अब आँखें पूछने वाली थीं कि आज की रात कहाँ कटेगी? उन आँखों की झुकी पलकों का इशारा समझ पाना मेरे लिए मुश्किल नहीं था। वक़्त ही ऐसा था।
जिस रास्ते से हम दोनों को जाना था, वह मेरे लिए जाना-जाना सा था, लेकिन मेरे पापा के लिए अनजाना था। सूखे गले और चिपके होंठों से एक आवाज़ आई, "बेटा, चलो।" ये आवाज़ मेरे लिए पुरानी थी। पर आज मुझे अपने कमरे में नहीं, कुछ दूर जा कर दूसरे के घर में सोना था, जहाँ हमें शरण मिली हुई थी। शहर में अपने टूटे कोने को छोड़ कर हम दोनों चल दिए, किसी और जगह को सजाने के लिए। टूटते नांगला को चीरते हुए हम रिंग रोड पर आ गए। उधर पुलिस ने अपना चेक पोस्ट रोड पर ला कर खड़ा कर दिया था। अब बसों ने भी अपना रास्ता बदल रखा था। अजनबी बन गई सड़कों को सोच पाने में मैं हैरान था।
उनके घर में तीन चारपाइयाँ दिखाई देती हैं। एक चारपाई पर बैठी, सांवले से चेहरे वाली नूरजहाँ आपा, अपने आधे सफ़ेद बालों में, ऐनक की डोरी में अपनी सोने की बालियों को पिरोए, अपने किसी चमकीले बैग की चेन को खोलने में लगी थीं। बैग से दूसरा बैग निकला, पहले से ज़्यादा चमकीला और ख़ूबसूरत। उन्होंने दूसरे बैग की भी चेन खोली, तो उसमें तीसरा बैग छुपा था, दोनों से भी ख़ूबसूरत और नया। रंग भी एकदम ताज़ा था। ये देख कर होंठों पर मुस्कान फैल गई। उत्सुकता के साथ मैंने कहा, “अरे ये क्या! बैग के अंदर बैग! कितना सुंदर लग रहा है।"
वो बैग पर हाथ फेरते हुए बोलीं, "मेरी बेटी ने बना कर दिया है इन्हें, अपने चमकीले जोड़ों की कतरनों से बचा-बचा कर। मुझ से बोली, अम्मी अपना ख़ास-ख़ास सामान इसमें ही रखना।" ये बताते हुए वो बैग को प्यार से निहारने लगीं।
आज हमारी इनसे तीसरी मुलाक़ात है। जब भी आते हैं, अकेली ही पंखे से हवा करती हुई मिलती हैं और अपने परिवार के शख़्सों के बारे में बड़े प्यार से बतलाती रहती हैं। उस खुले घर में इतने शख़्स दिखाई पड़ते हैं कि मैं वहाँ समय का गुज़रना ही भूल जाती हूँ। ख़्याल आता है एक भरे-पूरे परिवार का, जो शाम होते-होते आएगा और तीनों चारपाइयाँ दिन भर की कहानियों से लद जाएँगी। रोज़ के क़िस्से उनकी ज़ुबान पर हर मुलाक़ात में आते रहते हैं।
बातों ही बातों में मैंने उनसे पूछ लिया, "कितने बच्चे हैं आपके?” इस सवाल की शायद उन्हें उम्मीद न थी। कुछ देर तक वो ऐसे ही मुझे देखती रहीं। फिर बोलीं, "ना बेटी, मेरी कोई औलाद नहीं। तीस साल हो गए मेरी शादी को।" ये कह कर वो पास रखी थैली में से घी को डिब्बे में डालने लगीं। बोलीं, "अभी खुला है ना सब, धीरे-धीरे बसेगा। अभी तो कुत्ते कहीं से भी घुस कर घी की थैलियाँ घसीट ले जाते हैं।"
"ऐसा लग ही ना रहा कि तुम कहीं और से आई हो। तुम तो यहीं की लग रही हो!"
उनकी इस लाईन ने यशोदा और मेरी इस जगह पर पहले दिन की हिचकिचाहट को दूर कर दिया। मुस्कुरा कर हम उनकी चरपाई के पास बिछी दूसरी चारपाई पर बैठ गए।
नूरजहाँ बाजी लक्ष्मी नगर ठोकर नंबर-8 में चालीस गज़ मकान ख़रीद कर पंद्रह साल से रह रही थीं। अब वहाँ से यहाँ उन्हें अठारह गज़ ज़मीन दी गई। अभी वो अठारह गज़ बल्लियों के साँचे में नहीं ढला। आसपास ज़्यादा लोग नहीं आए, इसलिए नूरजहाँ बाजी का यहाँ दिल नहीं लग रहा है। "पर उससे क्या, मैं किसी न किसी तरह लोगों के बीच जगह ढूँढ कर रहती हूँ यहाँ।"
जगह अनेक शब्दों से बुनी होती है। बुनी हुई चटाई में से कोई एक लट निकाल दें, तो चटाई कमज़ोर नहीं होती। पर उस निकली हुई लट का पता साफ़ मालूम पड़ता है। ठीक ऐसा ही किन्हीं शब्दों के निकल जाने से लगता है।
अकसर किसी बसेरे में जहाँ चार लोग बात करते हुए दिखते हैं, अपने आप समझ बनती है कि टाइम-पास कर रहे हैं। पर घेवरा में टाईम-पास, बोर होना जैसे अल्फ़ाज़ ने अभी अपने पैर नहीं जमाए हैं। चार लोगों का एक साथ दिखना कुछ गंभीर बातचीत का संकेत देता है। ऐसे गुट को देखते ही आसपास गुज़रने वाले बेझिझक थोड़ी दूर या पास हो कर उसमें शामिल होने की कोशिश करते हैं।
समाज हमें एक-दूसरे से मिलवाता है, तो समाज ही हम से सवाल भी करता है। देर रात बाहर क्या कर रहे थे? उन लड़कों की संगत में क्यों हो? इस तरह के कई सवाल वक़्त-बे-वक़्त हमारे आसपास घूमते हैं, हमें हिदायतें देते हैं। वो चेहरा किस का है, जो ये सवाल कर रहा है? ये चेहरा साफ़ हमारे सामने नहीं आता। मन में ख़ुद-ब-ख़ुद आने लगता है कि रात बारह बजे हमें बाहर नहीं रहना चाहिए। हिदायतें हम में समा जाती हैं। हम में निखरने लगती हैं; हम उस धुंधले चेहरे का आकार बनने लगते हैं। ख़ुद से बहस चलती रहती है।
घेवरा अपनी प्रक्रिया में आज आवारगी शब्द को बेदखल किए हुए है। कोई खाली घूमता हुआ नहीं लगता और ना ही कोई बुज़ुर्ग किसी नौजवान को "आवारा" नाम से पुकारता है।
किसी की झिड़क में भी समय की लम्बी गूँज साफ़ समझ में आती है। आवारगी के लिए जगह को अपने पुराने समय में जाना, उसको बनाना होगा। कई बातों को भूलना और ढ़ेरों को याद में लाना होगा।
आख़िर जगह के समय से शब्द बँधे हैं; शब्द से जगह और उसका समय नहीं।