निर्माण शुरू, Rakesh Khairalia
सैकड़ों लोगों को सवदा-घेवरा की जम़ीन पर छोड़ा जा रहा है।
वो जिंदगियाँ, जिन्होंने पहले कभी किसी बंजर ज़मीन को जीवन के स्रोत्रों से भर कर उसे सजाया-संवारा था, अब उतरने लगी हैं घेवरा की जम़ीन पर, फिर लोहा लेने। समय की भटकी रेखाओं को दिशा देने का एक और संघर्ष शुरू। लक्ष्मी नगर, शहादरा के बसेरों की घेवरा में पुनर्वास की प्रकिया शुरू।
एक शख़्स ने दोपहरी में चार-छ: बाँसों के डंडों को ज़मीन में ठोक, उनके आसपास रस्सियाँ बाँध कर ऊपर कम्बल और चादरें डाल दीं।
दोपहर का सूरज अपनी चुभने वाली किरणों के तीर फेंक रहा है। खेतों का ज़र्रा-ज़र्रा लावे की तरह तप रहा है।
घेवरा में निर्माण शुरू हो गया है।
वो जिंदगियाँ, जिन्होंने पहले कभी किसी बंजर ज़मीन को जीवन के स्रोत्रों से भर कर उसे सजाया-संवारा था, अब उतरने लगी हैं घेवरा की जम़ीन पर, फिर लोहा लेने। समय की भटकी रेखाओं को दिशा देने का एक और संघर्ष शुरू। लक्ष्मी नगर, शहादरा के बसेरों की घेवरा में पुनर्वास की प्रकिया शुरू।
एक शख़्स ने दोपहरी में चार-छ: बाँसों के डंडों को ज़मीन में ठोक, उनके आसपास रस्सियाँ बाँध कर ऊपर कम्बल और चादरें डाल दीं।
दोपहर का सूरज अपनी चुभने वाली किरणों के तीर फेंक रहा है। खेतों का ज़र्रा-ज़र्रा लावे की तरह तप रहा है।
घेवरा में निर्माण शुरू हो गया है।
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