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Dhokha, Jaanu

पेड़ के नीचे सड़क के किनारे किसी की राह देख रहे महिला पुरुष सभी की आँखे एक तरफ ही निहारे जा रही थी । सड़क से अनगिनत गाड़ियाँ नज़रो के सामने से यूं ही निकल जाती । सड़क के दो छोर एक छोर आने वालो का दूसरा जाने वालो का । पर जिस छोर पर लोग खड़े थे व कहीं ना कहीं जाने के लिए ही था । माना कि दोनो छोर पर लोग खड़े थे, एक कॉल सेंटर वाली टाटा सूमि निकली जिसमे कुछ नौजवान लड़कियाँ अपने आपसी दोस्तो के साथ हंसी के ठहाको के साथ हंसी के ठहाके मारकर एक दूसरे के सामने अपनी भौंहो से नैन-मटक्का कर रही थी । टाटा सूमो एकदम सरकती हुई खड़ी हो गई ।

नैन-मटक्का वाली लड़की दूसरी बैठी लड़की से हाथ रपटाते हुए सड़क पर अपने गौरे पैर रखा । चप्पल वही शोरूम वाली चितकबरी बद्धीदार जींस की मोरी को घुटनो तक मौड़े हुए बाल उलझन भरे चेहरा रात भर का जगा । आँखे अलसाई हुई, बंडी हाफ-बाजू तक की । हाथ मे शिपरा मल नाम से गुदी लाल सफेद पॉलीथिन । एक कंधे पर चमड़े की चमकती पर्स उसने दूसरे हाथ से गेट बंद किया आवाज आई "फटाक" । टाटा सूमो झर्रर्र से चल पड़ी । अंदर से जाने वालो ने इशारा किया " बाय बाय " । अपने हाथो को नीचे करते हुए उसी नज़रो मे वो भी शामिल हो गए जो सड़क पर खड़े किसी को निहार रहे थे ।


सड़क के एक छोर पर बसो की लाइन जिसमे कुछ जाने वाली और कुछ वही पर खड़ी आराम फरमा रही थी । इधरत दूसरे छोर पर एक भी बस नही सिर्फ ताक रही नज़रे कि कोई तो आए ।


एकाएक ट्रक का पीछा करते हुए मेट्रो की बहन आ गई । उसके आते ही ताकती नज़रे दौड़ पड़ी । आवाज दिया " गेट तो खोलो सही " शीशे पर हाथ मारते रह गए । वो तो अपनी मर्जी से 10 कदम दूर जाकर रुक गई । अब आ गे का दरवाजा खुला इस बस मे खिड़की का नाम नही शीशे ही शीशे । रंग भी लाल । नज़रे भी एक टक निहार कर गेट मे कदम रखा ही था कि अंदर से आवाज आई "एसी बस है" ! किराया 10, 15, 20 रूपए है । आधे से अधिक लोग यूं ही संकोच करते हुए पैर पीछे कर लिए । काफी लोग चढ़े उतरे किराए का दाम सुनकर ।


बस फिर से स्टार्ट हुई मिंटो रोड जाने के लिए । नंबर वही 460 जो रूट नंबर था ।


परिचालक अदंर आकर फिर से कहा " यह एयर कंडिशन बस है " इसकी वजह से किराया 10, 15, 20 रूपए है । उनकी आवाज को सुनकर दो महिलाए 4 पुरुष बिना कुछ कहे आपने बाजारी थैलो के साथ नीचे उतर गए । परिचालक जो शरीर से कमजोर गालो मे उगी हल्की सफेद दाढ़ी हल्की-हल्की घनी हो रही थी । उन्होने अपने बुलंद आवाज मे कहा सुनियो रे भाई पीछे वाला गेट मत खोलियो आगे वाला सिर्फ खोलियो । चढ़ने से पहले सवारियो को किराए के बारे मे बताते जाइयो । आगे से आवाज आई, " अच्छा भाई"


