एक अखाड़ा, Lakhmi Kohli
16 जनवरी एक अखाड़ा:-
मोहरम् से पहले की तैयारी किसी युद्ध से कम नही होती । ये युद्ध सामने वाले नही । बल्कि इस युद्ध मे दोनो तरफ से लड़ने वाला एक ही शख्स होता है ।
घेवड़ा की जमीन पर आज पहला दंगल था । कुछ मालूम नही था की घेवड़ा की अवाम उसे सहन भी कर पाएगी या नही? पर तैयारी से तो लग रहा था की सब तैयार है। उसके हर पैंतरे को देखने के लिये और बर्दाश्त भी करने के लिये भी ।
कई लठेत, तलवार बाज़, टीन की पतली और लचकीली तलवारे, चाकूबाज़ । सभी अपने-अपने पैर-पैंतरो मे माहिर थे । जो एक तरफ लगे टैन्ट के नीचे कुर्सियों पर विराज़मान थे । एक आदमी हाथ मे माइक पकड़ सभी देखने वाली घेवड़ा की अवाम को बता रहा था की आगे क्या होने वाला है और अब क्या होने वाला है? कौन सा शातिर आदमी आपके आगे अपना ज़ोहर पेश करने वाला है । बस लोग तैयार रहते उस कलाकार को देखने और उसका ज़ोहर देखने के लिये ।
मोहरम् से पहले की तैयारी किसी युद्ध से कम नही होती । ये युद्ध सामने वाले नही । बल्कि इस युद्ध मे दोनो तरफ से लड़ने वाला एक ही शख्स होता है ।
घेवड़ा की जमीन पर आज पहला दंगल था । कुछ मालूम नही था की घेवड़ा की अवाम उसे सहन भी कर पाएगी या नही? पर तैयारी से तो लग रहा था की सब तैयार है। उसके हर पैंतरे को देखने के लिये और बर्दाश्त भी करने के लिये भी ।
कई लठेत, तलवार बाज़, टीन की पतली और लचकीली तलवारे, चाकूबाज़ । सभी अपने-अपने पैर-पैंतरो मे माहिर थे । जो एक तरफ लगे टैन्ट के नीचे कुर्सियों पर विराज़मान थे । एक आदमी हाथ मे माइक पकड़ सभी देखने वाली घेवड़ा की अवाम को बता रहा था की आगे क्या होने वाला है और अब क्या होने वाला है? कौन सा शातिर आदमी आपके आगे अपना ज़ोहर पेश करने वाला है । बस लोग तैयार रहते उस कलाकार को देखने और उसका ज़ोहर देखने के लिये ।
रस्सियों से बाऊंडरी बनाई थी । अखाड़े मे पथरीली जमीन पर दरियाँ बिछाई हुई थी । दो ढोल वाले और माइक वाला अपना जोर आज़मा रहा था । लोगों को उस अखाड़े मे चारों ओर जमाये रखने मे ।
कुछ बड़े-बड़े लोग भी आज घेवड़ा के इस अखाड़े मे आये हुये थे । चमकदार गाडियों को देखकर ही भीड़ का अन्दाजा लगाना नही पड़ता था । इस धुन मे ही अखाड़े कि अहमियत बढ़ जाने का पूरा मौका था । अब तो घेवड़ा इतना तो बन गया था की लोग अपनी छतों पर से भी देख सकते थे की अखाड़े मे अब कौन सा माहिर कलाकार आदमी उतरा हुआ है और क्या कर रहा है। बड़े ही ज़ोरो-शोरो से उन बड़े लोगो का स्वागत किया गया । टैन्ट खासकर उन्ही के लिये लगाया गया था । लोग तो अब कलाकारो की कलाकारी देखने के लिये बडे ही उत्सुक बने रहे थे । सबकी निगाहें बडी ही गौर से अखाड़े की जमीन पर टीकी हुई थी । चार लोग हाथ मे लठ लेकर सभी को उन खींची रस्सियों से दूर कर रहे थे । बातों मे था की जैसे सभी को वहां होने वाले दंगल से डरा रहे हो । दूर हो जाने को कहते मगर किसी के लग ना जाये ये कहकर ।
