एकांत जगह मे
दोनो को भटकता देख दो नज़रे उनका पीछा कर रही थी । जब दोनो की नज़रे पीछे को मुड़ती तो पीछा कर रही नज़रे ओट मे जाकर छिप जाती । इस तरह से नज़रो के छुपन छुपाई का खेल चल रहा था छुपन छुपाई वाली नज़रे इतना करीब आ गयी ।लड़के ने छुपती नजर को आवाज दिया" और क्या हाल है?”
16 जनवरी एक अखाड़ा:-
मोहरम् से पहले की तैयारी किसी युद्ध से कम नही होती । ये युद्ध सामने वाले नही । बल्कि इस युद्ध मे दोनो तरफ से लड़ने वाला एक ही शख्स होता है ।
घेवड़ा की जमीन पर आज पहला दंगल था । कुछ मालूम नही था की घेवड़ा की अवाम उसे सहन भी कर पाएगी या नही? पर तैयारी से तो लग रहा था की सब तैयार है। उसके हर पैंतरे को देखने के लिये और बर्दाश्त भी करने के लिये भी ।
कई लठेत, तलवार बाज़, टीन की पतली और लचकीली तलवारे, चाकूबाज़ । सभी अपने-अपने पैर-पैंतरो मे माहिर थे । जो एक तरफ लगे टैन्ट के नीचे कुर्सियों पर विराज़मान थे । एक आदमी हाथ मे माइक पकड़ सभी देखने वाली घेवड़ा की अवाम को बता रहा था की आगे क्या होने वाला है और अब क्या होने वाला है? कौन सा शातिर आदमी आपके आगे अपना ज़ोहर पेश करने वाला है । बस लोग तैयार रहते उस कलाकार को देखने और उसका ज़ोहर देखने के लिये ।
गलियों की गूँज
गलियाँ गूँज उठी किसी पर्व की तैय्यारी के लिए ये गूँज पूरे घेवरा के लिए थी छ: लड़के दाण्डिया की तरह गोला मार कर आवाज को और ही बुलंद कर रही थी जैसे गाँव मव दिवारी खेला जाता है। जिसमे सायरी भी करते है ।लाठियोंच को इस तरह आपस मे लड़ाते मानो एक दूशरे के दुशमन है ।पर एक दूसरे के शरीर को बचाते हुए सावंदा घेवरा के हर ब्लाँक हर गलियों मे जा धमकते पतली हल्की खुली गलियाँ गलियों मे गुजंती आवाजे तडा तड़ कड़क धिन्ना-कड़क धिन्ना धिन,चिनक चिनक छपाक-छपाक की ध्वनियों के साथ उछलते नवजवान आपस मे बहुत ही सुन्दर खेल खेला ।
हवां का झोका (घेवरा)
किसी ने अपने ऊपर पड़े साल को सभालते हुए कानो को छुपाते हुए कहा,''घेवरा की हवां घेर-घेर कर मारती है''। ये बोल उस जगह मे बोली जाने वाली आम भाषा बन गयी है।सभी कुछ ना कुछ कहने लगे।
घेवरा की ठण्डी हवा तन को कपाती है,
घेवरा की ठण्डी हवा मन को डराती है।
ठण्डी हवा के रास्ते बहुतेरे,
कभी इधर से आये कभी उधर से आये।