घर का बनना, Yashoda
जब एलएनजेपी के घरौन्दों की नींव रखी जा रही थी तब से अब तक हमारा घर एक-सा ही बना हुआ है। आज गली हमारे घर से दो फ़ुट ऊँची हो गई है। इसमें ढलते खरंजों ने कई घरों को झील में ला छोड़ा है। ऐसा एक घर हमारा भी है। चौखट इतनी नीची है कि नए लोगों का स्वागत उनके माथे पर सलाम ठोक कर करती है। कभी-कभी इससे माँ झल्ला जाती हैं और ग़ुस्से मे बोलती हैं, "मै तोड़ दूँगी इस चौखट को! इसकी चिनाई मैंने की है।"
जब भी कोई चौखट से टकराता है तो उसके बनने का समय बड़बड़ाहट में माँ की ज़ुबान पर आने लगता है। उन्हें आज भी याद है वो पल जब पूरी बस्ती के घरों की नींव रखी जा रही थी। घर बनाने के लिए जगह-जगह से चीज़ों को चुना जा रहा था।
हमारी चौखट में जो चौड़ा फट्टा लगा हुआ है, वो सालों की सफ़ेदी चढ़-चढ़ कर अब तो नज़र भी नहीं आता। पर माँ इसे बड़ी मेहनत से पीले क्वाटरों से ढेरों लक्कड़ के सामान में से साफ़ कर के, पसीनों में भीगती हुई लाई थीं। उस समय रिक्शे वाले ज़्यादा पैसे नहीं लेते थे, पर फिर भी माँ ने रिक्शा नहीं किया था। आज जब वो झल्ला कर बोलती हैं कि तोड़ देंगी, तो लगता है जैसे पूरा घर नर्म परतों में बदल गया है और दोबारा से चिनाइयाँ शुरू हो गई हैं बीते सपनों की।
माँ की झुंझलाहट पर पापा अकसर कह उठते हैं, “चौखट टूट जाएगी तो नए सिरे से कहाँ से पैसा लगाएँगे?” तब माँ कहती हैं, “आप तो चुप ही रहिए! आप ने किया ही क्या है इसमें! आप ने तो अपना सिल्वर का डिब्बा उठाया, और चल दिए। पर इसे रहने लायक मैंने बनाया है।" जब माँ ये बात कहती हैं तो आँखें उस मिट्टी की चिनाई की दीवारों पर जा रुकती हैं और उसमें समय का खुलापन दिखने लगता है।
हर साल इन दीवारों की मरम्मत दीवाली के हफ़्ता भर पहले शुरू हो जाती है। दीवारों की झिर्रियाँ और चूहे के छेद कारपेट के चूने से भर दिए जाते हैं। नीचे की कच्ची ज़मीन किसी भारी जूते की रगड़ से कहीं से भी पपड़ी की तरह ऊपर आ जाती है, उस झेंप के रूप में जिसे शायद ना बनाने वाले ले कर जीते हैं। पर बनाने वाले के लिए उखड़ती पपड़ियों में उसका गुरूर है, जो हर साल मज़बूती लेता रहता है।
जब भी कोई चौखट से टकराता है तो उसके बनने का समय बड़बड़ाहट में माँ की ज़ुबान पर आने लगता है। उन्हें आज भी याद है वो पल जब पूरी बस्ती के घरों की नींव रखी जा रही थी। घर बनाने के लिए जगह-जगह से चीज़ों को चुना जा रहा था।
हमारी चौखट में जो चौड़ा फट्टा लगा हुआ है, वो सालों की सफ़ेदी चढ़-चढ़ कर अब तो नज़र भी नहीं आता। पर माँ इसे बड़ी मेहनत से पीले क्वाटरों से ढेरों लक्कड़ के सामान में से साफ़ कर के, पसीनों में भीगती हुई लाई थीं। उस समय रिक्शे वाले ज़्यादा पैसे नहीं लेते थे, पर फिर भी माँ ने रिक्शा नहीं किया था। आज जब वो झल्ला कर बोलती हैं कि तोड़ देंगी, तो लगता है जैसे पूरा घर नर्म परतों में बदल गया है और दोबारा से चिनाइयाँ शुरू हो गई हैं बीते सपनों की।
माँ की झुंझलाहट पर पापा अकसर कह उठते हैं, “चौखट टूट जाएगी तो नए सिरे से कहाँ से पैसा लगाएँगे?” तब माँ कहती हैं, “आप तो चुप ही रहिए! आप ने किया ही क्या है इसमें! आप ने तो अपना सिल्वर का डिब्बा उठाया, और चल दिए। पर इसे रहने लायक मैंने बनाया है।" जब माँ ये बात कहती हैं तो आँखें उस मिट्टी की चिनाई की दीवारों पर जा रुकती हैं और उसमें समय का खुलापन दिखने लगता है।
हर साल इन दीवारों की मरम्मत दीवाली के हफ़्ता भर पहले शुरू हो जाती है। दीवारों की झिर्रियाँ और चूहे के छेद कारपेट के चूने से भर दिए जाते हैं। नीचे की कच्ची ज़मीन किसी भारी जूते की रगड़ से कहीं से भी पपड़ी की तरह ऊपर आ जाती है, उस झेंप के रूप में जिसे शायद ना बनाने वाले ले कर जीते हैं। पर बनाने वाले के लिए उखड़ती पपड़ियों में उसका गुरूर है, जो हर साल मज़बूती लेता रहता है।
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