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किराया बीस रूपया lakhmi kohli

किराया 20 रुपये....
जगह: सावदा घेवरा
तारीख:- 29/09/2007
दिन:- शनिवार
समय:- शाम 4:20

तमाम जगह घिर चूकी थी। अभी शाम के चार बज के पच्चीस मीनट ही हुये थे और बाजार को लगे केवल पच्चीस मीनट। बाजार सब्जियों और खिलौनो की दूकानो से भर चूका था। यहां पर सबसे ज्यादा बिकने वाली चीज़ सब्जी ही थी।
आज देखा जाये तो पूरे सावदा घेवरा के लोंगो को इसी 500 मीटर के रास्ते पर देखा जा सकता था। कई रेहडियां और रिक्से तो यहां पर हर एक-एक मीनट के उपरान्त ही आ रहे थे। तिरपालो को जमीन पर बिछा कर वहां कोई ना कोई बैठा हुआ नज़र ही आ रहा था और सबसे ज्यादा नज़र आने वाली यहां औरतें ही थी।

एक औरत 3 पाचं-पाचं किलो की सफेद थेलियों से मे खिलौनो को निकाल रही थी। पहले उन्हे निकालती और अपनी साड़ी के छोर से साफ़ करके उसे बडे सज़ा कर रख देती।

उसी के साथ मे बैठा एक आदमी लाल मिर्च, हल्दी और अन्य मसालों को अपने चमचे से जमा रहा था। उनके टीले बनाकर उन्है ऐसे जमा रहा था की कहीं इस खुले बाजार मे हल्की सी हवा से ये उड़ ना जाये। वो उसी मे लीन था।

बाजार की भीड़ मे से निकलता एक शख्स अपने हाथों मे एक 4 फुट का सरिया और उसमे फसीं एक लाइट को लेकर भागा आ रहा था। वो चिल्लाता हुआ आया और कहने लगा:- “आज 20 रुपये हो गया है किराया।"

उसके चिल्लाने से जैसे एक ही पल मे पूरे बाजार मे हलचल सी मच गई हो। बाजार के एक किनारे खड़े एक पूराने हरे रगं के रिक्से के चारों और बहुत भीड़ जमा थी। उसके चारों और काफ़ी लोग जमा थे। कुछ ज्यादा ही हल्ला था वहां पर। ये क्या हो रहा है? रिक्सा भरा हुआ था उन चार फुट के सरियों से। जो ऊपर की तरफ़ से मुड़े हुये थे और नीचे की तरफ़ मे एक चौकोर स्टेण्ड बना हुआ था। मगर इनका होगा क्या?

उसका रिक्सा लदा हुआ था। लेकिन उसमे खाली ये ही सरिये नहीं थे। वहीं रिक्से के एक कोने मे 12 वॉल्ट की बैटरी रखी थी जिन पर पैन्ट से ABH लिखा था। वो लगभग एक फुट की होगी। दूसरी तरफ़ मे रखी थी बहुत सारी छोटी टूयबलाइट जिसे बड़े जुगाडू तरीके से बनया हुआ था। सफ़ेद रगं की फन्टी थी जिसके ऊपर मे एक छेद किये हुआ था जो उसे मुडे हुये सरिये के ऊपर फसाई जायेगी और जिस हिस्से मे टूयबलाइट लगाई जायेगी। उसमे नीचे की तरफ मे शीसा लगाया हुआ था। जिससे टूयबलाइट की रोशनी की चमक फैले। उसी के बीच मे एक पतला लाल रंग का तार निकाला हुआ था। जिसे उसे बैटरी मे लगा कर लगभग 2 या ढाई घण्टे उस टूयबलाइट को जलाया जा सकता था। जिसका किराया था 20 रुपये।

20 रुपये किराया वैसे देखा जाये तो ज्यादा भी नहीं था गैस के हण्डे के हिसाब से। जिसमे ना तो मैन्टल के टूटने का डर होता है और ना ही उसमे से गैस के रिसने का खौफ़। सबसे बडी बात तो ये थी की हण्डा अपना ही खरीदना पड़ता है। जिसकी किमत मार्किट मे 250 रुपये है। जो पाचं किलो का आता है पर उसमे गैस 3 किलो भरी जाती है और वो भी 140 रुपये की 3 किलो।

