नांगला से आ कर रावण इस बार जेजे कलोनी सावदा-घेवरा के बी ब्लॉक में मारा जाएगा। टेंट लग गया है। टेंट लगाने वाले बोले, "अब तो हमें यहाँ जीना है। वहाँ तो हम सरकार की जगह पर खेलते थे, ये तो अब हमारी जगह है। तो क्यों ना खेलें अपनी पुरानी राम लीला!" अभी सब कलाकर बिछड़े हुए हैं, पर कुछ भी हो, शुरुआत तो हो ही गई है।
सज्जन ठाकुर बड़ी उमंग के साथ बोले, ये जो माईक, मशीन, स्पीकर हैं, ये सभी हम सब ने आपस में मिल कर कमेटी बना कर लिए थे नांगला में।
उत्तेजना में आ कर छोटे जोकर बोले, "जी हमारी फ़ोटो खींचो, नहीं तो मैं यहीं पर अपने आपको दफ़ना दूँगा!"
"अरे नहीं छोटे जोकर, हम तुम्हारी फ़िल्म ही बनाए देते हैं!"
अब क्या, छोटे जोकर ख़ुश हो कर, अपना माईक ले कर सामने आ गए। माईक अभी स्पीकर से जुदा था। अभी तो सिर्फ़ रिहर्सल चल रही थी।
एक ज़ोर का नारा लगाया, "बोलो राम चंद्र की जय! सीता माता की जय! नांगला माँची वालों की जय! प्रेम से बोलो, पूरे सावदा-घेवरा वालों की जय!"
ये सब तब हो रहा था जब वहाँ पर कोई जनता नहीं थी, सिर्फ़ कमेटी वाले लोग थे। धूप तेज़ थी, हवा का बहाव ज़्यादा था। टेंट हवा के झोंकों में फहरा रहा था। रात में खेले जाने वाले सामानों को सजाया जा रहा था।
बगल से गुज़रते हुए एक काली तिरपाल के नीचे सांवली लड़की किसी की आइब्रो बनाती दिखी। ये दिखना कोई अनोखी बात नहीं थी। पर इस जगह, जहाँ दूर-दूर तक खेत हैं और घर ठीक से जम भी नहीं पाए हैं, वहाँ ये दिखना अचंभे में डालता है। होंठो पर मुस्कान ला देता है, जीने की चाहतों को सामने ला खड़ा करता है।
वो मुझे देख कर रुक गई। थोड़ा मुसकुराई और न जाने कौन-सी झिझक को उसने अपने माथे पर तीन अंगुलियों को फेर कर दूर किया। मैं मुस्कुराई ओर बोली, “पार्लर का काम आता है?”
वो मुँह में धागे को दबाए हुए बोली, “हाँ"।
“तो पार्लर खोलने का इरादा है?”
घेवरा के शुरू में एक कोना है, जहाँ एक बड़े से पेड़ की छाया में कुछ फेरी वाले एक साथ इकट्ठा होते हैं। सब्जी वाले, जलजीरा वाले, पानी वाले, दाल-मसाले वाले, एसटीडी-पीसीओ वाले। इस कोने में उन्होंने एक छोटे-से बाज़ार जैसा माहौल बना दिया है। लोगों में अपनी इस नई जगह में तसल्ली से समय काटने की जो क्षमता है, वो उनके काम करने और उनकी बोलचाल में दिखाई देती है। यहीं एक शख़्स से मेरी बात हुई, जिनका नाम सुनील है। उम्र पच्चीस साल के आसपास होगी। शरीर से हट्टे-कट्टे हैं, और मोटी घनी मूछें हैं इनकी। पेशे से ट्रक ड्राइवर हैं।
जब एलएनजेपी के घरौन्दों की नींव रखी जा रही थी तब से अब तक हमारा घर एक-सा ही बना हुआ है। आज गली हमारे घर से दो फ़ुट ऊँची हो गई है। इसमें ढलते खरंजों ने कई घरों को झील में ला छोड़ा है। ऐसा एक घर हमारा भी है। चौखट इतनी नीची है कि नए लोगों का स्वागत उनके माथे पर सलाम ठोक कर करती है। कभी-कभी इससे माँ झल्ला जाती हैं और ग़ुस्से मे बोलती हैं, "मै तोड़ दूँगी इस चौखट को! इसकी चिनाई मैंने की है।"
जब भी कोई चौखट से टकराता है तो उसके बनने का समय बड़बड़ाहट में माँ की ज़ुबान पर आने लगता है। उन्हें आज भी याद है वो पल जब पूरी बस्ती के घरों की नींव रखी जा रही थी। घर बनाने के लिए जगह-जगह से चीज़ों को चुना जा रहा था।
