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madhur aur madhuri

 मेरे शहर से गाँव की दूरी बहुत ज्यादा थी। रोजाना शहर से गाँव आना जैसे मेरे ज़िंदगी मे शामिल हो गया था। आते-आते सूरज की किरणे लाल होने के साथ-साथ गर्म हो जाती। वापस जाते-जाते गर्मी से ठंडी की तरफ चली जाती। यह प्रक्रिया भी मेरी ज़िंदगी में शामिल थी। रोजाना इस रिदम को जीना मेरे बस में नही था। अगर यह कहूँ कि शहर में घुटन सी लगती हैं, लेकिन गाँव की शीतल आवो हवा किसको नही भाती? सालो बाद उस दूरी को भुला दिया, जो मेरी रोजाना की ज़िंदगी में शामिल थी। शहर के किराए वाले कमरे को छोड़ कर गाँव में किराए का एक कमरा लिया जिसमे मेरा अकेला वक्त कटने लगा।

अब साथी भी मेरे इस निर्णय से काफी खुश थे। उनके कई सवाल अपने से हो गए थे। भारत की राजधानी, के गाँव मे जीने लगा था। इस गाँव से मेरे काम की जगह मात्र 2 किलोमीटर के फासले में। अपने बारे में लिखना कितना आसान सा लगता हैं, लेकिन किसी दूसरे के जीवन को खखोना कितना काल्पनिक या झूठा सा लगता हैं। कभी-कभी तो सच का सामना करना ही पड़ता हैं। उसी घर में मधुर और माधुरी का आगमन हुआ। वह भी हम लोगो की तरह जीने और खाने लगे। दोनों भाई बहन की तरह  रहते थे।

छत में घूमना जीने में बैठ कर हम सब लोगो को दया भरी नजरों से देखते रहते । उनको देख कर हम लोगो को लगता की अभी कुछ कहेंगे लेकिन वो मधुर और माधुरी दोनों इसारे से बात करते हुए अपने बरामदे की तरफ चले जाते। उनके इस तरह के व्यवहार को देख कर दोस्त कहने लगे कि इन दोनों को हमसे कोई मतलब नही। कभी भी उन दोनों ने किसी से कुछ नही कहा था। लेकिन हम लोगो ने भी  उनको अपने जीवन में उतार सा लिया था, कि हम लोग किसी के जीवन में क्यो दखलअंदाजी करे सभी लोग किराए दार थे। जिसका जिससे मन करता उसी से मतलब रखते।

वह दोनों मांसाहारी प्रवत्ति के थे। अगर कोई उनसे कहता मीट खाओगे तो वह बिना कुछ बोले हाँ में गर्दन हिलाकर इंतजार करते कि कमरे से कब आवाज आए। आवाज आते ही एक ही थाली में दोनों मिलकर खाते और सो जाते। दोनों मे प्यार बहुत ही घनिष्ठ था। कभी- कभी सुबह दोनों मॉर्निंग वॉक के लिए निकल जाते। जब तक सब लोग जागने वाले होते तब तक वो दोनों अपने बिस्तर में मिलते। अगर ज्यादा कोई प्यार जता देते तो साथ चलने से मना न करते पार्क, सड़क मे बराबर का साथ देते धूमते वक्त तो कितना भी बोलवा लों उस वक्त तो न जाने कहा की जान उनमे जाग जाती थी।

एक दिन हमारे घेर (जिसमे कई सारे घर हों) में बारात आने वाली थी। माधुरी की आंखो का काजल देखते बन रहा था। शरीर अच्छा खासा था, किसी से दब कर नही रहती थी। मधुर के बिना एक पग भी नही चल सकती थी। मधुर एक पैर से हल्का लंगड़ाता जरूर था पर, जान बहुत थी। मधुर माधुरी की हर अदा-कदा को समझता था। बारात वाले दिन तो वह, सब दिन से ज्यादा खुश दिख रहे थे। जो भी मेहमान आता सबको अपना समझ रहे थे। आगे-आगे होकर उनको सब कुछ समझा देते। अगर मेहमानों के बच्चे शैतानी करते तो उनको भी वो समझा देते, बच्चे इतना डर जाते कि दूबारा से वो कुछ न कह दे।

लड़की सुबह बिदा हो गई पहले जैसा ही सबकुछ छूट गया । अब दोनों की चर्चा पूरे पड़ोस मे होने लगी थी । कि देखो दोनों एक साथ रह रहे हैं। दो साल होने वाले हैं इनके अभी तक कोई आस-औलाद नही हैं लगता हैं बाँझ हैं माधुरी। माधुरी की बाते कही न कही सुनने को मिल ही जाती । उसकी सेहत और खान-पान का चर्चा आम हो गया था। माधुरी तो अब हर एक की नज़रों मे करकने लगी थी। 

