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चलती चक्की, Jaanu Nagar

चलती चक्की

बसन्त की हल्की धूप मे खिलती दोपहर एक सूने पन को जीने मे लगी थी। सभी लोग अपने मन मुताबिक की छाह को ढूढ कर बैठे हुए थे कोई-कोई तो हाफ बाजू की स्वेटर को पहन कर राशन को लेने लिए एक छोटी सी लाइन बना कर जमा राशन कार्डो के पास अपने अपने नाम को सुनकर जाते और अपना पैसा देते जितना राशन मिलना होता अपना राशन लेकर अपने घर की तरफ चले जाते। चेहरे पर लालिमा की दमक हाथ पैर कुछ रूखे-रूखे  अब लाइन का जुमकना चलू हो गया लाइन ज्यादा बड़ी नही हल्की-हल्की धूप से बचने के लिए दिवारो से बनी छाया मे बैठे थे।सड़क के दूसरी तरफ से आती आवाजे किसी बुदबुदाने से कम ना थी।जिसको समझना कान को रोकना भी गलत साबित कर देती की आवाज किस चीज की है।स्कूल के बगल से निकलती काली लम्बी सड़क जिसका एक कोना दिखता है और दूसरा कोना  भी दिखता है मानो अभी सड़क का सफर निश्चित है पर आने वाले मे इस कोने को किस जगह से देख सकते है।
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