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मेरे पापा की नज़र से घेवरा, Suraj Rai

किसी एक जगह को दिया निरंतर समय शख़्स में एक वैल्यू लाता है। यह वैल्यू जगह में एक वैल्यू लाता है। यही कारण है कि नांगला में दिए किसी के तीस साल घेवरा को उसकी निर्धारित जगह बनाते हैं; इनके बदले ही तो ये बारह गज़, अठारह गज़ के प्लॉट हैं।

जहाँ हम अभी रह रहे हैं, वहाँ घर, गली, मोड़ से ले कर घरों के घेरे बनाने में हमारे फ़ैसले रहे - हम घर किस जगह बनाएँगे, किस तरफ़ दरवाज़े का मुँह होगा, किन लोगों को पड़ोस में शामिल करना है, किन को नहीं। यह सब हम ने ही तय किया है अपनी जगह में रहते हुए। इन घेरों से ले कर पीपल के पेड़ के नीचे का मंदिर भी हम ने सोचा था। जगह के विकसित होने में हमारा योगदान ना सही, हमारे फ़ैसले तो रहे ही हैं, मर्ज़ी तो रही है। घेवरा में ये अचानक गुम हो गया है। यह खटकता है। इसके लिए शब्द नहीं हैं, इसलिए सुविधा-असुविधा के फेरे में पड़े हैं। अपनी पावर खोने का ग़म है।

क्या हर शख़्स अपने पड़ोस से ख़ुश होगा? हो ही नहीं सकता। कई दिन तो ऐसे आते हैं कि भागने को जी करता है। रिश्ते तो हर दो मिनट में बनते हैं, रोटी भी साथ बैठा शख़्स पूछ ही लेता है। इसके बावजूद भी हम यही आलाप रहे हैं कि हम ने अपने रिश्ते-पड़ोस को खो दिया। कुछ तो है जिसे छुपा रहे हैं।
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