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टोकन, Suraj Rai

कल रात मैंने ट्रंक में झाँका तो मुझे अंदर एक चमकीला, चौकोड़ टुकड़ा नज़र आया। उस पर कहीं-कहीं चॉक की पतली परत थी। इस चौकोड़ टुकड़े से मेरी कोई याद नहीं जुड़ी थी। मैंने हाथ से चॉक को साफ़ किया। वो टुकड़ा अल्मूनियम का था। उस पर एक नंबर लिखा था - 415। मैं यह नंबर पहचानता हूँ - हमारे राशन कार्ड पर भी यही नंबर लिखा है। उस पर एक मोहर लगी थी, शायद जारी करने वाले की। उस मोहर के अंदर एक तारीख़ छपी थी, 1987। ये देख कर मेरे दिमाग़ में एक छवि गुज़री – मेरे बचपन का एक दिन, जब घर की दहलीज़ पर खड़े दो आदमी ब्रुश से घर के बाहर, दीवार पर ये नंबर पेंट कर रहे थे। ये नंबर मेरे बचपन में कई साल दीवार पर लिखा रहा था।

मैंने अपनी माँ से अल्मूनियम के उस टुकड़े के बारे में पूछा। वो बोलीं, “ये टोकन है। इस पर हमारे घर का नंबर लिखा है। हमारा राशन कार्ड और इलेक्शन आई-कार्ड इसके आधार पर बने थे। इसे वीपी सिंह ने बनवाया था। यहाँ हर ग़रीब आदमी का टोकन बना था। इसका मकसद कम दाम में केरोसीन और चीनी दिलवाना था। टोकन जारी होते वक़्त हमारी कलोनी का नाम दिया गया था। आज इसे एलएनजेपी कलोनी कहते हैं, पर उस समय इसे टी-वुड मार्किट नाम दिया गया था।" माँ ने मुझे टोकन को वापस उसकी जगह पर रख देने को कहा। उन्होंने कहा कि आगे चल कर ये हमारे काम आएगा।

टोकन को वापस ट्रंक में रखते हुए मैं सोचने लगा, जिसका परिवार की मेरी यादों से कोई रिश्ता नहीं है, वो शहर में मेरे परिवार की पहचान का मज़बूत चिन्ह है।
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