
30 अगस्त को एमसीडी ने एक लिस्ट नांगला के बस्जिद की दीवार पर लगाई । इसमें डॉक्यूमेंट दिखा के चुने गए 30,000 लोगों के नांगला से लगभग 900 घरों के घेवरा मे मिला प्लॉट नंबर दर्ज थे। रात भर मोमबत्ती में डॉट-मैट्रिक्स प्रिंट वाली इस लिस्ट में सब ने अपना नंबर ढूँढ़ा। सुबह तक बारिश में भीगी लिस्ट में मिटे अक्षरों में भी तलाश जारी थी।
कोई ऐसी चीज़ नहीं थी आज, जो तुल नहीं सकती थी। अपनी लिमिट से भी आगे निकल चुका था तराज़ू।
ढेरों तिरपालों के गट्ठर आजू-बाजू बंधे, बिखरे पड़े हैं। कई तोले जा चुके हैं और कई तुलने बाकी हैं। तराज़ू के दो पलड़ो में से एक पलड़ा दुकान वाले का होता है, पर वो भी सामान से लदा है। तिरपाल से तिरपाल तोल कर हिसाब दिया जा रहा है। कोई भी चीज़ बेमोल नहीं है, बशर्ते उस में वज़न हो। सड़क के किनारे को गोदाम बना कर दबा-दब सामान फेंका जा रहा है। गली में तरह-तरह के उठते शोर की तरह सामान भी एक समान नहीं है। बड़ा कठोर था आज हिसाब का पलड़ा, जो चीज़ों के 'कैसे आने' को जानता ही नहीं था।

दिल्ली के नए सिरे, सावदा-घेवरा में यहाँ से दाख़िल
[ विस्थापन ]
by Nangla Lab
@ 07.08.2006 23:00 CET
आज नांगला माँची में घुसते ही एक विचित्र दृश्य सामने था, जिसमें एक समाज की स्थापना के साथ-साथ विस्थापन में ढहते सोच-रूपी लावे का उबाल था। आज नांगला का टूट जाना अपनी चरम-सीमा के बहुत पास पहुँच चुका था। स्कूल के अंदर नांगला में गुज़ारी ज़िंदगी के बदले में पर्ची काटी जा रही थी। कुछ लोगों को सावदा-घेवरा में प्लॉट दिया जाएगा। नांगला के स्कूल में आज की तारीख अपने ही अतीत के विरोध में दर्ज रहेगी।

एमसीडी द्वारा जारी पर्ची, 7000 रु के "शेयर मनी" की रसीद
तेज़ सूरज की तपन और चिलमिलाती हवा को मुलायम बना रही थी उनकी हँसी। बनियान और तहमत पहने, हाथों में अपने हुनर को एक ढाल देने वाली आरी, हथौड़ी और छेनी लिए और बिखरे बालों के साथ चेहरे पर संवरी हुई मुस्कान लिए मेरे सामने खड़े थे हलदर साहब। बाबू की तरह दोनों हाथ पीछे बाँधे हुए थे। कुछ देर तक हम एक-दूसरे को ताकते रहे। हैरानी से नहीं, मुलाक़ात के उस छोटे से चिथड़े से, जिसे मुस्कुराहट कहते हैं। वो एक पल नीचे देखते, फिर नज़र सामने उठाते। दस मिनट तक हमारे बीच सिर्फ़ हँसी रही।
हलदर साहब का घर लक्ष्मी नगर में था। वहाँ से उठा दिए जाने के बाद उन्हें घेवरा में जगह मिली। जगह एकदम नई थी। लक्ष्मी नगर पहली बस्ती थी जो घेवरा आई।
घेवरा जैसा प्योर माल उनका परिवार आसानी से हज़म नहीं कर सकता था, तो हल्दर साहब ने अपने बीवी-बच्चों को गाँव की पुरानी मिट्टी में भेज दिया।
औज़ार के हिसाब से उनका काम बढ़ई का है, और वो पलंग, अल्मारी, दरवाज़ा, कुर्सी आदि बनाते हैं। पर जिस फ़ैक्ट्री में वो काम करने जाते थे, अभी वहाँ काम बहुत डाउन चल रहा है। फ़ैक्ट्री खुली है, पर काम नहीं है। वहाँ जा कर वो किराये का पैसा लुटा नहीं सकते। इसलिए फ़ैक्ट्री आना-जाना बंद है। सात हज़ार रुपये उनकी तंख्वाह थी, जो पिछले महीने काम बंद होने से नहीं मिली।
"आसपास के कई लोग दीवाली का एडवांस, बोनस ले कर गाँव चले गए हैं”, वो हँसे।
फ़िलहाल कुछ टाइम तो उन्हें घेवरा में ही बहुत काम मिल जाएगा। "घेवरा में तो अभी काफ़ी फ़र्नीचर बनना बाकी है,” ये कहते हुए वो आगे बढ़ गए, जैसे उनके अपने कुछ बनाए हुए प्लैन हैं इस जगह के आने वाले समय को ले कर।