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बस नंबर 949, Jaanu Naagar

ओस की बूँदों ने अभी घास को छोड़ा नहीं था। उन्हीं बूँदों पर सूर्य की किरणें नाच रही थीं। 949 नंबर की बस काले खाँ से निकल पड़ी। 7:50 बजने वाले थे। बस में नांगला में रहने वालों के चेहरे थे, जो घेवरा के लिए रवाना हो रहे थे। बस के ड्राईवर की उम्र पचास के आसपास होगी, पैरों में राजस्थानी जूती पहन रखी थी और बार-बार बीड़ी पी रहा था। परिचालक की उम्र चालीस के आसपास होगी, आँखों पर चश्मा था। बस तो वही डीटीसी की थी, जो हर रूट में देखने को मिलती है।

नांगला के सामने बस थोड़ा थम कर निकली। नांगला गाँव में रहने वाले कुछ लोग बस के पिछले दरवाज़े से चढ़े। मानुस जी भी चढ़े। वो अपने गाँव से कल रात साढ़े बारह बजे निज़ामुद्दीन स्टेशन पर उतरे थे, पर कोई साधन नहीं था तो उन्हें नांगला में ही रुकना पड़ा। बस फिर से चल पड़ी। दिल्ली सचिवालय, राजघाट, दिल्ली गेट, ज़ाकिर हुसेन कॉलेज, अजमेरी गेट, आनंद पर्वत, करोल बाग, खालसा कॉलेज, पंजाबी बाग, पीरा गढ़ी चौक पार कर नांगलोई की तरफ़ सफ़र करते हुए डेढ़ घंटे में बस ने सावदा-घेवरा की तरफ़ मुँह कर लिया।
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