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स्तर, बबली

आसिम हलदर
यह लक्ष्मीनगर की बसावट को सावदा में तालाशते हैं। एक उम्र आती है जब जगह में आप भी कुछ बनना चाहते हैं और जगह भी वो मुकाम बनाती है जिसमें आप अपनी ज़िन्दगी की गुज़र-बसर को दोहराने का अवसर पहचानते हैं। इस बन्दे से बातचीत करने में लगा कि जगह में लोगो के स्तर को बनाने वाली क्षमता के ऊपर बहुत ही आसानी के साथ विचार कर सकते हैं।
आप किसी समुदाय में अकेले नहीं बढ़ सकते हो। अगर आपका समुदाय सिकुड़ा हुआ है तो वो आपको भी सिकुड़ी हुई अवस्था में ही दिखायेगा। समुदाय का बढ़ना और साथ में आपका बढ़ना इस क्रिया को आसिम हलदर बखूबी ही अपनी बातों में ब्यान कर जाते हैं। हो सकता है मैंने ही कुछ और सींचा हो और लगा जगह में 'समुदाय' और 'मैं' के बीच के फैलाव पे शायद इनसे बातचीत हो पाये।

आसिम हलदर से भेंट उन्हीं की गली में हुई। जहाँ हम इवेंट कर रहे थे। इवेन्ट से मेरा मतलब है कई लोगो का एक जगह में मिलना और बतियाना। रोज़ की तेज़-भागती दिनचर्या में पीछे मुड़कर सथ-साथी के साथ बांटना-बतियाना तो हम भूलते ही जा रहे हैं। इसलिए इवेन्ट नाम तो बस मिलने का एक बहाना है।

यही बहाना हमारे मुलाक़ातों और रिश्तों को और गाढ़ा बनाने की पहली शुरुआत बन जाता है। हम जगह के बारे में बात कर रहे थे, उसकी बसावट में झांक रहे थे जैसे सावदा में अपनी पिछली जगहों को दोहराना जो हम त्यौहारों की कुछ खास यादों को बांटकर कर रहे थे।

वहीं आसिम हलदर हमारी बातचीत को गौर से सुनने के बाद मुझसे फर्माये कि ये बातचीत क्यों कर रहे हो और क्या फायदा होगा इससे? इन यादों को याद करके क्या होगा? अगर आपको करना है तो यहाँ के बच्चों को पढ़ाने का काम करो, स्कूलो में पढ़ाने के तरीके को सही करो और यहाँ पर वो रोज़गार बनाओ जिससे सबके हालात सुधर सके।

“ जब आसिम हलदर ये बात कह रहे थे तो ऐसा लगा कि कुछ तरह की सामजिक बातें होती हैं, जिसे सुनकर सभी ये कहते हैं कि ये बात तो हमारी तरफ़ से भी है, हम इससे सहमत हैं। जिसको इसी दिशा में बढ़ाते और धकेलते चलो तो लगता है कि ये बात फायदे-नुकसान से परे हो जाती है। बातचीत में लगता है कि लोग ये दायरा बनाकर चलते हैं। जिसमें वो यह चीज़ भाँप लेते हैं।

बात किस तरह के संदर्भ को खोल रही है। तब सोचना पड़ता है अपने घुसने के तरीको को।

मैं:- हम इस बातचीत के ज़रिए इस जगह के बनते रिश्तों को समझना चाहते हैं। वो दोस्ताने पल जो पुरानी जगह की खासियत होते हैं पर नई जगह में वो चीज़ पनपती कैसे है, जगह कैसे बनती है और धीरे-धीरे से बसती कैसे है?

आसिम हलदर:- यह बात तो सही है लेकिन मैं तो यहाँ पर आकर बहुत ही दुखी हूँ । मैं B.com हूँ और चार्टर अकाउटेन्ट का कोर्स कर रख है। लक्ष्मीनगर में मैं बच्चो को ट्यूशन दिया करता था और दिल्ली गेट पर C.S. FORM में अकाउटेन्ट का काम किया करता था पर यहाँ आकर तो हमारा सारा प्रक्रिया ही बिगड़ गया है ।

मैं:- यहाँ पर आप क्या करते हो ?

आसिम हलदर:- यहाँ पर कोई भी काम नहीं है मेरे पास। 3 बजे के बाद बच्चों को ट्यूशन पढ़ाता हूँ। लक्ष्मीनगर में मेरा तो सिर्फ यहीं काम था। वहाँ पर मैं 12 तक के बच्चो को पढाता था और 500-800 या 1200 तक की फीस लेता था पर यहाँ तो लोग 150 या 100 रुपऐ देने में भी कतराते हैं। बताओ मेरी पहचान में कितनी गिरावट आई है? वहाँ जो माँ-बाप मुझे 500 रुपऐ देते थे, वो यहाँ 100 रुपऐ के लिऐ मना कर देते हैं और वैसी ही फीस माँगने के लिए तो यहाँ मेरा मुँह खुलता ही नहीं है। आप नहीं जानते कि ओहदे में कितना पीछे हुआ हूँ मैं इस जगह पर।

