किराया 20 रुपये....
जगह: सावदा घेवरा
तारीख:- 29/09/2007
दिन:- शनिवार
समय:- शाम 4:20
तमाम जगह घिर चूकी थी। अभी शाम के चार बज के पच्चीस मीनट ही हुये थे और बाजार को लगे केवल पच्चीस मीनट। बाजार सब्जियों और खिलौनो की दूकानो से भर चूका था। यहां पर सबसे ज्यादा बिकने वाली चीज़ सब्जी ही थी।
ऐलान...
भारत सरकार की तरफ़ से...
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शाम होने वाली थी सूरज अपनी लालिमा को अम्बर तले छुपा रहा था सड़क के किनारे सरकारी बसे अपने माथे पर जाने वाली जगाहों का बोर्ड लगाये खड़ी थी यात्री आ कर अपने गनतब्य स्थानो को देखर तसल्ली से सांस को थामते हुए सीट पर बैठ जाते आवाज लगाते अगले आने वाले यात्री को अवगत करा ही देते की बस यहां जा रही है।
- सड़क के दोनो किनारे
सूर्य छिपने के पीछे अपनी लालिमा को इतना सिमेट लिया कि वो एक गोल लाल रंग का गोला बनकर आसमान मे ठहर सा गया हो कहां आसमान कहां पृथ्वी जो हर एक शाम,शाम रोशनियो से गाढी होती है कही दूर धूमने वाला भी अपने आसियाने की तरफ मुँह कर लेते है।चौडी सड़क के दोनो किनारो को साफ करती एक महिला सलवार कुर्ता पहन कर एक लम्ने बास को हाथ की मुठ्ठी पकड़ कर बास के नीचे हिस्से मे छलीरा सीक की झाड़ू बाँध कर जमीन मे रगडती जिसकी रगडन से सड़क के किनारे की घास फूंस मिट्टी के कडो को साफ करती हुई आगे की तरफ बढती जाती किसी जल्द बाजी के साथ नही सभी सौदागरो से चन्दा लेते हुए आगे-आगे चलकर आगे ही निकल गयी।