यही हाल मिट्टी के तेल वाले हण्डे का है जो बाजारों मे ज्यादा देखने को मिलता है। इसमे भी नुक्सान ही होता है। हवा के साथ-साथ ये अपनी रोशनी मे परिवर्तन लाता रहता है। कभी-कभी तो जलने मे भी तकलीफ देता है। हवा के साथ-साथ इसके मैन्टल के टूटने का ज्यादातर पगां रहता है। जो एक बाजार मे एक ही बार चलता है। घर लेकर जाते-जाते टूट ही जाता है। हल्का सा झटका लगा तब या हल्की सी हवा चली तब। जिसका खर्चा पड़ता है 5 रुपये का एक।

तभी ये 20 रुपये किराया कोई बड़ी बात नही थी। 20 रुपये किराये के नहीं बल्की ये सब बातों को सोच कर शायद टूट पडे थे उनके पास लोग। कोई अपनी कहता तो कोई अपनी। इतनी चिल्लाचिल्ली हो रही थी की वो भी किसी पर झल्ला गया था। बस उसी नोंक-झोंक मे कुछ देर के लिये उनका काम रुक गया था। लेकिन वहां पर आये लोग उसके इस काम को रुकने नही दे रहे थे। वो तो लगे थे अपनी ही मटर भुनाने मे। उनको को तो अपनी दूकान देखनी थी। अपने ग्राहक देखने थे। वो अपनी ही जल्दी मे थे। क्योंकि उस 500 मीटर के रास्ते के भरने का टाइम हो रहा था।

सभी छांट रहे थे अपने-अपने तरीके से। कोई तो पहले सरिया उठाया फिर बैटरी। बैटरी को उस स्टेण्ड मे रख कर टूयबलाइट छांटता। सब कुछ छांटकर वो चैक करने के लिये तारों को सुलझाकर देखता। माना की बैटरी माइनस-प्लस के निशान बने हुये थे मगर उन तारों मे कहां लिखा था की कौन सा माइनस है और कौन सा प्लस। बस भी उन तारों को घुमा-घुमा कर देखते और चैक करने मे लगे रहते। जो जल जाती वो उनके लिये ठीक थी और जो नहीं जलती वो उनके लिये खराब़ और उसे एक किनारे मे रख दे जाते।
अपना एक लाइट का पूरा सैट तैयार करते। 20 रुपये, अपना नाम और किस चीज की दूकान है वो लिखवाते और अपनी लाइट उठाकर चलते बनते।

लगभग आधा घण्टा ही हुआ था अभी और उनका रिक्सा खाली ही हो गया था समझों। बिना करन्ट की ये लाइट सभी के लिये सस्ती थी, आसान थी और जरूरी भी थी। तभी तो बच्चे भी उसी छांटने की लाइन मे लगे थे।

शनिवार का ये दिन यहां सावदा घेवरा के लिये बाजार का पहला और आखिरी दिन होता है। लेकिन इन लाइट वालो के लिये नही। लाइट वाले के नाम से मशहूर गोपाल अभी थोडे व्यस्त ही थे। अभी तक वो उनकी कॉपी पूरी भर चूकी थी। कोई 10 रुपये दे गया था तो कोई पूरे के पूरे 20 रुपये देकर चला गया था। उन्ही का हिसाब लगाते-लगाते वो वहीं रिक्से मे ही बैठे थे। बस नाम और पैसे ही गिन रहे थे।

उनके करीब जाकर उनकी कॉपी मे झांकने की कोशिस की तो वो बिना ऊपर देखे ही बोले:- “क्या चाहिये भाई? यहां के तो नही हो क्या चाहिये?”

"कुछ नहीं भाई साबह। क्या ये लाइट आप खुद बनाये है?”

वो मेरी तरफ़ मे देखते हुये बोले:- “हां क्यों? वैसे ये आसान है सब कुछ अलग-अलग ही तो होता है बस जोड़ना होता है। इसमे मुश्किल ही क्या है?”

मैंने बैटरी को हाथ मे उठाते हुये पुछा:- “कितना खर्चा आता होता ये लाइट बनाने मे?”