बस चल पड़ी । पर उन दोनो को छोड़कर जो अभी तक बोल रहे थे । इनके सिवा बस मे 4 लोग और थे । जिन्हे सवारी का दर्जा दिया जाता । दो लड़के ऊँची पीछे वाली सीट पर जिसे सिनेमा घरो मे बॅलकनी के नाम से जानते । 2 लड़के बीच मे ऐसा लग रहा था जैसे यह तो सड़क को अपने हाथ से ही छू लेंगे । हर सीट तात्पर्य यह जहाँ 2-3 सीटो का जोड़ा वही पर एक फेन बिल्कुल छोटे-छोटे जो ठंडी हवा दे रहे थे । दोनो गेटो के पास एसी मशीन लगी हुई थी । सड़क पर पानी बस के पीछे वाले हिस्से से चू रहा था । बस के अंदर ठंडी का एहसास था । शीशो से बाहर की तरफ झांकने मे ऐसा लग रहा था मानो बाहर सावन भादो का महीना हो रहा हो । बस अपनी धीमी गति से तेज गति की और जा रही थी । परिचालक टिकट काटने के लिए सीट पर बैठे लड़को के पास गया । लड़को ने 50 का नोट दिया । परिचालक वही डी-टी-सी की वही पुरानी सफेद टिकट थमा दिया । टिकट भी वही 10-10 वाली पर किराया तो 20 । परिचालक ने 10-10 की 4 टिकट फाड़ कर दिया और बोला इसे ही 20 वाली टिकट समझो ।


बस दो किमी का सफर तय कर चुकी थी । बस रुकी अपनी पुरानी अदा के साथ । सवारी दौड़कर पीछे वाले गेट के पास आकर खोलने का इशारा किया आवाज अंदर की अंदर और बाहर की बाहर । दोनो आवाजो का कोई रिश्ता नही था । अंदर बैठा परिचालक आगे जाने का इशारा किया । इशारा को समझ कर सारी सवारियाँ आगे वाले गेट से चढ़ने लगी ।


ड्राइवर ने आवाज लगाया " पास वाले नही चढ़ना! इसमे 10 से कम का टिकट नही है" इस तरह की आवज को सुनकर पास वाले नीचे हो जाते । 10 से कम टिकट वाले नीचे हो जाते । एक ने पूछा 10 से नीचे क्यों नही ?ड्राइवर तीखी आवाज मे कहा " दिखाई नही देता, एसी बस है । इसमे 10-15-20 की टिकट है । चल नीचे हो जा । "अच्छा" करता हुआ नीचे उतर गया ।


एक जवान युवती जो काली साड़ी पहने हुए थी । गले मे पड़ा हार जो गोल्डन रंग का था । एक हाथ पर मिनि पर्स । दूसरे हाथ मे कोयले की आग से झुलसा भुट्टा जिसमे स्वाद के लिए नमक नींबू का मिश्रण लगा हुआ जिसका स्वाद अपनी पानीदार जीभ के साथ अपने चमकते सफेद दातो से काट-काट कर खाए जा रही थी परिचालक को दस का नोट थमाते हुए कहा लाजपत नगर की एक टिकट देना परिचालक ने तीखी अव़ाज मे कहा वहा तक का 15 रुपय का हे तो युवती खीज़ कर कहा ये लो 5 और टिकट को हाथ मे थामते हुए पीछे वाली सीट पर बैठ गयी।

दूसरी तरफ एक सरदार का लड़का जो बदन से हष्टपुष्ट जो अपने बदन मे काली टीशर्ट डाले हुए था वो लड़का हर आने वाली सवारी पर एक कमेन्टस कर आपस मे दोनो खिलखिला कर हस पड़ते बस अपनी एक मीठी अदा के साथ अपनी रप्तार को बढाती जा रही थी। वो लड़का अपनी अदत से मजबुर था सड़क के किनारे एक रिक्शा वाला अपने शरीर के सामर्थ के अनुसार वो भी अपनि स्पीड से कही जा रहा था। जिसने सर मे गमछा बाँधा हुआ था गर्मी की किलाहती धूप मे उसके माथे से पसीना की बूँद छलक पड़ी थी।आँखो की बरौनी पर पसीने की बूँद टपक रही थी टपकती बूँद का मजाख उडाते हुए कहा वो भाई तुभी इसमे आकर बैठ जा तो पसीना सूख जायेगा। बाहर से रिक्शा वाला लडके को ताकता हुआ बस के पीछे ही होता चला गया ।

बस स्टैण्ड आया जिसमे बस अपनी पुरानी अदा के साथ खडी हो गयी ।सारी सवारी भी पीछे वाले गेद की तरफ दौड पडी गेट तो आगे वाला खुला तभी अन्दर बैठी किसी सवारी ने बाहर वाली सवारी को आगे जाने के लिए इशारा किया।ड्राइवर ने फिर वही कहा जो किराये के बारे मे पहले से बोलता चला आ रहा था।इतना कहने के बावजूद भी एक लड़के ने कहा तीन वाली टिकट देना।

परिचालक ने कहा कि गेट मे नही पढा क्या?