वो माइक पर बोलेने वाला संचालक कलाकारो के नाम पूकारता:- “देखियें अब आपके सामने आ रहे है वो कलाकार जो अपनी कला से कईओ को मुंह की खिलाकर आये है । कितनो को जमीन की धूल चटाई है । जो अपने हाथों मे भारी-भारी लठ इस तरह से घूमाते है की जैसे गर्मी मे हवा कर रहे हो । जी हां लठ को घूमता हुआ देखा सकता है मगर उसपर निगाह को नही टिकाया जा सकता । आपके सामने आ रहे है उस्ताद मोहम्मद अफ़ज़ल ।"
एक आदमी अखाच़े की धूल को माथे पर लगाता हुआ अन्दर दाखिल हुआ ।अपने हाथों मे वो दस फुट का लठ उठाता और कलाकारी दिखाने मे तैयार । पहले वो उस लठ को धीमा-धीमा घूमाता रहा मगर थोडी ही देर के बाद मे वो तेज हो गया । अब लठ उसके हाथों मे घूमता हुआ लग ही नही रहा था की दस फुट का है । जैसे उसकी लम्बाई और भारीपन सब खत्म हो गया था । ढोल की थाप पर थिरकता भी रहा और अपनी कलाकारी के ज़ोहर भी लोगो को दिखाता रहा । कभी बैठता, कभी खड़ा हो जाता, कभी झुक जाता तो कभी खूब नाचने लगता मगर उस लठ की रफ़्तार और घूमाई मे बिलकुल भी कमी नही आती । पिछले दस मिनट तक वो सबकी नज़रो मे छाया रहा ।
एक तरफ ये ज़ोहर छाया रहा और दूसरी तरफ घेवड़ा मे कलाकारो की भीड़ लगनी शुरु हो गई थी । आज से पहले सब कहां थे वो किसी को पता नही था पर इस अखाड़े मे इतनी सम्भावना थी की सभी उतर आये थे मैदान मे । अपने ज़ोहर के दो-दो हाथ करने ।
जहां पहले पानी टेन्कर एक या दो ही नज़र आते थे वो भी अपने टाइम पर । वहां आज टेंकरो की लाइन लगी हुई थी । वो माइक पर चिल्लाता शख्स एक आवाज़ लगाता- कलाकारी के चित्र जुबानी बतलाता तो उन्ही टेन्करो मे से एक शख्स उतर आता और अखाड़े मे बेझिझक कूद जाता फिर तैयार हो जाता उस दुनिया ने लिये जो वो अभी अपने ही अन्दर समाये चल रहा था ।
संचालक ने अवाज़ लगाई:- “अब आ रहे है हमारे बीच मे वो महारथी जो आपके बीच मे अभी तक आये थे आपको पानी पिलाने के लिये जिसे बड़ा सवाब का काम माना जाता है । मगर वो ऐसे महारथी है जो अपने हाथों मे तलवार को जब लेते है तो तलवार खून चख़कर ही मयान मे वापस जाती है । ख़तरनाक और बहुत ही जोख़िम भरा ये ज़ोहर है । हर किसी के बस का नही है अगर एक दाव भी उलता पड़े तो खुद की जान पर बन जाती है और खुद के मर जाने का वक़्त आ जाता है । आप सोच रहे होगें कि ये कैसी कला है? जी हां ये कला है वो भी हमारे बीच करने के लिये आ रहे है उस्ताद सिंकदर खान ।"
तभी एम सी डी के पानी के टेंकर मे से उसके ड्राईवर साहब उतरें और अपनी सिर पर बन्धी स्वापी को कमर मे कसते हुये वो अखाड़े मे कूद गये । तलवार हाथों मे उठाई और खेल शुरु कर दिया । आधे से ज़्यादा लोग उनके हाथो मे उस तलवार को देख रहे थे की कोन सा वो दाव है जो उलटा पड़ने से खतरनाक भी हो सकता है और बच्चे अपने तरीके उस दंगल का मज़ा ले रहे थे ।
