुरत है इस जगह में। जो आपको लगता है? (लग रहा था जैसे कि मैंने कुछ गलत सवाल पूछ लिया हो, बदलाव की ज़रुरत को वो नेता की कल्पना की तरह ही ब्यान ना कर दे कि ये भी और वो भी चाहिए।)
उर्मिला जी :- वो बात तो देखने पर ही पता चल जाती है कि और भी बहुत सारी दिक्कतों का सामधान होना चाहिऐ । अभी तो पानी तक बाहर निकालने की जगह नहीं है। पहले हम घर के ही किसी कोने में नहाते हैं और फिर उसी पानी को बाहर हाथ से निकालकर फेंकना पड़ता है तो क्या हम साफ-सुथरे हुऐ?..
(अपनी बात को वो आगे कहती, तभी पानी के टैंकर आ ये और वो सलवार के पायचों को ऊपर करती हुई पानी भरने के लिऐ चली गई।)
पिछले वक्त की धुंधली सी तस्वीर हर किसी के दिमाग में काफी समय तक बिल्कुल ही तरोताज़ा रहती है। ये ताज़गी तब तक जुबान पर आती है, जब तक की नई यादों से बनती ख्वाहिशें पूरी ना हो जाऐ । उर्मिला जी से बात करते हुऐ ये बात लगी ।
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