लाइट वाले:- "इसमे लगभग 1000 रुपये खर्चा आ जाता है। ये फन्टी और टूयबलाइट साथ मे लगाये तो लगभग 200 रुपये पड़ती है। वैसे तो मार्किट मे ये टूयबलाइट 15,25,30,40 रुपये की भी मिलती है और 70 रुपये की भी। हम तो 70 रुपये की ही लाते है। पहले लगाई थी 30 रुपये वाली तो दो ही दिन मे बोल गई थी। सस्ता सौदा अक्सर नुक्सान ही देता है तो क्यालिटी वाली ही लाये महंगी है मगर चलती खूब है। ऐसे ही ये बैटरी 600 रुपये की आती है और ये स्टेण्ड 125 रुपये का बना है।"

वो अपनी कॉपी मे ही घूसे थे।

मैंने कहा:- “अच्छा मैने सोचा था की लॉकल होगी। वैसे 12 वॉल्ट की बैटरी तो सस्ती भी आती है लगभग 200 रुपये तक की।"

वो ऑखो मे ऑखे मिलाकर बोले:- “भाई साहब क्या फायदा सस्ता लेकर। कोई फायदा नही है अपना ही नाम खराब होता है?”

"तो क्या भाई नाम खराब हो जायेगा तो लोग किसी और से ले लेगे क्या?”

लाइट वाले:- “यहां किससे लेगें? मेरे अलावा यहां पर कोई नही आ सकता। ये मेरा बाजार है।"

मैंने कहा:- क्या यहां पर इस काम के बाजार बटे हुये है? आपके अलावा यहां पर कितने लाइट वाले है?”

लाइट वाले:- “यहां लगभग 4 है। जो अलग-अलग जगह पर अपनी लाइट देते है। कोई सड़क के किनारे लगी दूकानो को देता है और मार्किट मे लगी और हम बाजारों मे।"

अब तो वो अपनी दूकानदारी मे लग गये थे। उनके पास जो कॉपी थी उसमे सारा बहिखाता लिखा था। लोग अभी आते ही जा रहे थे। मै बस लाइटों को जाते देख रहा था। उनके साथ मे एक शख्स खड़े थे जो हर बात मे खूब बोल रहे थे। मै खिसकता हुआ एक तरफ मे आ गया था। वो वहीं पर आ गये और इस धन्धे के बारे मे बोलेने लगे।

लाइट वाले के साथी:- “अरे साहब खूब दबाकर चलता है ये काम इन बाजारों मे। मगर साला खिचपिच बहुत है। लोग लाइट लेने तो आ जाते है 'मुझे दे, मुझे दे' करते है पर जाने के टाइम मे छोड़ जाते है। अभी शनिवार 5 लाइटें चुर गई बताओ। तभी तो 20 रुपये किया है किराय। नही तो 10 रुपये था। अब नुक्सान की भरपाई भी तो करनी है। अब देखो लोगो को ये भी मन्जूर है। हां 15 लाइटें कम गई है पिछले टाइम के मुकाबले।"

मैंने पुछा:- "कितना फायदा होता होगा एक बाजार से इस काम मे?”

लाइट वाले के साथी:- “इसमे आप देखो। सवा सो (125) हम लाते है। 20रुपये किराये के हिसाब से 2500 रुपये हो गये और साधन अपना। जिसमे कोई लागत नही लगती बस फायदा ही होता है। 2 घण्टे मे होता है ये सब। 8 हजे लोग जलाते है और हम 10 बजे उठा लेते है।"

वो हसंने लगे थे। मैंने पुछा:_ “कहां-कहां और लगाते है ये बाजार?”

लाइट वाले के साथी:- “हर दिन... हर दिन साहब। आप देखिये रविवार और मगंलवार 'हिरन कुदना' बुधवार 'मामा चॉक' सोमवार 'तिगडी बॉडर' बृहस्पतिवार 'घेवरा गावं' शुक्रवार 'निजाम पूर' और शनिवार 'सावदा घेवरा जे-जे कालोनी' जहां पर हम खडे है।"

मैंने पुछा:- “क्या यहां सभी जगहों पर भी शाम का बाजार है और यहां पर कितना किराया लेते है?”

लाइट वाले के साथी:- “हां यहां पर भी शाम का ही बाजार है। अब तो भाई साहब हर जगह पर 20 रुपये कर दिया है। लोग अपना लिये है इसे तो कोई परेशानी ही नही है।"

मैंने पुछा:- “दिन मे क्या करते है फिर? क्या कहीं और भी जाते है?”

