अनचाही शुरुआत, Rakesh
आज नांगला माँची में घुसते ही एक विचित्र दृश्य सामने था, जिसमें एक समाज की स्थापना के साथ-साथ विस्थापन में ढहते सोच-रूपी लावे का उबाल था। आज नांगला का टूट जाना अपनी चरम-सीमा के बहुत पास पहुँच चुका था। स्कूल के अंदर नांगला में गुज़ारी ज़िंदगी के बदले में पर्ची काटी जा रही थी। कुछ लोगों को सावदा-घेवरा में प्लॉट दिया जाएगा। नांगला के स्कूल में आज की तारीख अपने ही अतीत के विरोध में दर्ज रहेगी।
स्कूल के गेट के बाहर गेट को थामे हुए लोगों की लाईन समाज के ढाँचे में ढली अपनी अनचाही पहचान से लड़ रही थी। आँखों में बेचैनी, चेहरे पर एक भूख लिए कोई बैठा था। किसी ने धूप से बचने के लिए पल्लू से अपने सिर को ढका हुआ था, कोई दीवार से टेक लगाए उसके साये में खड़ा था। एक अजीब शोर था इस दृश्य में। परछाइयाँ जैसे ताप से बौखला गई हों, अपने बीते हुए दिनों में जीने के बाद जैसे इस ठहराव से निकलने का कोई रास्ता दिखाई दे गया हो। यहाँ पहुँचने के लिए ही तो लड़ा जा रहा था अब तक, हर तरह से कोशिश हो रही थी कि एक घर मिल जाए, एक खोया हुआ समाज मिल जाए।
इंसान को पहली बार देखा इस परिस्थिति में।
अपने होने की पहचान – अपने डॉक्यूमेंट्स – को सूझ-बूझ से संभाले, बार-बार एक-दूसरे से अपने डॉक्यूमेंट के पुख्ता होने के बारे में पूछते लाईन में लगे कई लोग। न समय की चिंता, न मौसम की बेरुखी से झिझक। अपने पहचान पत्र को अपनी कोहनियों से दबाए, पन्नियों में संभाले खड़े कई लोग। कोई एमएलए से अपने सारे डॉक्यूमेंट वेरिफ़ाई कराए खड़ा था, जिसके बगल में खड़ा कोई और धीरे से कह रहा था, “आपका चांस बहुत कम है।" मैं एक तरफ़ कैमरा लिए खड़ा था। आज तस्वीरें लेने में बहुत दिक्कत हो रही थी। चेहरों को पल-भर से ज़्यादा देख पाने की ताक़त मुझ में कम होती जा रही थी। सावदा-घेवरा का तो यहाँ सिर्फ़ एक धुँधला साया ही था। बस बीते हुए वक़्त के साये से उभरने की चाहत का नज़ारा ही था।