हमारी चौखट में जो चौड़ा फट्टा लगा हुआ है, वो सालों की सफ़ेदी चढ़-चढ़ कर अब तो नज़र भी नहीं आता। पर माँ इसे बड़ी मेहनत से पीले क्वाटरों से ढेरों लक्कड़ के सामान में से साफ़ कर के, पसीनों में भीगती हुई लाई थीं। उस समय रिक्शे वाले ज़्यादा पैसे नहीं लेते थे, पर फिर भी माँ ने रिक्शा नहीं किया था। आज जब वो झल्ला कर बोलती हैं कि तोड़ देंगी, तो लगता है जैसे पूरा घर नर्म परतों में बदल गया है और दोबारा से चिनाइयाँ शुरू हो गई हैं बीते सपनों की।
माँ की झुंझलाहट पर पापा अकसर कह उठते हैं, “चौखट टूट जाएगी तो नए सिरे से कहाँ से पैसा लगाएँगे?” तब माँ कहती हैं, “आप तो चुप ही रहिए! आप ने किया ही क्या है इसमें! आप ने तो अपना सिल्वर का डिब्बा उठाया, और चल दिए। पर इसे रहने लायक मैंने बनाया है।" जब माँ ये बात कहती हैं तो आँखें उस मिट्टी की चिनाई की दीवारों पर जा रुकती हैं और उसमें समय का खुलापन दिखने लगता है।
हर साल इन दीवारों की मरम्मत दीवाली के हफ़्ता भर पहले शुरू हो जाती है। दीवारों की झिर्रियाँ और चूहे के छेद कारपेट के चूने से भर दिए जाते हैं। नीचे की कच्ची ज़मीन किसी भारी जूते की रगड़ से कहीं से भी पपड़ी की तरह ऊपर आ जाती है, उस झेंप के रूप में जिसे शायद ना बनाने वाले ले कर जीते हैं। पर बनाने वाले के लिए उखड़ती पपड़ियों में उसका गुरूर है, जो हर साल मज़बूती लेता रहता है।
किसी एक जगह को दिया निरंतर समय शख़्स में एक वैल्यू लाता है। यह वैल्यू जगह में एक वैल्यू लाता है। यही कारण है कि नांगला में दिए किसी के तीस साल घेवरा को उसकी निर्धारित जगह बनाते हैं; इनके बदले ही तो ये बारह गज़, अठारह गज़ के प्लॉट हैं।
जहाँ हम अभी रह रहे हैं, वहाँ घर, गली, मोड़ से ले कर घरों के घेरे बनाने में हमारे फ़ैसले रहे - हम घर किस जगह बनाएँगे, किस तरफ़ दरवाज़े का मुँह होगा, किन लोगों को पड़ोस में शामिल करना है, किन को नहीं। यह सब हम ने ही तय किया है अपनी जगह में रहते हुए। इन घेरों से ले कर पीपल के पेड़ के नीचे का मंदिर भी हम ने सोचा था। जगह के विकसित होने में हमारा योगदान ना सही, हमारे फ़ैसले तो रहे ही हैं, मर्ज़ी तो रही है। घेवरा में ये अचानक गुम हो गया है। यह खटकता है। इसके लिए शब्द नहीं हैं, इसलिए सुविधा-असुविधा के फेरे में पड़े हैं। अपनी पावर खोने का ग़म है।
क्या हर शख़्स अपने पड़ोस से ख़ुश होगा? हो ही नहीं सकता। कई दिन तो ऐसे आते हैं कि भागने को जी करता है। रिश्ते तो हर दो मिनट में बनते हैं, रोटी भी साथ बैठा शख़्स पूछ ही लेता है। इसके बावजूद भी हम यही आलाप रहे हैं कि हम ने अपने रिश्ते-पड़ोस को खो दिया। कुछ तो है जिसे छुपा रहे हैं।
एक पतला-सा दरवाज़ा - सामने की एक हल्की-सी दीवार पर खिड़की उठा कर एक डंडे से सटाई गई है। ये बनावट इसके और घरों से अलग होने का संकेत देती है। देख कर लगता है शायद ग्यारह बजे के बाद कोई रुकेगा नहीं इसमें।
पूरी ज़मीन में लिपाई की ठण्डक।
जहाँ एक तरफ़ अपनी जगह पा लेने की तेज़ी, अपना घर बना लेने की गति हर शख़्स में दिख रही थी, वहीं अपने नाम कटे प्लॉट में दुकान बनाना भी बड़ा महत्त्वपूर्ण था।