घेवड़ा के इस खेल मे सभी बहुत ही व्यस्त थे । कोई भी ब्लॉक अपने मे नही था । काफी शोर था जो दूर तक फैला था जिसने घेवड़ा के सारे लोगो को खिचने मे देर नही लगाई थी । अभी के दौर मे तो हर तेज आवाज घेवड़ा की खास आवाज़ बन जाती । जिसे सुनकर लोग खींचे ही चले आते ।
कहानी के साथ मे लोगो को जमाना यहां पर बहुत प्यार से चल रहा था । यहां कोई भी ऐसा नही था जो कलाकार ना हो । बस नाम पूकारा जाता और सब कि नज़र पूरे माहौल मे घूमती ये देखने के लिये अब कौन आयेगा । कहीं ना कहीं से कोई निकल कर ही आ जाता और अपना करतब दिखाने के लिये तैयार भी हो जाता । कई लोग थे जो अपना सिना चौड़ा करके खड़े नजर आ रहे थे बस उन्ही के ऊपर सबकी निगाह रहती की ये भी कोई महारथी है जो अभी अपना नाम पूकारने का इंतजार कर रहा है । लोगो की निगाह पूरे माहौल मे खेल के साथ-साथ टहल रही थी ।
इतने मे वो माइक पर बोलने वाला शख्स आया । वो एक आदमी का जिक्र कर रहा था और खुद ही मैदान मे कूद गया ।
कुछ बड़े-बड़े लोग भी आज घेवड़ा के इस अखाड़े मे आये हुये थे । चमकदार गाडियों को देखकर ही भीड़ का अन्दाजा लगाना नही पड़ता था । इस धुन मे ही अखाड़े कि अहमियत बढ़ जाने का पूरा मौका था । अब तो घेवड़ा इतना तो बन गया था की लोग अपनी छतों पर से भी देख सकते थे की अखाड़े मे अब कौन सा माहिर कलाकार आदमी उतरा हुआ है और क्या कर रहा है। बड़े ही ज़ोरो-शोरो से उन बड़े लोगो का स्वागत किया गया । टैन्ट खासकर उन्ही के लिये लगाया गया था । लोग तो अब कलाकारो की कलाकारी देखने के लिये बडे ही उत्सुक बने रहे थे । सबकी निगाहें बडी ही गौर से अखाड़े की जमीन पर टीकी हुई थी । चार लोग हाथ मे लठ लेकर सभी को उन खींची रस्सियों से दूर कर रहे थे । बातों मे था की जैसे सभी को वहां होने वाले दंगल से डरा रहे हो । दूर हो जाने को कहते मगर किसी के लग ना जाये ये कहकर ।
वो माइक पर बोलेने वाला संचालक कलाकारो के नाम पूकारता:- “देखियें अब आपके सामने आ रहे है वो कलाकार जो अपनी कला से कईओ को मुंह की खिलाकर आये है । कितनो को जमीन की धूल चटाई है । जो अपने हाथों मे भारी-भारी लठ इस तरह से घूमाते है की जैसे गर्मी मे हवा कर रहे हो । जी हां लठ को घूमता हुआ देखा सकता है मगर उसपर निगाह को नही टिकाया जा सकता । आपके सामने आ रहे है उस्ताद मोहम्मद अफ़ज़ल ।"
एक आदमी अखाच़े की धूल को माथे पर लगाता हुआ अन्दर दाखिल हुआ ।अपने हाथों मे वो दस फुट का लठ उठाता और कलाकारी दिखाने मे तैयार । पहले वो उस लठ को धीमा-धीमा घूमाता रहा मगर थोडी ही देर के बाद मे वो तेज हो गया । अब लठ उसके हाथों मे घूमता हुआ लग ही नही रहा था की दस फुट का है । जैसे उसकी लम्बाई और भारीपन सब खत्म हो गया था । ढोल की थाप पर थिरकता भी रहा और अपनी कलाकारी के ज़ोहर भी लोगो को दिखाता रहा । कभी बैठता, कभी खड़ा हो जाता, कभी झुक जाता तो कभी खूब नाचने लगता मगर उस लठ की रफ़्तार और घूमाई मे बिलकुल भी कमी नही आती । पिछले दस मिनट तक वो सबकी नज़रो मे छाया रहा ।