लाइट वाले के सथी:- “भाई साहब टाइम ही नही होता। अभी हमे समान उठाते-उठाते और घर जाते-जाते मे 12 बज जायेगे। फिर हम समान उतारते है और बैटरी को चार्ज पर भी लगाते है। जिसमे हमें 2 बज जाते है। बस खाना खाते-खाते हमें सुबह के 4 बज जाते है। तो ये समझ लिजिये की पूरे दिन सोते ही है।"

"हां भाई साहब कैसे चार्ज करते है इन सवा सो बैटरियों को आप?”

लाइट वाले के साथी:- “इसमे कोई बड़ी बात नही है। हम सभी को एक साथ रख देते है गोला बना कर फिर बिजली के बोर्ड से एक तार लेते है और एक बैटरी मे लगाते है। उसके बाद मे उसे से लेते है दूसरी मे जोड़ते है। दूसरी से तीसरी मे और तीसरी से चौथी मे । इसी तरह से आगे बढ़ते जाते है और सारी की सारी एक साथ चार्ज हो जाती है।"

"ओ...हो क्या तरीका है। आप रहते कहां है भाई साहब जो आपको 2 घण्टे लगते है जाने मे।"

लाइट वाले के साथी:- “यहीं घेवरा गांव मे। ज्यादा बड़ा घर नही है हमारा। पहले तो हम एक ही प्लॉट मे रहा करते थे। इस काम को भी ज्यादा समय नही हुआ है अभी लगभग 2 साल ही हुये है। पहले हम इन्ही बाजारों मे सब्जी बैका करते थे।"

मैंने पुछा:- “तो इस काम की दिमाग मे कैसे आई?”

लाइट वाले के साथी:- “इसी का दिमाग चला। गोपाल तो शुरु से ही बिजली के काम कि ही कहता था। इसी ने अन्दाजा लगाया था कि जब हम सब्जी की दूकान लगाया करते थे तो उस समय मे किराया 10 रुपये था। हम तो 10 रुपये देते थे। जो हमे बिलकुल भी ज्यादा नही लगते थे। मगर वो 100 लाइट में 1000 रुपये कमाता था। यानि के हमारे 10 और उसके 1000। तभी इसमे ये काम किया। शुरुवात मे तो हमने ये खरीदी थी। हमें तो ये 1000 रुपये मे पड़ी थी वो भी लॉकल माल की। तब फिर हमने ये खुद बनाई।"

"समान कहां से लाये थे और कैसे बनाई थी ये आपने?”

लाइट वाले के साथी:- “ये तो यही बतायेगा। मगर हां चांदनी चॉक का नाम लेता था।"

मैंने हंसते हुये पुछा:- “पहली-पहली बार तो यहां लोगो को सिखाना होगा बैटरी मे तार लगाना। यहां कैसा हुआ था?”

लाइट वाले के साथी:- (वो हसंते हुये) “हां यहां ही तो ऐसा करना पडा। ये कोइ परमानेन्ट दूकान वाले थोडई है। यहां तो बहुत ऐसे लोग है। जो पहली बार बाजार मे दूकान लगा रहे है। तो जब यहां पर दूकान लगाइ थी तो हमने ही सबको जलाकर दिखाई थी। सब करन्ट के डर से हाथ बी नही लगा रहे थे। कह रहे थे नंगे तार है। और अब देखो बच्चे भी तार जोड़ लेते है।"

इतना कहकर वो अपनी दूकान पर लाइट लगाने के लिये चले गये। उन्होने दो रगं की लाइट जलाई मेरी तरफ़ मे देखने लगे।

मैंने उनकी तरफ़ देखते हुये पुछा:- “ये दो रंग की लाइट क्यों भाई साहब? कोई खास वज़ह।"

लाइट वाले के साथी:- “सफेद लाइट ज्यादातर कपडे, खिलौने, कॉस्मेटीक और खाने वाले लेते है और हरी लाइट सब्जी वाले ताकी पिछले कई दिनों की बासी सब्जी भी ताज़ी लगे।"

इतना कहकर वो अपने काम मे लग गये।
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