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jab o din yad aata hai

जब वो दिन याद आता है तो मन मे उठती अनगिनत तरंगे समतल हो जाती है। समतल होती तरंगे अपने आप मे सूनापन महसूस करती है। तपती धूप को तो सह लिया चटाई के बारीक छिद्रो से आती ठंडी हवा के साथ पर अब वो भी मुश्किल हो रहा है
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