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चलती चक्की, Jaanu Nagar

चलती चक्की

बसन्त की हल्की धूप मे खिलती दोपहर एक सूने पन को जीने मे लगी थी। सभी लोग अपने मन मुताबिक की छाह को ढूढ कर बैठे हुए थे कोई-कोई तो हाफ बाजू की स्वेटर को पहन कर राशन को लेने लिए एक छोटी सी लाइन बना कर जमा राशन कार्डो के पास अपने अपने नाम को सुनकर जाते और अपना पैसा देते जितना राशन मिलना होता अपना राशन लेकर अपने घर की तरफ चले जाते। चेहरे पर लालिमा की दमक हाथ पैर कुछ रूखे-रूखे  अब लाइन का जुमकना चलू हो गया लाइन ज्यादा बड़ी नही हल्की-हल्की धूप से बचने के लिए दिवारो से बनी छाया मे बैठे थे।सड़क के दूसरी तरफ से आती आवाजे किसी बुदबुदाने से कम ना थी।जिसको समझना कान को रोकना भी गलत साबित कर देती की आवाज किस चीज की है।स्कूल के बगल से निकलती काली लम्बी सड़क जिसका एक कोना दिखता है और दूसरा कोना  भी दिखता है मानो अभी सड़क का सफर निश्चित है पर आने वाले मे इस कोने को किस जगह से देख सकते है।
इसी सड़क मे एक कोने से आता ट्रैक्कटर जो अपनी बेसुरी आवाज को बढाते हुए सावदा घेवरा के ए ब्लाँक मे आकर अपनी बेसुरी आवाज को रोक दिया साथ मे अपने पिछे एक नया नमुना जो किसी ने और कही देखा होगा या फिर पहली बार ही देख रहा होगा। नया नुमना के रीकते ही बच्चो ने एक सोर मचाया की ये देखो कैसा ट्रैक्कटर हैं।अब दुकान के पास बैठे लोगो ने भी बड़ी आशर्चय चकित के साथ देखा कि इसका यहां क्या काम है? वैसे भी तरह तरह के ट्रैक्कटर कालोनी मे आते रहते है कही खेत जोतने वाले या सड़क को बनाने वाले मिट्टी को लाने वाले इटो को लाने वाले पर ये क्या लेकर आया है?


एक ने आकर पूछा भाई ये किस तरह का काम करता है मीटर को चेक करने के लिए आया है क्या? ट्रैक्कटर वाले ने कहा भाई ये मीटर चेक करने के लिए नही गेहूँ को पीसने के लिए आया है। तो अच्छा ये नयी तरकीफ तुम लोगो ने कालोनी वालो के लिए सोच है। गेहूँ तोलने वाला काँटा कहां है अब क्या काँटा भी पीछे से उतार लिया ? काँटा वही जो परचून की दुकानो मे देखने के लिए मिलता है। अब क्या नही तकनीकी को देखने के लिए भीड़ बढने लगी बच्चे तो बिलकुल उसके नजदीक ही होते जाते तब मालिक ने कहा जरा दूर तो खड़ा हो जा भाई जाओ अपने अपने घर से गेहूँ को लेकर आओ । तब तक एक ने फिर सवाल पूछा कि अभी तो गेहूँ धुले नही है तो कोई बात नही हम पहले गेहूँ को साफ करते है फिर कही पीसते है। तो चलो बताओ कितने रुपये किलो पीसते हो एक किलो का 1.50 पैसा । 1.25 पैसे में पीसोगे कितने किलो गेहूँ है 40 किलो है। चल ला 1.25 मे ही पीस देता हूँ। अब क्या देखने के साथ साथ गेहूँ के बोरियो की लाइन लग गयी गेहूँ को उसी परचून वाले काटे से तौल कर गेहूँ को छन्ना वाले भाग मे डाल दिया ।ट्रैक्कटर को स्टार्ट कर दिया ट्रैक्कटर के पिछले हिस्से से पटा चढा दिया और अब मशीन घरघराती आवाज करना चालू कर दिया मानो अब गेहू का छना बनना चालू हो गया ।एक मे छनता छने गेहूँ को उठा कर उस चक्की मे डाल देता जिससे वो आटा का रूप लेकर दूसरी बोरी मे गिरने लगा। अब शक हो गया कि ये कैसे कही गलत तो नही पीस रहा है। अब क्या सवाल हुआ कि भाई आटा दिखा मोटा तो नही पीस रहा अरे पहले गेहूँ को लेकर आओ जितना महीन कहोगी उतना महिन जितना मोटा कहोगी ऊतना मोटा कर दूँगा । अब लोगो ने एक साथ दो फायदे सोच कर घर जाकर जैसे राशन की दुकान से लाये थे ठीक उसी तरह गेहूँ की बोरी उठा लाते और कहते पीसो सही नही हुआ तो फिर हम कभी नही पीसायेगे। एक बार तो पीसा कर देखो। कम से कम एक बार तो सेंवा का अवसर दो अब आप को दूर नही जाना पडेगा गली गली मे आकर हम लोग आप लोगो का आटा पीस जाया करेगे उस बढते समय के साथ लोगो ने तरह तरह से उससे सवाल पूछते रहे कि गेहूँ से कूड़ा करकट किस तरह से साफ करोगे जार नीचे तो झाँक कर देखो सब कुछ समझ में आ जायेगा अब क्या एक आध नज़रे नीचे की तरफ देखने लगी तब पता चला कि झन्ने से छन कर  गेहूँ साफ होकर नीचे रखे कन्सतर मे गेहूं गिरने मे लगा था। लोगो के समझ में आया ओ ये चक्कर है। अब समझ आया मार्डन युग है साइन्स जो आ गया है अब तो जो नही हो सकता वो हो सकता हैं । अब क्या एक तरफ गेहूँ साफ हो कर गिरता तो दूशरी तरफ साफ आटा पीस कर बोरी मे गिरने लगा मानो अस्थाई चक्की स्थाई बन गयी हो। उसी मशीन के ऊपर सारा कुछ लिखा था कि कौन सा माडल है। नम्बर क्या है?  इस तरह छन्ना से छनना गेहूँ का


पीसना सब की समझ में आ गया था कि ये तो हम लोगो के लिए बहुत ही आराम देह है अब किसी एक ब्लाँक के नाम नही ये तो हर ब्लाँक अपने ही नाम से जाना जायेगा। ये कुछ उस मशीन मे लिखा था जिसने जिसने उसको बनाने मे सहयोग किया था।
1- रंगीला पेंटर
2- राम सिंह
3- पृथ्वी सिंह
4- 9812722597
उपकरण-:
1- ट्रैक्कटर, आटा को पीसने वाली चक्की,गेहू को साफ करने वाला छन्ना, 2- गेहू को तौलने वाला एक परचूनी  काँटा, इन सभी चीजो से तैय्यार चलती फिरती आटा चक्की
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