BlogGalleryContact

शहर और उसके "मन-चित्र", Rakesh

पिछले कुछ दिनों से शहर में बेचैनियों का आलम है। रोज़ कोई न कोई शख़्स अपने भीतरी "मन-चित्रों" को ले कर दूसरों से जूझता रहता है, कुछ न कुछ पेश करता रहता है। हाथों की लकीरों जैसा ना मिटने वाला रास्ता है, जिस पे चलने पर पीछे तो देख सकते हैं, उस जगह का आभास तो कर सकते हैं जहाँ खड़े हैं, लेकिन आगे का कोई कोना तक नज़र नहीं आता। एक आकर्षण है जो आगे की तरफ़ ले जाता सा लगता है, अपने इस आभास से, कि बहुत कुछ होगा, बहुत कुछ होने वाला है।

वक़्त अलग-अलग पैमानों से सब को देखता है। उसकी आँखों से कुछ नहीं छुपा।

दुनिया में अलग-अलग लोगों के जीने की या जी पाने की जटिल व्यावहारिक सोच का दर्पण क्या कहता है? एक ही जगह, एक ही वक़्त, एक ही भूख, एक ही प्यास, एक ही आशा - फिर आवाज़ों और परिस्थितियों को दो रूपों में देखने वाली धारणाएँ क्या हैं?

अगर किसी सिरे पर आ कर इन्हें देखते हैं तो ये हमें तिरछी नज़र से देखती हैं। ऊपर से देखो तो गहरी मालूम होती हैं; सामने से देखो तो अनंत काल उभरता नज़र आता है।

नांगला में जो था और जो है, जब हम ये देखते हैं, तो क्या हम किसी उलझ रहे धागे की तरह हो जाते हैं? या किसी बड़े झरने की तरह जो पहाड़ों को काट कर उस पर से रास्ता बना रहा है?

जीवन में इतना कुछ देखने के बाद "नॉर्मल ज़िंदगी" क्या है? “नॉर्मल" कौन है? आप? मैं? कोई और?

आज लोगों की आँखों में ग़ुस्सा है, दिल में भड़ास है, माथे पर शिकस्त है। करने वाला सामने है पर कुछ भी तो बस में नहीं है। ये स्थिति क्या है?

 Permalink

comments

No new comments allowed (anymore) on this post.