[ विस्थापन ]
by Nangla Lab
@ 15.04.2006 23:00 CET
सूरज आकाश पर चढ़ चुका था । भभकती गर्मी बस्ती में बतलाते लोगों को झुलसा रही थी । अपनी कमर से गमछा, तेहमत बाधें हुए आदमी झुंड़ बनाऐ खड़े, उस बेरहम बुलडोज़र के होते वार को देख रहे थे । दूर किसी और जगह फिर एक मकान गिरा, जिसके गिरते ही टूट कर रेत और बदरपुर की धूल के छोटे-छोटे कण हवा में तैर रहे थे । वहाँ धड़ाम से कोई छत गीरी, जिसकी डरा देने वाली आवाज़ ने रौंगटें खड़े कर दिये ।
[ विस्थापन ]
by Nangla Lab
@ 13.04.2006 23:00 CET
पिछले कुछ दिनों से शहर में बेचैनियों का आलम है। रोज़ कोई न कोई शख़्स अपने भीतरी "मन-चित्रों" को ले कर दूसरों से जूझता रहता है, कुछ न कुछ पेश करता रहता है। हाथों की लकीरों जैसा ना मिटने वाला रास्ता है, जिस पे चलने पर पीछे तो देख सकते हैं, उस जगह का आभास तो कर सकते हैं जहाँ खड़े हैं, लेकिन आगे का कोई कोना तक नज़र नहीं आता। एक आकर्षण है जो आगे की तरफ़ ले जाता सा लगता है, अपने इस आभास से, कि बहुत कुछ होगा, बहुत कुछ होने वाला है।
[ विस्थापन ]
by Nangla Lab
@ 12.04.2006 23:00 CET
अपने भीड़ भरे रास्तों से गुम हो गईं थी गलियां । एक गहरा वक़्त हर गली की अवाज़ों के सामने जम गया था। हर नये शख़्स का स्वागत करती या छूने वाली नज़रें आज अपने मे ही सिमटी सी दिख रही थी। दीवारों पर अंगीठी से बने निशान मलवे के ढेर को सहला रहे थे। रास्ता खाली होने के बाद भी गली में से निकलना भारी सा हो रहा था।
[ विस्थापन ]
by Nangla Lab
@ 06.04.2006 23:00 CET
आज कल नांगला की रात कैसी होती होगी? एक तो लाइट नहीं, और ऊपर से एक वीरानापन। कुछ-कुछ घर अभी भी बचे हुए हैं जिनमें लोग अभी भी अपनी रोज़मर्रा को जी रहे हैं । पर शाम का सूरज ढलते-ढलते वो भी अपने घोंसलों मे बैठ जाते होगें, मोमबत्ती या चिरागों की रोशनी को घेर कर । और लम्बी चर्चा होती होगी, ना जाने कितने मुद्दों पर । वो मुद्दा कुछ भी हो सकता है - सरकार, पिछला समय जो यहाँ गुज़ारा है । उसे दोहराने पर या याद करने पर उन की बातचीत कहीं ना कहीं इस विस्थापन को छू रही होगी । और बातों में अपनी गाढ़ी छवि बना रही होगी ।
[ विस्थापन ]
by Nangla Lab
@ 05.04.2006 23:00 CET
कहीं बसने की जल्दी है, तो कहीं पर आस लगाए बैठे हैं । किसी ने अपना बसेरा ढूँढ लिया है, तो किसी की समझ में नहीं आ रहा है कि वो क्या करे? जहां देखो हर कोई किसी न किसी काम में व्यस्त दिख रहा है । कोई सामान बांध रहा है, तो कोई अपनी क़ीमती चीज़ों में कुछ चुन-चुनकर खोज रहा है। अपने सामान को एक तरफ़ इकठ्ठा करके किसी आस में बैठे लोग और कुछ औरतें और बच्चे भी। [ विस्थापन ]
by Nangla Lab
@ 04.04.2006 23:00 CET
बाबा अपनी कहानी बताने लगे । बोले, "हमने यहाँ पर रिक्शा चलाया। रिक्शा चलाकर अपने घर पर तरह-तरह से अपने परिवार वालों को सुखी रखा । जो एक छोटा सा निजी घर था, वो भी हमसे छीन लिया जा रहा है, कोई बात नहीं । हमारे साथ तो अल्लाह का करम है, तो हम फिर से कहीं ना कहीं ठिकाना बना ही लेंगे । हमारे साथ जो ये कर रहे हैं, उनके बाल-बच्चे ख़ुश नहीं रह सकते । हमारे बच्चे तो फिर भी किसी ना किसी तरह पलकर बड़े हो जाएंगे, पढ़ें या ना पढ़ें । यह तो सब मुकद्दर का खेल है । जो नसीब में लिखा होगा, वो कोई भी नहीं मिटा सकता । हवा कभी रुख नहीं बदल सकती । हमारा अपना रिक्शा जिदांबाद! जहाँ चलाएंगे, हमारा पेट भर जाएगा। किसी से भीख तो नही माँगेंगे"। [ विस्थापन ]
