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हवा का झोका (जानू नागार)

हवां का झोका (घेवरा)
किसी ने अपने ऊपर पड़े साल को सभालते हुए कानो को छुपाते हुए कहा,''घेवरा की हवां घेर-घेर कर मारती है''। ये बोल उस जगह मे बोली जाने वाली आम भाषा बन गयी है।सभी कुछ ना कुछ कहने लगे।
घेवरा की ठण्डी हवा तन को कपाती है,
घेवरा की ठण्डी हवा मन को डराती है।
ठण्डी हवा के रास्ते बहुतेरे,
कभी इधर से आये कभी उधर से आये।
अभी तो चारो तरफ खेतो का ही रूप बिखरा पड़ा है दोनो तरफ सूखे नाले है इनकी तरफ से कालोनी मे आने वाली ठण्ड हवाए इस तरह शरीर से टकराती है मानो अन्दर जाने का रास्ता खोज रही हो, ईट से बने मकानो मे लटकते पर्दो को हिला कर वापस होती तो कही पर्दो कि हिलाती रहती। जिनके घर अभी चटाई के या रावटी के बने है उनमे ये हवांए बिना अनुमति मांगे ही बारीख सुराखो के रास्ते उनकी रजाई को भी ठण्डा कर जाती है।
इस हवा ने ऐसे घेरा ,
जंगल के राजा को जाल ने घेरा ।
ओस की बूँद ऐसे टपके,
जंगल के राजा पर चूहे टपके।
लहराते सरसो के पीले खेत,खेत से झाकते गेहूँ के नम्र पौधे जो अभी सरसो के पौधो के पीछे नीचे छुपे हुए है। ठण्ड हवाए सरसो के पौधो को झुकाती कपाती गेहू के पौधो का साथी बनकर
धीमी हो जाती, नमी भरे खेत और ही ठण्डे हो जाते।
कही दूर से ये आती हवाए,
लोगो के कानो मे कुछ कहती हवांए ।
इस तरह की अनोखी,अलबेली,मनचली हवांओ के झोको से लड़ने के लिए तरह-तरह के उपाय भी सोचा हुआ है ।
किसी के सर पर बंधा है मफलर,
किसी के सर पर टोपा।
माने ना ये ठण्ड हवा,
दे जाए एक झोका।
सुबह के साथ धुन्ध को चीरती हुई बस पाँच बजे से लोगो को शहर की तरफ ले जाने के लिए तैय्यार हो जाती है।
''कोई लिपटा कम्बल से,
कोई लिपटा कपड़े मे ''
इन ठण्ड हवाओ से बचने के लिए कपड़ो को जकड कर पहन कर बस के सारे शिशो को बन्द करके एक सीट मे तीन-तीन लोग बैठ कर सुगमता भरा सफर करते है हवां के झोको को सहते हुए।
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