लड़का-: क्या पढा?

परिचालक-: किराया

लड़का:- क्यों?

परिचालक:- यह एसी बस है ।

लड़का:- हमे क्या पता ?

परिचालक:- पता हो या ना हो चल 10 का नोट निकाल ।

लड़का:- थोड़ा मुस्कुराते हुए अपनी पैंट की पिछली वाली जेब से अपना बटुआ निकालकर 500 का नोट थमाने लगा ।

परिचालक:- क्या यार मज़ाक करता है? इतने का टूटा कहाँ से लाऊँ ?

लड़का:- बस का रुतबा तो दिखाते हो, मगर टूटे लेकर नही चलते हो ?

परिचालक:- रोकना, रोकना, चल भाई उतर जा ।

लड़का:- अगले स्टैंड पर उतर जाउंगा ।

उसी स्टैंड से 2 राज मिस्त्री अपने औजारो के साथ अगे वाले गेट से दाखिला लिया । एक आगे वाली सीट पर अपने औजारो के साथ बैठ गए । दूसरा परिचालक के पास आकर कहा:- 5-5 वाली 2 देना ।

परिचालक:- यार तुम लोगो को समझ मे नही आता है क्या ?

राजमिस्त्री:- क्या समझ मे नही आता, हम हमेशा 5-5 वाली ही तो टिकट लेकर आते-जाते हैं ।

परिचालक:- यह बस को देखो कैसी है ?

राजमिस्त्री:- कैसी है? बस ही तो है ।

परिचालक :- चल 10 रूपए निकाल ।

राजमिस्त्री:- साहब 10 रूपए ही तो दिया है ।

परिचालक:- यह तो एक का किराया है । दूसरे का कौन लेगा ?

राजमस्त्री:- ( अपने हाथ की कलाई मे लगे सीमेंट को छुटाते हुए कहा) तो क्या अभी हम 10 और दें क्या ?

परिचालक:- उतनी देर से माथा पच्ची क्यों कर रहा है ? पैसा दे टिकट ले और सीट पर जाकर बैठ जा ।

राजमिस्त्री:- सोचते हुए शर्ट की ऊपरी थैली से पैसा निकला कर दिया ये लो । वो कुछ अपने मुह मे बुदबुदाता हुआ अपने साथी के पास गया और कठो आवाज मे कहा कि यार तुम भी पढ़े लिखे गधे हो । गलत बस पर चढ़ गए हो । अगना का दुगना पैसा काट लिया ।

साथी:-क्यों?

राजमिस्त्री:-अरे यह तो एसी बस है ।

साथी:- चल कोइ बात नही । अब तक बस लाजपत नगर आने वाली थी । बस का रुकना और लोगो का चढ़ना उतरना एक ही गेट से था । उतरने वाले उतर गए और चढ़ने वाले चढ़ गए । गेट बंद हो गया ।


गेट बंद ही हुआ कि आवाज आई कि मेरा दोस्त तो बाहर ही छूट गया । यह आवाज जिस लड़की के मुह से आई थी वो लड़की अपनी उम्र के लगभग 25-26 साल को समझ चुकी थी । फिर भी हड़बड़ाती आवाज मे कहा रोको-रोको ।

ड्राइवर ने कहा अब आगे उतरिएगा । बस के साथ साथ उसका साथी भी शीशे को थपथपाते हुए दौड़ता रह गया । लड़की ने इशारा किया आगे आने का । लड़की उसी जगह गर्दन झुकाए खड़ी रही । गुप्ता मार्किट आते ही उतर गई । वापस उधर ही चल दिया जिस तरफ उसका साथी छूटा था ।

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