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इंतज़ार, शमशेर

लोगों का अपना दिनचर्या है और उसी दिनचर्या से जीवनयापन के अपने बने-बनाये साँचे को मजबूती से बाँधा हुआ है। उसमें दिनचर्या खुल जाने नाम की कोई चीज़ नहीं है। लेकिन यह कोई पाबंदी नहीं है और ना ही आज़ादी की लाड़ाई है।
इन्हीं में से कुछ हर रोज़ ढलती दोपहरी में सावदा के चौक पर अपना क़ाफ़िला तैनात करते हैं। तीन से साढ़े-तीन के बीच आने वाली बसों के लिए।
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स्तर, बबली

आसिम हलदर
यह लक्ष्मीनगर की बसावट को सावदा में तालाशते हैं। एक उम्र आती है जब जगह में आप भी कुछ बनना चाहते हैं और जगह भी वो मुकाम बनाती है जिसमें आप अपनी ज़िन्दगी की गुज़र-बसर को दोहराने का अवसर पहचानते हैं। इस बन्दे से बातचीत करने में लगा कि जगह में लोगो के स्तर को बनाने वाली क्षमता के ऊपर बहुत ही आसानी के साथ विचार कर सकते हैं।
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