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सुबह होने से पहले [02], जानू

सूरज अभी नहीं निकला है। बसेरे में धुएँ की धुँध नज़र आ रही है। पुश्ता पर कई लोगों के घरों पर चूल्हा जल रहा है। लोग अपने चूल्हों के पास बैठ कर चाय की चुस्कियाँ लगा रहे हैं। ये चूल्हे कमरों के अंदर नहीं बल्कि बाहर ही हैं - सड़क के साथ ही चूल्हा है, और यही रसोईघर है। जब लोग गुज़रते हैं तो इसे छूते नहीं, बस देखते हुए निकल जाते हैं।

एक महिला रोटी बना रही है। वो गुँधे आटे की थाली सड़क पर ही रख देती है और खाना बनाने लगती है। उस के पीछे दरवाज़ा है, जिस पर पर्दा नहीं है। जब रसोई ही सड़क पर है, तो पर्दा कैसा। सर्दी का मौसम है। उस ने एक कनस्तर में पानी भर के चूल्हे पर चढ़ा दिया है। हल्की आँच पर पानी गर्म हो रहा है। कनस्तर के बगल में एक छ:-सात साल का लड़का बैठ कर लकड़ियों को हिलाता जा रहा है जिस से आग की लपट और तेज़ हो रही है। वो बराबर पानी को छू कर देखता जा रहा है कि कितना गर्म है। फिर वो आवाज़ लगाता है, “मम्मी, पानी गर्म हो गया।" तो वो औरत अंदर से आ कर पानी को पलट कर ले जाती है, और कनस्तर को दोबारा पानी से भर देती है।

वहीं गली से लोग गुज़र रहे हैं। पर गलियाँ सिर्फ़ निकलने के लिये नहीं हैं, वहाँ कुछ लोग अपने पैरों से चादर को टाइट कर कर ओढ़ के सो रहे हैं। कुछ लोगों का तो सोने का समय ही सुबह में होता है। लोग उन से कटते हुए अपने रास्ते पर निकल जाते हैं।

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