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आज की रात कहाँ? Jaanu Naagar

अब आँखें पूछने वाली थीं कि आज की रात कहाँ कटेगी? उन आँखों की झुकी पलकों का इशारा समझ पाना मेरे लिए मुश्किल नहीं था। वक़्त ही ऐसा था।

जिस रास्ते से हम दोनों को जाना था, वह मेरे लिए जाना-जाना सा था, लेकिन मेरे पापा के लिए अनजाना था। सूखे गले और चिपके होंठों से एक आवाज़ आई, "बेटा, चलो।" ये आवाज़ मेरे लिए पुरानी थी। पर आज मुझे अपने कमरे में नहीं, कुछ दूर जा कर दूसरे के घर में सोना था, जहाँ हमें शरण मिली हुई थी। शहर में अपने टूटे कोने को छोड़ कर हम दोनों चल दिए, किसी और जगह को सजाने के लिए। टूटते नांगला को चीरते हुए हम रिंग रोड पर आ गए। उधर पुलिस ने अपना चेक पोस्ट रोड पर ला कर खड़ा कर दिया था। अब बसों ने भी अपना रास्ता बदल रखा था। अजनबी बन गई सड़कों को सोच पाने में मैं हैरान था।
पापा ने पूछा, "कहाँ चलना है?”
थोड़ा रुकते हुए मैंने जवाब दिया, "शशि गार्डन।"
"तो चल, खत्ता मोड़ तक पैदल चलते हैं।"

चलते-चलते मैं शशि गार्डन जाने वाली बसों के रूट नंबर याद करने की कोशिश करने लगा, पर वो रूट मुझे याद न आए जो आज हमें हमारी मंज़िल की तरफ़ ले कर जाते। एकाएक थ्री-व्हीलर आ कर रुका। मैंने पूछा, "आप शशि गार्डन चलोगे?”
"जी!”
"मीटर से चलोगे?”
"नहीं, ख़राब है।"
"तो फिर कितने पैसे लोगे?”
“चालीस रुपये।”
ये सुन कर मुझे लगा कि हमारी मंज़िल दूर है। पापा बोले, “ठीक है", और हम बैठ गए।

थ्री व्हीलर वाला हम दोनों को ले कर यमुना पार करता हुआ एक मोड़ छोड़ कर दूसरे मोड़ पर खड़ा हो कर बोला, "जी उतरो।" मैं जगह को कुछ पहचानता हुआ उतरा और अपनी पहचान वाली गली में चलने लगा। मेरी नज़रें हर घर की बाहरी बनवाट को देखे जा रही थीं, पहचानने के लिए। कब आएगा वो पत्थर वाला घर, जिसके सामने हरियाणा वाले नंबर की सफ़ेद कार होगी। उसके दिखते ही अगले दरवाज़े से अंदर जाना था।

कार दिखी तो उसे छूता हुआ मैं अंदर की तरफ़ दाखिल हुआ। इतने में एक महिला सामने आईं, जो मेरे लिए अनजान थीं। उन्होंने हम से रुकने का इशारा किया। मैं तुरंत हँसते हुए बोला, "मेरा नाम जानू है। हम कल वाले किरायेदार हैं।" पापा चुप रहे।

महिला बोलीं, "बेटा, हम ने तुम्हरा पीने का पानी भर दिया है।" वो हमारे आगे-आगे ज़ीना चढ़ती गईं। कमरा खोलते हुए बोलीं, "आज की रात और इस में काटो। कल सुबह आपको आपका कमरा मिल जाएगा।" फिर नीचे उतरते हुए बोलीं, "खाना ले कर तो आप आए ही होगे।" हम ने झूठी हामी भर दी।

चारपाई डालते हुए मैंने पापा से बैठने के लिए कहा। लोटे में उन्हें पानी दिया और उनके जूते उतारे। ये अपना घर तो था नहीं; किसी चीज़ की जगह निर्धारित नहीं थी। जूतों को मैंने ऐसे ही चारपाई के नीचे रख दिया। पापा ने अपनी कमीज़ उतार कर चारपाई पर रख दी थी।

बाहर हल्का उजाला था, अंदर ट्यूब लाइट की सफ़ेद रोशनी थी। पापा बोले, "नांगला में जो हुआ, उसे छोड़ो। अब नई ज़िंदगी की तरफ़ देखते हैं। देखते हैं ये आगे किस मोड़ पर ला कर छोड़ेगी।" फिर भूख की सोच के बोले, “खाने का कैसे करेंगे आज?” मैंने कहा, "आज होटल से खा आते हैं।"

सफ़ेद रोशनी को बुझाते हुए, दरवाज़े को आहिस्ता से बंद कर, मैं पापा के साथ चल दिया। पापा ने घर के बाहर निकलते ही पूछा, "क्या खाएगा?” मैं उन से थोड़ा पीछे था, उनकी बात सुन नहीं पाया। "बहरा है क्या?" वो नाराज़ हो गए। अपनी बगल में ले कर उन्होंने मेरे गले में हाथ डाला और फिर मुझे उस जगह के बारे में ऐसे बताने लगे जैसे उसे बरसों से जानते हों। बोले, "सुन, ये जगह मेरे लिए जंगल थी। मैं अपनी बहन के साथ खिचड़ीपुर में रहा करता था। ये जो डीडीए के फ़्लैट हैं, पहले यहाँ कीकर के पेड़ थे। इसी के आगे आटीआई थी। ये 1991-92 के आसपास की बात है।" इतने में एक जगह दिखी जहाँ चार-पाँच भगोने सजे रखे थे। पापा बोले, "ओ देखो, होटल आ गया।"

हम ने खाना ऑर्डर किया, पर ठीक से खा नहीं पाए। पापा ने बीस का नोट दिया और हम दोनों वहाँ से चल पड़े। घर को पहचानते हुए अंदर जा कर सफ़ेद रोशनी जलाई। पापा चारपाई पर लेट गए। मैं कमरे में रखे कालीन को ज़मीन पर बिछा कर लेट गया। आँख कब लगी, पता नहीं चला। पापा सोए या नहीं, मैं पूछ भी नहीं पाया।
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