अब तो शक की नजर से दोनों को देखने लगे थे।  लेकिन मधुर के प्यार में कोई कमी नही थी, वह अंदर ही अंदर काफी घुल चुका था। माधुरी भी उसको शक की नज़रों से देखना बंद कर दिया, दोनों बात-बात में नाराज हो जाते। माधुरी जब उससे नाराज होती तो दुमहले की छत पर बैठ जाती और मधुर अपने लंगड़ाते पैर के साथ बाहर के दरवाजे में खड़ा होकर कोसता रहता अपनी कमजोरी को।

सुबह शाम बिना उससे कुछ कहे, कहीं से कहीं को निकल जाता। माधुरी भी बाँझ पन के शब्दो को सुन-सुन कर चुप रहना सीख लिया था। उसकी आँखों में आज भी उतनी ही चमक थी जितना पहले थी। मधुर के बारे मे मोहल्ले के सारे दोस्त भी उसको ताने मारते रहते कि यह कुछ नही कर सकता। तरह-तरह के तानो को सुनकर भी शांत रहता। अगर माधुरी से कुछ कहना भी चाहता तो वो उससे मुँह मोड़कर दूसरी सहेली के पास पहुँच जाती। काफी अनमन हो चली थी दोनो मे, फिर इस तरह के जीवन को जीना और भी कठिन हो जाता हैं। एक तो खुद की कमी हो और साथ घर परिवार के ताने मिले तो फिर जीना कैसा लगता हैं?

हर प्रयास के बाद माधुरी भी मधुर को हर आजादी की इजाज़त दे दिया था। माधुरी भी बिना किसी निराशा के जीवन को जीने लगी। आते जाते देखते सुनते मधुर अंगूरी से प्यार कर बैठा इस प्यार से माधुरी को कोई गिला-शिकवा नही था । वो तो अपनी हर कमी को जानती थी। अंगूरी तो लंगड़े मधुर पर सबकुछ न्योछावर करना चाहती हो। पर मधुर अपने मान मर्यादा मे रह कर समझाना चाहता था लेकिन किसी ने सच ही कहा हैं कि दिल लगा गधी से तो परी क्या चीज हैं? वही हाल अंगूरी का था। जो चरित्र से बेजान थी।

वह आते-जाते मधुर को उकसाती रहती लेकिन मधुर हमेशा उसे समझाने की कोशिश करता कि देख तेरे लाखों दीवाने हैं। अगर हम दोनों के बारे मे पता चल गया तो समझ ले तेरा कुछ नही बिगड़ेगा मेरा तो जीना हराम कर देगे। अंगूरी को उसकी सारी बाते बेमाइने जैसी लग रही थी। अब तक सारी ठंडी इसी तरह से कट गई थी। होली मे थोड़ा रंग के बहाने से लिपटा-चिपटी हुई थी। जिसमें मधुर का दिल अंगूरी पर आ ही गया था। मार्च का महिना तो कस-म-कस में ही कट गए। इस वक्त माधुरी के घने बाल और सुर्ख काली आंखो को देख कर तरस तो आता, लेकिन करते भी क्या मोहल्ले वाले? सब के मन-मन में हलचल सी होने लगी थी। औरतों में तो चुकचुक मच गई थी। पर इस तरह की बातों को खुल कर विरोध करने वाला कोई नही था।

अप्रैल फूल वाले दिन तो झूठ तो झूठ था ही, लेकिन सच भी झूठा लग रहा था। सामने से दरवाजे का एक हिस्सा खुला था । दूसरा पल्ला बंद था। सुबह होने से पहले अंगूरी जाने वाली थी लेकिन आज मधुर उसको जाने नही देना चाहता था। लेकिन अंगूरी तो उसको सता कर जाने वाली थी। मधुर ने उसकी कमर को मजबूती के साथ पकड़ कर उसके साथ। बड़े प्यार के साथ जिस्म-मानी रिस्ता बना डाला। अब अंगूरी हर तरह से बे बस थी। करती भी क्या मधुर की इस हरकत से अपनी सारी हरकतों को भूल चुकी थी।

मधुर की यह हरकत सारे पड़ोसियों को पता चल गई थी। पड़ोसियों ने अपने सारे दोस्तो को बताया था कि आज सुबह मधुर को अंगूरी के साथ पकड़ लिया गया हैं। इसकी वजह से अंगूरी दिनभर नही आई मधुर बिलकुल चुप दरवाजे के पास बैठा रहा माधुरी ने कुछ नही कहा, अगर नजर मिल भी जाती तो गर्दन झुका कर निकल जाती । सारा दिन वो मधुर के सामने सोती रही। सायद इस वजह से वह अपने पड़ोस के लोगो से नज़र नही मिला पा रही थी कि उसके मधुर ने ऐसा कारनामा किया था।

