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गलियों की गूँज, Jaanu Nagar

गलियों की गूँज

 गलियाँ गूँज उठी किसी पर्व की तैय्यारी के लिए ये गूँज पूरे घेवरा के लिए थी छ: लड़के दाण्डिया की तरह गोला मार कर आवाज को और ही बुलंद कर रही थी जैसे गाँव मव दिवारी खेला जाता है। जिसमे सायरी भी करते है ।लाठियोंच को इस तरह आपस मे लड़ाते मानो एक दूशरे के दुशमन है ।पर एक दूसरे के शरीर को बचाते हुए सावंदा घेवरा के हर ब्लाँक हर गलियों मे जा धमकते पतली हल्की खुली गलियाँ गलियों मे गुजंती आवाजे तडा तड़ कड़क धिन्ना-कड़क धिन्ना धिन,चिनक चिनक छपाक-छपाक की ध्वनियों के साथ उछलते नवजवान आपस मे बहुत ही सुन्दर खेल खेला ।
1.गलियाँ इस तरह की आवाज को पहली गली से दूसरी गली मे किस तरह से भेज देती पहली गली गूँज उठती ये गूँज नन्हे मुन्ने मन चले बच्चो की गूँज थी जो उस ग्रुप के पीछे-पीछे घूम रहे थे जिसे बचपन कहते है 7या8 शाल के बच्चे अपने बास के बने घरो से ही बास का डण्डा निकाल कर पटकते हुए अपनी अलग से एक पहचान बना रखा था ।सर पर चमकीली पट्टी बाँध कर एक दूसरे के झुण्ड मे प्रवेश कर जाते कोई पूछता की क्या है ये ? ये तो मोहर्रम के लिए है ।अभी से नही करेगे तो कब करेगे ।


2. भीड़ से विरक्त हो कर एक मानवी आक्रति अपने दोनो हाथौ से स्टील की थाली को पकड कर घर-घर जा कर चन्दा
वसूल करते उस थाली मे किसी ना पाच डाला तो किसी ने ग्यारह डाला तो किसी ने इक्वन डाला तो किसी पाँस सौ का नोट ही डाल दिया ।जिन्हे पता था कि ये तो ताजिया के लिए है तो वो अपने बिरादरी को समझते हुए दान की भावना को सामिल कर देते पर जिसे पता ही नही था कि किसके लिए पैसा मांगा जा रहा तो वो भी देखा सीखी कुछ ना कुछ थाली पर डाल ही देते ।जिससे ताजियाँ को बहुत खूबसूरती के साथ सजाया जा सके सद्दभावना को कायम रखते हुए ।

3. आवाजो को सुनकर अपने अपने दरवाज़ो से निकल कर महिलाये अपने दूध मुहे बच्चो को इस तरह ओली मे सिमेटा हुआ था कि कही वो चौक ना जाये भारी आवाज को सुनकर । कोई साल मे लिपेट कर तो कोई अपने आँचल से ही ढक रखा था पर वो भी आवाज को सुनकर कुलबुला ही जाते नाजुक बच्चे जो थे कोई पाँच माह का तो कोई आठ माह का देखने मे मासूम ।

4. बटवारे को ना समझ पाना पर बटवारे को समझने के लिए हर तरह की सहुलियतो को समझने की हर नकाम किशिसो से जुझते हुए सवालियाँ जवाब जो हर कही ना कही मिल जाते है बिना मांगे ही पा जाते है सिर्फ जाहिर करने का नज़रिया पता हो इसी नज़रिया को देखो किस तरह की नज़र को बड़ा कर रहे है । एक मिली जुली ना समझने वाली टोली को

5.सजाया जो घेवरे के बटवारे को समझ पाये बने बनाये समुदाय को एकांकी मे बाटना जो एकांक मे होकर भी एकांक ना होना विस्थापन से पहले एक गुट दिखता है तभी तो विस्थापन होता है ताकि गुटो को तोडा जा सके बस्ती बोली जाने वाली जगाहें मे एक गुट को दूशरे गुट मे शामिल होने के लिए अनुमति भी मांगना पड़ जाता था पर घेवरा मे किसी अनुमति की जरूरत नही इस मे गुट इस तरह से समाये है। मानो किसी गुट का कोई नाम नही ।

6-: इसी तरह एक शिलशिला बढ चला है सदभावंना की लकीर को पकड़ कर मुहर्म की तैय्यारी के लिए सिर्फ पहचान वाले ही घर मे नही बल्कि जाति बिरादरी वाले घरो पर ही नही सम्पूर्ण घरो मे जाकर चन्दा वसूला जा रहा है तरह तरह के ग्रुप बना कर ।तर्क दार सवाल को लेकर पर मस्ती के साथ भांगडा की आवाज के साथ हर घर के सामने जाते अपनी थाली को बढा देते जिसकी जो इच्छा होती बिना मांगे ही डाल देते चन्दा मे हर जाति बिरादर शामिल है पहचान नही कौन पैसा किसका है कोई नाम नही गोदा है । पर ताजिया एक होगी जिस तरह घेवरा एक है।

7-: ब्लाँक-ब्लाँक मे ही नही बल्कि पूरे घेवरा मे चन्दा सिमेटा और सिमेटने का अन्दाज भी अलग था पर परख नही पाये कि कौन हमारा है हम किसके है हर दरवाजे हर दरवाजे के लिए खुले है आगे कौन दरवाजा बन्द होता है कौन खुला रह जाता है ये सवाल समाजिक रिस्तो को किस तरह से नोचता है या सहेजता है गठ्ठे को टुकड़ो मे बाटना,टुकड़ो मे बटकर भी गठ्ठे की परिभाषा से सजता नज़र आता है ।ए का ओ से बी का एच से एम का जी से के का डी से किसी भी ब्लाँक के रास्ते किसी भी ब्लाँक मे जा सकते है ।हर गुट हर एक मे शामिल है अकेलना बोलना गुट को गाली सा देता नजर आता है ।
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