अपने बच्चो को प्राईवेट स्कूल में पढ़ाता था। सपना देखा था उनके लिए के वो मेरे लेवल से ऊपर जाए लेकिन यहाँ पर उनको सरकारी स्कूल में भेजने पर मुझे बहुत कमज़ोरी महसूस होती है अपने में।

“ समुदाय को सोचना शायद इनके स्तर से जुड़ा है, ये दोनों जगह के स्तर को ठीक से पहचानते हैं और स्तर को समझना, पहचानना ज़िन्दगी के अनुभवों से परे नहीं है । यहाँ 'सावदा' में बड़ा कोई रेस्टोरेन्ट या इन्टरनेट कैफे नहीं है, शायद इस तरह की चीज़े भी लोगों के स्तर को समझ कर ही खुलती हैं। किसी तरह की बड़ी दुकान का ना होना यहाँ पर लोगों के पैसों और बिक्री से जुड़ा हुआ है। यहाँ पर आकर "मैं और समुदाय " जगह के पनपने और बनने की स्थिती में इज़ाफा करता है।"

मैं:- लक्ष्मीनगर में वो स्तर कैसे बना आपका? क्या पूरी तरह से बसने के बाद आप उस जगह पर आऐ, या वहाँ पर इस तरह का स्तर बनते देखा हैं आपने?

आसिम हलदर:- जीवनयापन के न्यूनतम स्थिती से भी नीचे है हम। हमें सरकार ने उस जगह पर फेंका है, जहाँ पर इस तरह की ज़िन्दगी को बनाने में काफी समय लगेगा। लक्ष्मीनगर में उस तरह की स्थिति थी। कल-कारखाने इतने दूर नहीं थे और लोगो के पास अपना रोजगार था।

जब मैं लक्ष्मीनगर में शामिल हुआ था तो काफी समय लगा था अपनी ट्यूशन की छवि को बनाने में। तब हमारी उम्र जवान थी, हौंसला बड़ा था पर अब 3 सालो में पूरी तरह से कमर टुट चुकी हैं और वो हौंसला कहाँ से लाऊँ, जो यहाँ पर अपने को री-टेक कर सकूँ।
यहाँ एक समुदाय बन चुका है। यहां पर सबके लिए कुछ-न-कुछ हो सकता है पर अकेले मेरे के लिए कुछ नहीं होगा। पुराने स्तर को छोड़ना आसान नहीं होता है ।ज़िन्दगी इतनी लचीली हो सकती है पर आपकी जगह इतनी लचीली नहीं हो सकती कि आपको किसी भी रुप में एक्सेपट कर ले। मैं चाहकर भी सावदा में कोई नया काम या स्तर नहीं ढूँढ पाया, जिस तरह जगह ने मुझे ढ़ाला मैं ढ़ल गया, पहले 500 रुपए पर बच्चों को पढ़ाता था और अभी 150 या 100 रुपऐ में।

( दिमाग में आ रहा था कि पिछली जगह के बनने को दुबारा से दोहराये पर ये रोज़गार के अलावा किसी नई या दूसरी चीज़ को नहीं खोज पा रहे थे तो सोचा कि अभी के समय का क्या सवाल पूछा जा सकता है?)

मैं:-किस तरह के ख्याल को सोचतें हैं आप, जिससे आपका स्तर और समुदाय का स्तर ढूँढा जा सके?
आसिम हलदर:-यहाँ पर हमें income of source की जरुरत हैं, जैसे कि अगर यहाँ पर मार्किट खुल जाए, किसी तरह की फैक्ट्ररी लग जाए तो लोगो की रोज़ी-रोटी बन जाएगी। मैं भी पहले रोज़ ही सावदा से दिल्ली में काम करने जाता था। मेरा जो काम था अकाउटेन्ट का उसमे लेट हो जाने से ट्यूशन नहीं पढ़ा पाता था। इसमे मुझे 5000 रुपये मिलते थे, पर मैंने सोचा की जितना मुझे वहाँ मिलता है वो तो किराये में ही चला जाता है। ये सोचकर मैंने वो काम छोड़ दिया।

यहाँ पर काम करने में इज़्ज़त भी गिर रही है पर पेट पालने के लिऐ सब-कुछ करना पड़ता है। सरकार हमें साधारण जीवन भी नहीं दे पा रही है। पता नहीं किस कल्पना से हमें यहाँ पर बसाया है।

"किस तरह की उधेड़बुन में फँसे हैं आसिम हलदर, पर जगह को बनने-बसाने की जो नज़र है वो बहुत तीव्र सी लगी। समय का एक अंदाजा तो था ही। जगह में उनका स्तर टटोलना अच्छा लगा। दिमाग में तभी सोच लिया था कि इनके लक्ष्मीनगर की यादगार स्तर को लेकर बातचीत की जा सकती है ।

इनका पता है 441, ब्लॉक-ए
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