दिनभर मधुर इसी उधेड़ बुन में जीता रहा बाहर तो निकला ही नही जहां अंगूरी दिन मे दो तीन बार मधुर से मिलने आती थी। लेकिन आज एक बार भी मिलने नही आई। दिन भर माधुरी को ताने मिलते रहे कि जब इसमे जिस्मानी ताकत नही रही तो मधुर करता भी क्या? ठीक किया हैं। पर अंगूरी तो चरित्र हीन थी ही लेकिन फिर भी उसके साथी मार पीट पर उतर आते थे। यह बात पड़ोसियों को पता नही थी पर अंगूरी के कारनामे को सारा गाँव जनता था।

रोज़ाना की तरह शाम रजनी की तरफ खिचने लगी सबके दरवाजे बंद। उनके भी दरवाजे बंद हो गए थे। आधी रात कट चुकी थी। पूरा का पूरा मोहल्ला नींद की आगोश मे था। अंगूरी अपने मवाली दोस्तो के साथ मधुर को घर से बाहर निकलने के कह रही थी। जब मधुर ने उनकी बात नही मानी तो उसके साथी दरवाजे के सामने आ गए और तेज–तेज की आवाज मारने लगे उनकी आपसी बहस को सुनकर पड़ोस के दोस्त जग गए और बाहर का माहोल देखा तो अंगूरी को देखते ही वह सब समझ गए।

दिन का सारा वाकया याद आ गया, तो अच्छा यह अंगूरी के मवाली दोस्त है। दोस्तो ने दरवाजे से मधुर को बाहर की तरफ करते हुए कहा कि भाई आप लोग इस मामले को बाहर सुलझाओ हम लोगो की नीद खराब न करो। बच्चे जग जाएंगे । यह बात मवाली दोस्त सिर्फ मधुर को बाहर निकालने के लिए बोले सो दोस्तो ने उसको निकाल दिया। अब क्या? मधुर के गाल पर पंजो के निशान बनने लगे उसके गले और पीठ पर मवालियों की मार से खून छलक आया था। शोर अंदर नही बाहर ही रह गया कितना मारा यह किसी को नही पता इधर माधुरी छत के ऊपर से एक आध गली देकर नीचे आ गईं। उसने भी बाहर निकलना उचित नही समझा।

माधुरी को बहुत अच्छे तरह से यह बात मालूम थी कि अगर वो बाहर निकली तो वो उसे भी नही छोड़ेंगे। सो छत से जितना हो सका कह कर वापस जीने में बैठ गईं। मधुर को अब तक बहुत पीट चुके थे। सारे के सारे अंगूरी को आगे करके तीनों मवाली चले गए । मधुर इतना पीटा था कि अब उसे किसी से कुछ कहने की चाहत नही थी। माधुरी थोड़ा सा हसते हुए रेडी की तरफ चली गई । मधुर की आंखो में बहुत गुस्सा था लेकिन उसका गुस्सा उसके लिए ही था। इसमे माधुरी का क्या दोष?

अब तो सायद इस घर की तरफ किसी को देखने का मन न करता माधुरी बे मन रहती और मधुर तो मर खाने की वजह से अब वह और लंगड़ाने लगा था। करीब दो तीन दिन लगातार मोहल्ले मे अंगूरी किसी न किसी मवाली के साथ आती और मधुर को पीटवा कर चली जाती इस तरह के माहोल को देख कर सभी लोग उनसे नफ़रत करने लगे यहा तक माधुरी या मधुर को जो भी पाता दो चार डंडे जमा देता अब वह सारे मोहल्ले की मार खाना अपनी आदत मे ऊतर सा लिया था।

अब तो पड़ोसी बात-बात पर  माधुरी को भला बुरा कहने लगते हैं। मधुर तो पहले से ही अपने सर को झुका कर रहने लगा हैं। उस दिन से यह पड़ोस छोडने का फैसला ले रहे हैं। जिसके साथ वो दोनों आए थे वो भी अपना कमरा खाली करके सड़क के उस पर रहने लगे हैं। वो दोनों भी उन्ही की तरफ ज्यादा रहने लगे हैं।   

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बस्ती शहर जाती हैं।
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108 लीटर दूध

अँधेरा छट रहा था लेकिन सड़क के किनारे खड़े खंभो में मर्करी हल्की रोशनी के साथ कमजोर पढ़ रही थी। काली सड़क मे साधन कम, योगा व दौड़ने वालों की कतार कुछ-कुछ दूर में दिख जाती। बस्ती  कालोनी में इस वक्त आर.एस.एस की साखाए दिखती जिसमे तीन कोने का लाल कलर का झण्डा सबके सामने लहरता। उम्र का बंधन नही हर उम्र के साथी जो खेल के साथ मे प्रार्थना करते हुए दिखे। उनमे मेल मिलाप का सिलसिला चल रहा था। नाली, सड़कों के किनारे लोटा, डिब्बा लिए बैठे किसी का इंतजार बहुत तसल्ली के साथ कर रहे थे।यह सुबह की बहुत गहरी पहचान मानी जाती हैं। जिसको किसी न किसी कहावत मे कह जाते हैं। बहुत सारी घटनाए इस वक्त की सुनने में आती हैं। जिसका जिक्र न्यूज मे पढ़ने को मिल जाती हैं।

