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किसी घने जगंल मे धीरे-धीरे फैलती आग, Rakesh

दिल का ख़ौफ़ जैसे ही आँखों मे उतरता है तो हवा, जगह, चीज़ें, वक़्त, सब कुछ शून्य होता नज़र आता है। वो दहला देने वाला मंज़र जब आँखों के आगे आता, तो हाथ पैरों में चीटियाँ सी काटने लगतीं । अलग-अलग ख़्याल मन में घर कर जाते। अभी बस्ती में घरों को तोड़ने का काम चल रहा था। कि वहां पर फैले हुए दीवार के टुकड़े, जिनके बीच में छोड़े गये रहने वालों के जूते, चपल्ल, खिलौने, कैलेन्डर लगे हुए छूट गये थे। कुछ और घर टूटे, जिन की छाप अभी भी घूमते-फिरते लोगों के दिलो-दिमाग़ पर दस्तक दे रही थी। लेकिन उस दस्तक के जवाब में किसी के पास में कुछ नहीं बचा था। बस्ती में किसी के घर में मोढ़े पर ही बातचीत करते शख़्स घर टूटने वालों की सिसकियाँ सुन तो रहे थे, मगर दिलासा देने के अलावा और कुछ ना था। ये वक़्त उस मुकाम पर आ पहुँचा था जहाँ पर कुछ छोड़ना भी मुश्किल था और पाना भी मुश्किल।

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हम तो यहाँ से चले जाएगें, Rabiya

लोगों ने अपने अदंर भराव कर लिया यह सोचकर कि हमे वक्त मिल गया अपना बंदोबस्त करने के लिए। तभी लोगो मे तसल्ली नज़र आ रही है । मगर इन्होंने सोच लिया है कि इन्हें कोई यहाँ रहने नहीं देगा। हालात में झूझते झूझते यह अपने रोजमर्रा को दिखा रहे हैं । तभी तो दोबारा से चूल्हे जलने शुरू हो गए, ये सोचते हुए कि कुछ पल और साथ दे हमारा बसेरा ।
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अब कोई शक़ नहीं है, Neelofar

अब ज़्यादातर घर टूट चूके हैं । लोग ख़ुद भी अपने हाथों से अपने घरों को तोड़ रहे हैं और उसमें से वो चीज़े निकाल रहे है जो उनके काम मे आ सकती है । घरों की अदंरुनी सतह, जिसे हम अपने लिये सजाते हैं, वो अब नज़र आ रही है । जैसे कि एक दीवार पर पजांब केसरी के काफ़ी सारे पन्ने चिपके हुए हैं, जिसमें हीरो-हिरोइन कि बड़ी सुन्दर-सुन्दर फ़ोटोएं हैं । वो आते जाते की नज़र को कम से कम एक बार तो अपनी तरफ़ मे खीचं ही रही हैं।

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ऐसी आज़ादी नहीं चाहिये, Yashoda

मैं इस जगह से भाग रही थी क्योंकि इसमें हमारे कल की गहरी परछाई छुपी है । जिससे हम पीछा नहीं छुड़ा सकते, वो नज़रो के बदलते फ़्रेम में हमारा पीछा करती है।

मैंने देखा है लोगों को दायरों से उकसाते हुए, पर आज नांगला को आज़ादी नहीं चाहिए । इतना खुला मैदान नहीं चाहिए जहाँ धड़कते सामानों पर ताश की महफिल उजागर कर सकें । वो बहता हुआ अकेला नल नहीं चाहिए, जहाँ कल तक पानी के लिए बनी लम्बी लाइन में लोग रोज़ की थकान को मिटाते हुए चलते थे ।

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कोई घर कब बना था, तब पता चलता है जब उसे तोड़ा जाता है, Suraj

वो आंटी जब अपने सामानो को निकाल के घर खाली करने की तैयारी कर रहीं थीं तो वो बता रहीं थीं कि यह मेरे बेटे ने अपने जन्मदिन पर बनवाया था। यह दीवार मेरे पती और उनके भाई के अलग होने की निशानी है । यह छत मेरे बेटे के कमाने की वजह से पक्का हुआ था ।

