ये आवाज़ें नहीं चाहिएँ, Lakhmi Kohli
आज हारमोनियम लिए बिजेन्दर भाई साहब नहीं थे, ना ही कबाड़ी वाले अकंल जी नज़र आ रहे थे।
“सरजी, आप नहीं गए?” अंदर जाते हुए एक पैनी आवाज़ ने रोका।
"कहाँ?”
"आज जन्तर-मन्तर पर रैली निकाल रहे हैं। पूरी बस्ती के आदमी गए हैं। वैसे रैली तो बच्चों की है। कह रहे थे पाँच तारीख को नांगला तोड़ दी जाएगी। पहले बोला था साल भर के लिए रुकेगी बस्ती! तो सब ने फ़ैंसला किया कि बच्चों से रैली निकलवाएँगे, स्कूल ड्रेस में, ताकि नागंला माँची रुक जाए।"
इतना कह कर वो वापस अपने बर्तनों की घिसाई में जुट गईं। अब तो जैसे बस्ती में घुसने का कोई तुक नहीं था। नांगला आज खाली था। ख़ुद को साधन मान कर सब रैली में जो चले गए थे, कि शायद कोई फ़ैंसला अपने हित में हो जाए।
कुछ लोग फिर भी दिख रहे थे।
“सरजी, आप नहीं गए?” अंदर जाते हुए एक पैनी आवाज़ ने रोका।
"कहाँ?”
"आज जन्तर-मन्तर पर रैली निकाल रहे हैं। पूरी बस्ती के आदमी गए हैं। वैसे रैली तो बच्चों की है। कह रहे थे पाँच तारीख को नांगला तोड़ दी जाएगी। पहले बोला था साल भर के लिए रुकेगी बस्ती! तो सब ने फ़ैंसला किया कि बच्चों से रैली निकलवाएँगे, स्कूल ड्रेस में, ताकि नागंला माँची रुक जाए।"
इतना कह कर वो वापस अपने बर्तनों की घिसाई में जुट गईं। अब तो जैसे बस्ती में घुसने का कोई तुक नहीं था। नांगला आज खाली था। ख़ुद को साधन मान कर सब रैली में जो चले गए थे, कि शायद कोई फ़ैंसला अपने हित में हो जाए।
कुछ लोग फिर भी दिख रहे थे।
