BlogGalleryContact

इंतज़ार, शमशेर

लोगों का अपना दिनचर्या है और उसी दिनचर्या से जीवनयापन के अपने बने-बनाये साँचे को मजबूती से बाँधा हुआ है। उसमें दिनचर्या खुल जाने नाम की कोई चीज़ नहीं है। लेकिन यह कोई पाबंदी नहीं है और ना ही आज़ादी की लाड़ाई है।
इन्हीं में से कुछ हर रोज़ ढलती दोपहरी में सावदा के चौक पर अपना क़ाफ़िला तैनात करते हैं। तीन से साढ़े-तीन के बीच आने वाली बसों के लिए।
फल की रेहड़ी, पान की दुकान का छोटा खोखा साथ में उसके बराबर में उसी साइज़ का घड़ी बनाने की दुकान, एक चबुतरी ओपन ढाबा, चाय के दो तीन रेहड़ी और महफिल बनाते टेबल पर बैठे लोग, मोची का अपना एक कोना, डी.टी.सी. बस का समय पालक बूथ और उसमें एक जानकारी देने वाला चेहरा, आते-जाते लोग और 5से 6 रिक्शे, जिनके पास से गुज़रते हुए सुनने को मिलता है "हाँ जी कोई है घेवरा गाँव के लिए?”
यह एक लम्बा शोट है जो दिन भर मेकअप में रहता है। बस कुछ समय ऐसे होते हैं जसमें तब्दीलियाँ होती हैं और टेक बदलते हैं।

समय सारणी के मुताबिक यह तीन, साढ़े-तीन वाली बसों का इंतज़ार पौने-तीन से शुरू हो जाता है और चार, पौने-चार तक रहता है। बसें अधिकतर लेट ही होती हैं। पहले एक आता है फिर दूसरा और फिर आहिस्ता-आहिस्ता ढ़ेरों लोग आ जाते हैं।

अनाज के गट्ठर, आटे की बोरियाँ और चीनी के थैले तो लबालब दिखाइ देते हैं। शुरू में तो मिट्टी के तेल के छोटे-बड़े गैलन भी हुआ करते थे पर फिर कंडेक्टर की सख्ती के वजह से वो बंद कर दिये गये हैं।

लोगों के जमावड़े के साथ आवाज़ें बढ़ती और बढ़ती ही जाती हैं। हल्की होती पर तेज धूप के तपन से बचते हुए कुछ तो इधर-उधर हो जाते बाकि सभी स्कूल की दिवार से ओट ले लेते।हर कहीं छोटा-सा ग्रुप बतियाता हुआ दिखता है।
कहीं कोई लड़का अपने अनाज के बोरे के पास आपने हमउम्र के साथ खेल रहा होता है तो वहीं पास में तीन बुज़ुर्ग औरतें बैठी राशन की लाइन पर चर्चा कर रही होती हैं। तो कुछ युवतियाँ साथ में खड़ी हो हँसते-बाते करते हुए थोड़ी-थोड़ी देर में बस के न आने को कोसती। नौजवान लड़के चलते ही रहते, रुकते नहीं हैं। वहीं कुछ आदमी आपस में तो कुछ अपनी घरवाली साथ हाथ पर सर रखके शांत बैठे दिखाई देते हैं। बुज़ुर्ग हाथों में बीड़ियाँ लिये पास की चाय की दुकान में बैठे धूआं उड़ा रहे होते हैं।

कोई मुँह पर नाकाब डाले, बुरखा ओढ़े मायके जाने की तैयारी में है तो कोई राशन लेने आया हुआ था। तो कोई लड़का आपने पापा के पास जा रहा है जो वहीं काम करते हैं जहाँ से उनको यह जगह मिली है। जो फिर शायद रात दस बजे तक पापा के काम में हाथ बंटाकर वापस लौट आयेगा अगले दिन स्कूल जाने के लिए। तो कुछ इस कतार में वो भी हैं जो अपनी पिछली जगह में ही काम करते हैं और वहाँ किराये पर रूम लेकर रहते हैं। जो हर तीन-चार दिन के भीतर घर वालों के पास आते हैं।

कुछ नये दमकते चेहरे होते हैं जो शादी-ब्याह जैसे समारोह के लिए तैयार दिखते हैं। तो कभी अपनी माँओं के साथ वो बच्चे होते हैं जिनके पापा 10-15 दिन में काम पर से लौटकर आते हैं। तो कभी-कभार माँ उनको अपने साथ ले जाती हैं।

और ढ़ेरों ऐसे आदमी, औरत, बुज़ुर्ग हैं जो रोज़ शाम काम पर जाते हैं । देर रात काम कर अगली सुबह वापस घर आते हैं।

मुसाफिरों का टोला हर रोज़ अपना कुछ-न-कुछ नया रूप परिवर्तन में रखता है बाकि सब वही है जो कल था।

दूर से ही डीटीसी बस धूल उड़ाती आ रही दिखती है जैसे फूंकार रही हो। उसकी इस फुंकार से मानो माहौल में जैसे चाबी सी भर जाती है। सभी सतर्क हो जाते हैं अपने-अपने सामानों के साथ।

बस पर मौजूद नः कई लोगों को बहुत तेज़ कर देता है और बाकियों को वापस प्रतिक्षा में ले जाता है। बस के रुकने का इंतज़ार न करते हुए हर कोई बस में खुद को धकेलने की कोशिश करता है अपने सामानों के साथ।

फौरन बस की सीटें घेर ली जाती हैं। दोस्तों और रिश्तेदारों के नाम से। एक बार फिर से फटाफट अपनी-अपनी सीटों पर जमीं धूल को झाड़ने लगते हैं। सीटों को अपने हाथों से ज़ोर से थपथपाते हैं और बैठ जाते हैं।

वापस चलने से पहले गाड़ी दस मिनट ठहरती है। ड्राइवर और कंडेक्टर के दस मिनट के विश्राम में वो लोग बुला लिए जाते हैं जो घर बैठे इंतज़ार के कतार में थे। जिनके मुसाफिरों के नाम की सीटें घिरी थी।
Comments (0)  Permalink

comments

add a comment

The Trackback URL to this comment is:
http://nangla-maachi.freeflux.net/blog/plugin=trackback(431).xml

This blog is gravatar enabled.
Your email adress will never be published.
Comment spam will be deleted!

Name*
E-Mail
For Spammers Only
URL
Comment*
Notify me via E-Mail when new comments are made to this entry
Remember me (needs cookies)