शहर के किनारे, Shamsher Ali
शहर में हज़ारों कोने हैं जिनमें अपने नाम की भी जगह कहीं न कहीं लिखी होगी। यही दृढ़ता मन में लिए लोग शहर में आते हैं और अपना कोना ढूँढते हैं। असंतुलित रोज़मर्रा इनकी पहचान बन कर शहर के किसी कोने में एंट्री कराता है, जहाँ वो अपने पैरों की नींव गाड़ना शुरू करते हैं। "शहर", ये शब्द ख़ुद में ऐसा परिचय बन जाता है जिसे सभी बख़ूबी समझते हैं।
आने की वजह होती है, लेकिन ठिकाने का अता-पता नहीं रहता। दुनिया बहुत बड़ी है, यही बात आने वालों का ठिकाना ढुँढ़वा देती है। समय का पहिया धीरे-धीरे चलता रहता है और कल का आया बंदा दस साल पुराना बंदा बन उस जगह में अपने पैर जमा लेता है। जगह के समय और उनमें बनते अलग-अलग उतार-चढ़ाव में उसकी भागीदारी बंध जाती है।
कुछ सामाजिक अनौपचारिक जगहों में, जहाँ चाहत और इच्छाओं के बेशुमार पेड़ लगे होते हैं, वहाँ बसने का सभी को बिना मोहर वाला लाईसेंस मिल ही जाता है। तभी कोई बच्चा अपने घर से भाग जाता है तो उसके आने की आशा लम्बे समय गुज़र जाने के बाद भी ऐसी जगहों के होने से बंधी रहती है। विस्थापन आज इन किनारों को ख़तरे में डाल रहा है।
नांगला के पी-98 लोगों के लिए घेवरा में जगह नहीं। पर कुछ ये सोच कर घेवरा पहुँच गए हैं कि शायद यहाँ उनके लिए भी कोई एक कोना बचा हुआ है, कि हर परिवार के हर सदस्य को घेवरा की दीवार से टेक लगाने की जगह तो मिल ही जाएगी। आख़िरकार ये शहर ही तो है।
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