आज हर घर अपने टूटने से पहले अपने बनने को दोहरा रहा है ।

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"सब कुछ कंट्रोल मे है", Love Anand

बस्ती के अन्दर जाने वाले रास्तों पर घुसते ही पुलिस वाले गली के मोड़ पर एक कोने मे खड़े होकर बात कर रहे हैँ। एक के हाथों मे एक रडियो की तरह दिखने वाला वॉकीटॉकी है, जिसमें झिलमिलाहट के साथ किसी के बोलने की आवाज़ आ रही है।

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वो हाथ रुकते नही थे, Shamsher

जगह मे रहता और जगह मे बनते रिश्तो मे समय का आलाप टिमटिमाता रहता है, इन्ही आलाप के सामने अपनी यादों किस्से-कहानियों को दोहराना और बनाने का सिलसिला लगातार चलता रहता है। जाने वाले चले जाते हैं और आने वाले एक नया जुड़ाव की कड़ी बनते हुए जुड़ते रहते हैं इन्ही मे उपज़ते हलचल और ठहराव भरी जिज्ञासाओं मे बंद चलना ही जिदंगी है । जो एक दूसरे के साथ जुड़कर आपस मे एसे ही सीखने और करने को मिलती हैं।  आपस के एसे ही रिश्तो और लेन-देन के मलसाने से बनता है एक जगह छोटा सा जहां,जहाँ पर आने वाले रहने वाले हर शख्स रूपकार होते है। जो शाम को, दोपहर को, सुबह को, मौसम को, लाइट जाने के बाद वाले माहौल को खुद समय की चमकदार माला को पिरोते हैं पर अब यह माला गाँठ बंद हो गई है। नाँगला की शायद यहाँ अब सालो से बनती माला बनाने का सीज़न खत्म होता सा है।

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"ये कब गया यहाँ से ?” Lakhmi

[I]

"सरकार जब किसी को फांसी देती हैं, तो उससे उसकी आखिरी इच्छा पूछती है। पर हमसे तो वो भी नहीं पूछा । 'कब-कब' करते करते हमें यहाँ से खदेड़ दिया। बताओ, पहले तो दीवारों पर नम्बर लिख गए, और बाद में उसपर ख़ुद ही पेन्ट कर के ढक दिया। हम क्या करें?”

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कहाँ जाएंगे, नहीं मालूम, Suraj

आज हर कोई अपनी धुन मे रमा हुआ है । कोई व्यस्त है, तो कोई सामानों की रखवाली कर रहा है । हर तरफ़ सामानों का निबटारा और तोड़ना चल रहा है। और जो टूट चुका है, उनमें चुनाई चल रही है । बच्चे कील कच्चड़ और कबाड़ चुनकर उनके बदले आइसक्रीम ले रहे हैं । पुलिस और सर्वे वाले इधर-उधर घूमते नज़र आ रहें हैं । कोई जाने की सोच रहा है, तो कोई यहाँ जमावड़ा बनाने की ताक में है - जैसे आइसक्रीम वाला, चने वाले, फल वाले, कबाड़ी और और भी । यहाँ कोई आस के साथ राह ताक रहा है तो कोई चाहत लिए अभी तक अपने घरों मे बैठे हैं । हर कोई किसी ना किसी चाहत को अपनी आँखों मे समाए नज़र आ रहें हैं।

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किसी जगह को बसेरा बनने में, Suraj

किसी जगह को बसेरा बनने में सालों लग जाते हैं, मगर बसेरे को दो दिन में वीरान बना दिया जाता है । धम-धम! हर तरफ़ कुछ तोड़ा, गिराया जा रहा है । कुछ शख्स घरों को टूटता हुआ देख रहें हैं । घरों के टूटने से उसमें निकली धूल उन शख्सों पर जब आती है तो वो उससे मुँह नहीं फेरते । लग रहा है वो उसे अपने अदंर समाने की कोशिश कर रहे हैं । वो उनके लिए धूल नही है, वो उनकी यादें हैं जो उन्होने उनकी छतों और दीवारों पर लगाई थीं, जो धूल बनकर पूरे वातावरण मे फैल रही है ।
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