BlogGalleryContact

घेवरा मे हुई पहली और छोटी सी मुलाकात ..(babli ray)

"अरे हमारा रंग तो अण्डे जैसा था। वो तो यहां आकर ऐसा पड़ गया। "
रोटी बनाती माया जी ने यह बात बड़े ईठलाते हुये बोली। पसीने की लड़ियां कब उनके माथे से बहकर उनकी थोडी तक आ जाती उनको पता ही नहीं चलता। अपने घर की चौखट पर बैठी वो गैस चूल्हें पर चढ़े तवे से गर्म-गर्म रोटियां उतारती गई।
12गज़ की ज़मीन में आधे में कमरा और आधे में आंगन बनाया हुआ है। कमरे में हर सामान बंधा हुआ रखा है। दो बड़े-बड़े संदूक उन पर 3 कपड़ों की गठरियां। एक बड़े से टप में बहुत सारे स्टील के बर्तन भरे हुये है और भी बहुत सारा सामान। जो कि ज़रुरतों के अनुकूल है। चिकनी मिट्टी से लीपा गया अपनी ही आकर्षणता में है। चटाईयों से बने इस पीले घर में रोशनी की कोई ज़रुरत नहीं। इसके छिदरेपन और जगह-जगह खुले मौखों में से कुदरती रोशनी अपने आप ही घर के कोनों में पैर पसारती है। जिसका कोई पैसा नहीं। रात को भी उजाला रखने के लिये माया जी ने अब 100रु.महीना देना शुरु कर दिया है। जिसमें लाइट बहुत डिम आती है। एक 100 वाट का बल्ब उनके घर के आंगन में टंगा है। वहीं उन्होंने एक तख़्त पर बच्चों की चीज़ की और पर्चून की छोटी सी दूकान खोल रखी है।

माया जी बताया कि उनके 3भाई है। जिसमें से एक भाई उनको देखने आया था कि उनकी बहन कैसी है और किस हाल में रह रही है? उनके भाई ने ही अभी 2 दिन पहले इस दूकान में सारा सामान भरवाया। दूकान खुलवाई है। जिसमें ज़्यादा नहीं तो कम से कम पेट भरने लायक तो दूकानदारी तो हो ही जायेगी। माया जी ने बताया कि रोज़ की 15 से 20रु. की दूकानदारी तो हो ही जाती है।

अब माया जी चूल्हें से थोड़ा दूर होकर बैठ गई। काली मसूर की दाल में लगती सीटियों को सुनने लगी। वहीं आटे के कुंडे में पानी डालकर अपने हाथ धोने लगी। तभी उनकी दूकान पर एक आदमी आये और बोले:- "अरी बहन। यह सरसों काहें रख रखी है। यहां मच्छी तो कोई खायेगा नहीं।"
माया जी बोली:- "अरे भईया आपके लिये ही रख रखी है। क्या पता आप मच्छी बनाकर खाओ। मैंने पहले से ही इंतज़ाम कर रखा है कि आपको किसी चीज़ की कोई परेशानी ना हो।"
इस बात पर दोनों एक दूसरे की तरफ़ देखकर हल्का सा मुस्काये फिर वो आदमी निकल गये और माया जी बाहर आकर बर्तन धोने बैठ गई।

फिर बोली:- "सरकार को यहां नालियां जल्द से जल्द बनवानी चाहिये। अभी तो हम बराबर वाले प्लॉट में पानी फेंक देते है। देखो जहां इंसान होता है वहां सब काम होते है। खाना-पकाना, नहाना-धोना। अब कल को जब इस प्लॉट में कोई आ जायेगा तो बताओ हम पानी कहां डालेंगे? इस गली में भी कितना पानी डालेंगे। जहां गढ़डें में पानी खड़ा हो जाता है। वहां मच्छर भी पैदा हो जाते है।
वैसे अब तो यहां काफ़ी सहूलियतें हो गई हैं। 2 डीटीसी की बसें चलने लगी है। जो कि आई टी ओ तक पहुंचाती है। वो बस यहीं आती है पर कुछ देर रुकती है। जिसको जाना हो जल्दी जल्दी जाओ। अगर लेट हो गये तो बैठे रहो घर में।
पानी के टैंकर भी बतेरे आते है।

हमने बताया कि नांगलामाची में भी पर्ची कट रही है। वहां के लोग भी यही आयेंगे।
मायाजी अचानक से बोली:- "जब हमारा तोड़ा था जब तो कुछ बताया भी नहीं था ना पर्ची कटी ना कुछ। बस आ गये और तोड़ दिया। यहां लाकर बैठा दिया। यहां हमारी पर्ची कटी। और तो और 3 दिन के बाद बताया कि हमारा प्लाट कौन सा है। और बोले अगर सामान के साथ आओगे तो प्लॉट मिलेगा वरना नहीं। हम 3 दिन तक यूं ही ज़मीन और खुले आसमान के नीचे रहें। यह दिन भी याद रहेंगे।

अब देखो जब हमने बना लिया है तो दूसरे प्लॉट में भेज रहे है। अब हम भी क्या कर सकते है। सरकार के गुलाम है। जैसा सरकार चाहती है। वहीं होता है एक अकेले आम आदमी का कोई बस नहीं चलता।
 Permalink

comments

No new comments allowed (anymore) on this post.