by Nangla Lab
@ 04.04.2006 23:00 CET
जहाँ पर नाम मात्र के कबाड़ी दिखा करते थे, वो जगह आज कबाड़ ख़रीदने वालों से भरी है । यहाँ आज वो भी कबाड़ी बन गए हैं जो पहले कपड़ो का व्यापार करते थे । आज सभी कबाड़ी बनकर आवाज़ें मारते हुए ऐसे घूम रहे हैं मानो गलियाँ उन्हें पहचानती न हों । वो आवाज़ लगाते हैं, "कबाड़ी-कबाड़ी" । लोग अपना सामान हल्का करने के लिए, और ये सोच कर कि उन का पीछे छोड़ा गया सामान बरबाद न हो जाए, उसे सस्ता ही इन लोगों को बेच रहे हैं । ये लोग लोहा 15 रुपये में ना लेकर 10में ख़रीद रहे हैं । आज उनकी आवाज़ में गरज नहीं । अपने मन को तसल्ली दे रहे हैं कि मलबा रखने से क्या फ़ायदा? जगह तो मिलेगी ही नहीं, किसके कमरे मे रखेंगे? ये जानते हुए सब "कबाड़ी" अपने-अपने कंधों पर जूट के बोरे और तराज़ू लेकर घूम रहे हैं । [ विस्थापन ]
by Nangla Lab
@ 04.04.2006 23:00 CET
मनीराम भाई की सजी-सजाई दुकान भी आज नंगी हो गई । तालों का लटकना, पन्नियों का चमकना, पान की महक, कीलों के ढेर, कन्टेनरों में भरी टॉफ़ियाँ, नमकीन मट्ठियाँ, सब पैक हो गए हैं । सभी ने उस दुकान से मुँह ही नहीं मोड़ा, मानो नाता ही तोड़ दिया है । अब कोई रिश्ता नहीं, कोई नाता नहीं, कोई गरज़ नहीं कि ये दुकान हमारी पहले कोई थी । पर अभी भी कुछ एसा सामान है, जो अधखुली दुकान पर बिक रहा है । चाय की पत्ती, पापे, गुटखे,पारले-जी के बिस्किट, मट्ठी । ये सब आज किसी पर्दे पर लगा कर प्रदर्शन पर नही हैं, बल्कि काउन्टर के उपर ही रखे हैं, और वहीं से बिक रहे हैं । गुटखे का तो दाम दो का तीन हो गया है । कुछ लोग हैं जो पहले की तरह जाते हैं, पर चीज़ें माँगने पर दाम सुन कर, अपना सा मुँह लेकर अपने घर वापस आ जाते हैं । [ विस्थापन ]
by Nangla Lab
@ 04.04.2006 23:00 CET
शाम ढल रही थी, चिंता बढ़ रही थी । एक 21 वर्षीय लड़की अपने सामान की हिफ़ाज़त के लिए काली पॉलिथिन के नीचे बैठकर इतंजार कर रही थी - उसके मम्मी पापा काले खाँ कामरा देखने के लिए गए हुए थे । पर जब वो वापस आए, तो टाटा 407 की लॉरी को लेकर आए और बोले, "बेटी काले खाँ में तो नहीं मिला, मगर सोनिया विहार में सात-आठ सौ का बढ़िया कमरा मिल गया है । जिसमें कमरा, लैटरीन, किचन, बाथरूम – सब कुछ है"। लड़की खड़ी होकर पानी के डिब्बे में पानी लाई और ड्राइवार, कंडक्टर और माता-पिता के साथ प्यास बुझाकर सामान को गाड़ी पर लोड करके, ख़ुद गाड़ी मे बैठकर आँसुओं को आँखों में लिए, हाथों से अपने बचपन और जवानी के बसेरे को अलविदा कहते हुए, मुँह मोड़कर चली गई ।
[ विस्थापन ]
by Nangla Lab
@ 03.04.2006 23:00 CET
एक शख़्स कहीं बाहर जाने के लिये तय्यार हो रहे हैं । गली में पड़ी ईंटों और मलबे के ढेर पर बैठे नहा रहे हैं। ईटों के ढेर के ऊपर किसी छत से निकली सिल्ली को रख कर वो अपनी रोज़ के नहाने की जगह से थोड़ा ऊपर था आज । आज तो उसके नहाने से बहता पानी गली में नहीं बह रहा, बस उसी मलबे में बिखर कर, उसकी तराई कर रहा है ।