एक तरफ ये ज़ोहर छाया रहा और दूसरी तरफ घेवड़ा मे कलाकारो की भीड़ लगनी शुरु हो गई थी । आज से पहले सब कहां थे वो किसी को पता नही था पर इस अखाड़े मे इतनी सम्भावना थी की सभी उतर आये थे मैदान मे । अपने ज़ोहर के दो-दो हाथ करने ।
जहां पहले पानी टेन्कर एक या दो ही नज़र आते थे वो भी अपने टाइम पर । वहां आज टेंकरो की लाइन लगी हुई थी । वो माइक पर चिल्लाता शख्स एक आवाज़ लगाता- कलाकारी के चित्र जुबानी बतलाता तो उन्ही टेन्करो मे से एक शख्स उतर आता और अखाड़े मे बेझिझक कूद जाता फिर तैयार हो जाता उस दुनिया ने लिये जो वो अभी अपने ही अन्दर समाये चल रहा था ।
संचालक ने अवाज़ लगाई:- “अब आ रहे है हमारे बीच मे वो महारथी जो आपके बीच मे अभी तक आये थे आपको पानी पिलाने के लिये जिसे बड़ा सवाब का काम माना जाता है । मगर वो ऐसे महारथी है जो अपने हाथों मे तलवार को जब लेते है तो तलवार खून चख़कर ही मयान मे वापस जाती है । ख़तरनाक और बहुत ही जोख़िम भरा ये ज़ोहर है । हर किसी के बस का नही है अगर एक दाव भी उलता पड़े तो खुद की जान पर बन जाती है और खुद के मर जाने का वक़्त आ जाता है । आप सोच रहे होगें कि ये कैसी कला है? जी हां ये कला है वो भी हमारे बीच करने के लिये आ रहे है उस्ताद सिंकदर खान ।"
तभी एम सी डी के पानी के टेंकर मे से उसके ड्राईवर साहब उतरें और अपनी सिर पर बन्धी स्वापी को कमर मे कसते हुये वो अखाड़े मे कूद गये । तलवार हाथों मे उठाई और खेल शुरु कर दिया । आधे से ज़्यादा लोग उनके हाथो मे उस तलवार को देख रहे थे की कोन सा वो दाव है जो उलटा पड़ने से खतरनाक भी हो सकता है और बच्चे अपने तरीके उस दंगल का मज़ा ले रहे थे ।
घेवड़ा के इस खेल मे सभी बहुत ही व्यस्त थे । कोई भी ब्लॉक अपने मे नही था । काफी शोर था जो दूर तक फैला था जिसने घेवड़ा के सारे लोगो को खिचने मे देर नही लगाई थी । अभी के दौर मे तो हर तेज आवाज घेवड़ा की खास आवाज़ बन जाती । जिसे सुनकर लोग खींचे ही चले आते ।
कहानी के साथ मे लोगो को जमाना यहां पर बहुत प्यार से चल रहा था । यहां कोई भी ऐसा नही था जो कलाकार ना हो । बस नाम पूकारा जाता और सब कि नज़र पूरे माहौल मे घूमती ये देखने के लिये अब कौन आयेगा । कहीं ना कहीं से कोई निकल कर ही आ जाता और अपना करतब दिखाने के लिये तैयार भी हो जाता । कई लोग थे जो अपना सिना चौड़ा करके खड़े नजर आ रहे थे बस उन्ही के ऊपर सबकी निगाह रहती की ये भी कोई महारथी है जो अभी अपना नाम पूकारने का इंतजार कर रहा है । लोगो की निगाह पूरे माहौल मे खेल के साथ-साथ टहल रही थी ।
इतने मे वो माइक पर बोलने वाला शख्स आया । वो एक आदमी का जिक्र कर रहा था और खुद ही मैदान मे कूद गया ।
comments
No new comments allowed (anymore) on this post.
