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घेवरा से लौटने के बाद, Neelofar

घर में घुसते ही कुछ नज़र नहीं आता। मैं एक तरफ़ बैठ कर धीरे-धीरे चीज़ों के दिखने का, उनका ख़ुद से दोबारा परिचय बनाने का इंतज़ार करती हूँ। कभी तो माँ अपने काम में गुमी रहती हैं, और कभी रुक कर पूछती हैं, "आज बड़ी जल्दी वापस आ गई?"

मैं टॉयलेट से होकर, पानी पीकर लेट जाती हूँ। घेवरा में गुज़ारी सुबह दिमाग में घूमती है। आज के घेवरा से किसी कलोनी बनने तक का सफ़र छोटा तो लगता है, पर मैं तय नहीं कर पाती। लगता है माँ का पिछला समय है उस जगह में। बहुत पूछूँ, तो वो कहती हैं, "मुस्तुफ़ाबाद में अपने दिन कैसे दोहराऊँ? ना लाइट, ना बाज़ार; दूर–दूर घर, कच्ची मिट्टी की ज़मीन..."

घेवरा की जगह और शकरपुर से आगे बने बड़े-बड़े शॉपिंग मॉल, क्लब और सालों से चल रहा बड़ी-बड़ी जगहों का निर्माण हम से चुनौती भरा सवाल करता है, "इनमें आप कहाँ हैं?”
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