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घेवरा की पहली रात, Jaanu

घेवरा की पहली रात

दिन यों ही भागदौड़ में गुजरा कि ये लाओ वो लाओ किसी से बात करने का फुरसत नही सामानो को एकत्रित करते -करते सांझ ने अपना कदम बढा ही दिया बढते सांझ को देख सूर्य सांझ के पीछे होकर अपने आपको गहराई मे छुपा लिया गलियो मे लगे खम्भो मे लटकती बल्ब की लरियो ने सफेद रोशनी फैला दिया । माहौल कुछ बिखरा-बिखरा चटाईयो के बने मकानो से झाँकती रोशनी अंधेरे की तरफ ,कच्ची गलियां खाली ज़मीन जिसमे उगी हरी घास भी अंधेरे से भरी पड़ी ।
अगल बगल के घरो से आती आवाज़ अपने घर की तरह ही सुनाई पडती मानो आपने घर के किसी कोने से आती आवाज है ये अंधेरे वाली आवाज इस जगह मे सुनने की पहली रात थी ।पर बेबस था धूमने के लिए सामान जो इतना ज्याद था कि इन्को छोड कर कुछ पल के लए अन्धेरे का साथी बन कर अन्धेरे से भरी गलियो मे धूम सकूमन मे बनती कल्पनाओ को दबा कर चटाई से बने कमरे के अन्दर रखी समानो के पास ठहर कर रह जाता बगल वाली हर आवाज़ ऐसा आभास दे जाती मानो अन्धेरे मे छुप कर मेरे सामानो को कोई हाथ लगा रहा हो थोडा झिझकते हुए अपनी आँखो को फाँड कर मन ही मन मे अपनी सामानो को गिन जाता इसी जगह रखी है सुरक्षित है इसमे बन्द है।
बाहर खुली गली मे फैले अंधेरे के बीच रखा जगनेटर दिखता ।यदि उसके पास कोई भी कदम धमकता तो उस धमक को सुनकर मेरे कान चौकन्ना हो जाते खडा हो कर अंधेरे को लाँध कर भाप लेते कि जगनेटर सुरक्षित है ।फिर कदमो को वापस करता हुआ चटाई से बने कमरे में दाखिल हो जाता बिना किसी से कुछ बोले ।
सामने वाली मे खुला एक दरवाजा,दरवाजे के सामने पडी चारपाई ,चारपाई मे लेटा एक लडका उसके बगल मे बैठी एक 45साल की महिला अपने कानो ऊनी सोल से ढक कर बैठी थी जो सामने क्या दारवाजे के सामने रखी रंगीन टी.बी. जिसमे देवरानी जेठानी का सिरियल आ रहा था उसी मे वो दोनो लोग मस्त थे। रात कुछ ज्याद अपना स्तन बढा रका था फैलता रात का पहर भी गहरा हो रहा था फैलते पहरे को चीरती हुई  आवाज मेरे कानो मे दाखिल हुई अभी दरवाजे पर खडा हो कर देख रहा था अंधेरे की तरफ बेटा-बेटा की आवाज आयी मेरी तरफ इसारा करते हुए बेटा आप से ही क्या! मुझसे ?
हाँ आप से
आवाज के साथ पीछे को झाकता हुआ नजदीक पहुच गया ।पहुचते ही बिना कुछ पूछे ही मुझसे रजाई लेने के लिए कह दिया । क्यो यहाँ ठण्डी लगती है क्या ?
हां चारो तरफ खुला है हवां बहुत ठण्डी चलती है लोग यहां रात मे सोते कहा नींद मे धूमते रहते है ये बात मुझे कुछ डरा सा दिया कि लोग यहां नींद मे कैसे  धूमते है? बेटा जरा ध्यान से सोना क्योकि तुम्हारा  सारा सामान खुला पड़ा है ध्यान से रहना कोई जरूरत हो तो बता देना संकोच मत करना आपका ही घर है ।हां मे सर हिला दिया।
मन ही मन मे बहक गया कि समान को ध्यान मे रखना,यहां लोग नींद मे धूमते है कमरे मे दाखिल होते हौ समय पर नजर डाला तो 10 बज रहे थे। मै अपने शरीर को लेटा कर पैर भी सीधा नही किया कि गली से बात चीत की आवाज आयी कि यार देखो किस तरह गली मे फोटो को टाँग रखा है वो भी तागे से फसा कर चलो देखते है किसको-किसको गली मे लटका रखा है मै सोचने लगा कि कही ये वो लोग तो नही है जो रात के समय नींद मे घूमते है देखने के लिए बाहर निकला तो लोग खुली आँखो से हल्की रोशनी मे पहचान रहे थे इस रोशनी मे जो झरोखो से निकल रही थी उस रोशनी मे पहचान कर बोले ये जो रिक्सा पर लेटी है ये शराब वाली की लडकी है ।दूसरा थोडा बुदबुदाती आवाज मे बोला कौन नंगला वाली ?हां नंगला वाली गुजरातन ।
इस तरह की बात चीत को सुन कर अपने पैरो को उसी तरफ वापस कर लिया जिधर से गये थे जमीन मे बिछे बिस्तर की तरफ पर मन उन्ही बातो मे खोया हुआ था वो आवाजे जो बगल वाले घर से पर अपने ही कमरे की लग रही थी । इन्ही आती जाती आवाजो के बीच आँखो ने झपकी लिया ही होगा की आवाज आयी कि टैंक्कर आया है जी-ब्लाँक के सामने लोगो का दौडना चालू हो गया अन्धेरे मे गुरते लोगो के चहल कदमी की आवाज से लगता कि इधर या ऊधर के अन्धेरे से आ रहे है लोग सिर्फ आहट से ना कि पूरे शरीर से पर आहट कानो को छुती रहती अंधेरे से आती आवाजे उधर आण्टी की आवाज कानो की गूँज बन चुकी थी ।
इतना सबकुछ होते-होते रात का पहरा आधा हो चुका था समय देख कर आँखो मे नींद भर आयी आँखे अधेरे मे कब खो गयी समझना थोडा मुस्किल था पूरा शरीर एक सुनेपन को लिए हुए पड़ा रहा सान्त कानो ने बाँस के फटाक से खुलने को सुना ये आवाज शरीर मे एक तरंग भर कर चली गयी । फुर्ती के साथ उठ बैठा बाहर की तरफ होकर जगनेटर को देखा की एक नव युवक अपने चटाई के दरवाजे को खोला तो देखा की उसकी आँखे बन्द थी वो अपने कदमो को इधर-उधर गिराता हुआ अंधेरे मे पनपती धास के ऊपर लघुसंका करने के लिए बैठ गया उसके बैठने उठने से लग रहा था कि ये नींद मे है ।वो झटके के साथ उठ खडे हुए कदमो को इधर उधर गिराते हुए अन्दर की तरफ होकर चटाई से निर्मित दरवाजे को अपनी बन्द आखो की तरह बन्द कर लिया  
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