गली के बीच के हिस्से में दुकान के क्या मायने होंगे? वो अपना बाज़ार ख़ुद बना पाएगी? ये सोचना अभी ज़रूरी नहीं था। बस एक तरह की शुरुआत हो जाए, दुकान लोगों की नज़रों में ठहर जाए।
गली के अंदर, घरों के बीच-बीच में एक-दो घरों की जगह खाली थी। वरना आसपास हर काम तुरन्त हो रहा था।
दक्षिणपुरी से 75 किलोमीटर दूर है घेवरा। ये दूरी घेवरा पहुँच कर ख़त्म नहीं होती, बल्कि जगह के फैलाव में कहीं छुप जाती है।
दक्षिणपुरी में अकसर घेवरा की बातें होती रहती हैं। एक पुनर्वास कलोनी के सामने जब शहर में होते विस्थापन या पुनर्वास की बातें आती हैं तो कई यादों की तस्वीरें उभरने लगती हैं। हर बीतता हुआ लम्हा बिताए लम्हों से मेल खाता है। उस समय शहर को देखने की अपनी जो नज़र थी, वो बयाँ होने लगती है। ख़ुद से एक नज़दीकी पा लेता है शहर में चलता तनाव।
ऐसे लम्हों में दक्षिणपुरी और घेवरा में शायद फ़र्क सिर्फ़ इतना रह जाता है कि दक्षिणपुरी समय के चलते अपना महत्त्व ज़िंदगियों में पा चुकी है, जबकि घेवरा ने अभी उस तरफ़ बढ़ना शुरू ही किया है।
"कहाँ ला के छोड़ा है, दिल्ली के कोने में, इतनी दूर!" जब कोई ये बोलता है तो लगता है जैसे रास्ते की इस दूरी ने एक अपार रूप ले लिया है। एक ऐसी दूरी जो दक्षिणपुरी से ही नहीं, बल्कि शहर की कल्पना से है।
किसी जगह में बसने के लिए पहुँचा दिए जाने पर लोग अपने साथ अपनी दूरियाँ भी ले आते हैं। इसी दूरी को तय करने से हर दिन की बुनाई शुरू होती है।
"एक मकान आठ दिनों में बनता है।"
"क्या इससे कम समय नहीं ले सकते? जितना जल्दी बन जाए, अच्छा रहेगा। सिर को छत मिल जाएगी तो एक ठिकाना हो जाएगा। फिर घर आने में मन नहीं ऊबेगा।"
"बारह गज़ की ज़मीन है, मैं मिस्त्री हूँ। हाथ-पैर मशीन तो नहीं हैं। मेरे लिए तो अच्छा हो अगर जल्दी बने। फिर मैं दूसरे काम का नंबर लगाऊँ।"
नपी ज़मीन को घूँघट की ओट से नज़रें मापने की कोशिश कर रही हैं। "मिस्त्रीजी, कितनी ईंटें मँगवाऊँ?"
मिस्त्री कभी आँखें ऊपर उठा लेता तो कभी दाएँ-बाएँ गर्दन घुमा कर चारों कोनों को देखता। होंठ धीरे-धीरे हिलते।
[ विस्थापन ]
by Nangla Lab
@ 06.09.2006 23:00 CET
घर का दरवाज़ा शुरू होने से पहले दोनों तरफ़ की दीवारों के साथ एक बहुत छोटी-सी खुली जगह तख़्त बिछाने के लिए छोड़ रखी थी।
नीचे की कच्ची ज़मीन को पानी और मिट्टी घोल कर पोता हुआ था। सामने चटाई से बनी दीवार पर वर्ष 2006 का कैलेंडर लटकाया हुआ था।
दो शख़्स नीचे मटीली ज़मीन पर बैठे छप्पर बना रहे थे। हाथों में एक बड़ा मोटा-सा सुंआ था। उसमें पिरोए मोटी सुतली से ये चटाइयों में बाँस की लकड़ी कस रहे थे। थोड़ी देर खड़ा होने के बाद जब मैं बैठा तो उन्होंने मेरी ओर देखा। मैंने पूछा, "क्या आप अपना घर बना रहे हो या फिर कारीगर हो?” उन्होंने बड़े ही जोशीले अंदाज़ में कहा, "आज के ज़माने में कौन कारीगर नहीं है। सभी कारीगर हैं, कोई कम है तो कोई ज़्यादा।"
आनंद हलदर की उम्र साठ साल है। उनके बेटे आशीष की पैंतालीस साल और पोते राजू की उम्र बाईस साल है। ये बंगाल के मुर्शीदाबाद ज़िले से हैं। तीनों घेवरा में एक साथ चटाई से घर बनाने का काम कर रहे हैं।