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बस्ती शहर जाती हैं।

रिक्शे का चक्का अपनी धुरी पर नाचता। जितनी बार मकैनिक रिंच से बोल्ट को कस कर पहिये पर हाथ मारता चक्का घूम जाता। चक्का को घूमता देख कर ऐसा लगता मानो पूरी बस्ती झिलमिलाती हुई अपनी  स्थिर जगह पर परिक्रमा कर रही हो। पास खड़े रिक्शे पर बनी चौड़ी शीट पर पूरा पीठ टीका लेने के बाद बाकी का आधा शरीर हवा में झूल रहा था। सर गर्दन के साथ सीने पर सिमट आया था। गले मे पड़ा गमछा रिक्शे के नीचे वाली बाड़ी को छु रहा था।

जरा इधर देखना यह एक लड़की की आवाज़ थी। स्कूल की दीवार पर बने छेद से थी। उस छेद तक पहुँचने के लिए कई बार इधर-उधर नजरों को दौड़ना पड़ा, लेकिन समझ मे न आने की वजह से वह  चौक की तरफ खिच गए। स्कूल की दीवार मे बने छेद से आती आवाज को छोला भटूरा वाला अपना हाथ और आँख उसी मोकवे के तरफ कर गड़ा कर पूछते बेटा क्या चाहिए? मोकवे के अंदर हाथ जाता पैसा बाहर आता समान अन्दर चला जाता इस तरह की आवाज़ कुछ-कुछ पल मे आती जाती रहती। आने जाने वाले चकित पर छोला भटूरा वाला नही।

फुहारे से नहाती ईटे जिसका पानी रिस-रिस कर धूरियाई मिट्टी को नमी की तरफ ले जाती। उस पानी की छिटकन को जीभ निकाल कर एक सात आठ साल का लड़का मजे ले रहा था। फटे सलेन्सर की धू-धड़ाम की आवाज़ बीच-बीच में कानो को खटक जाती। शल्लू भाई मकेनिक होने की वजह से वो अपने अनुभव से बाईक को चेक कर रहे थे कि किस कमी को बाईक जी रही हैं। सरकारी डिस्पेन्सरी के डाक्टर एक मरीज की कलाई को थम कर नब्ज़ का पता लगा रहे थे कि कितनी बार धडक रही हैं। बगल वाले कमरे मे दावा लेने वालों की लाईन लगी पड़ी हैं।

चाय की चुस्की मारते डी.टी.सी बस ड्राईवर व परिचालक दोनों लकड़ी की बनी पतली सी बेंच पर बैठ कर अपनी डिऊटी की शुरुवात कुछ इस तरह करते हैं।गोपाल पराठा चौक की रौनक को बरकरार रखा हैं। कई महीनो से उनके बेटे बहू इस कम को सभाल रहे हैं यही मान लो की उनका पूरा परिवार इसी कम में ब्यस्त हैं। बगल मे साईकिल की दुकान से कभी हवा का प्रेशर सुनाई पढ़ता तो कही बाइकों की भर्र-भुर्र, चाय की दुकान में केतली की उठा पटक के साथ गिलास की खनक बनी रहती।

दो स्कूलो के में बीच मे नांगलोई और कंझवाला डिपो से बसे आ जाती जो दोनों स्कूलो की पढ़ाई का आनन्द लेती। चाय की दुकान में बस्ती से आई नई नवेली सवारी आकार पूछती बस कहा जाएगी चाय वाले उधर की तरफ इसरा करते जिधर एक लकड़ी का खोका। जिसके अंदर एक ब्यक्ति अपनी रोजाना वाली वर्दी को पहन कर उसी खोके मे, बस की सीटो का सोफा जिसमे बिराजमान होकर हर आने जाने वाली बस के अलावा बस मे आने वाले ड्राइवर व परिचालक का नम्बर लिख लेते ताकी पता चल जाए की बस बस्ती को शहर ले जाने के लिए आई थी।

दोपहरी पलट चुकी थी। स्कूल शान्त महोल को जीने लगे। छात्र छात्राओं की आवाज़े गायब थी, चौराहा सूनेपन के लिए मोहताज़ नही, वो तो हर पल को, एक नए अंदाज के साथ जीता।आने जाने वाले कितना भी आगबबूला हो फिर भी जाएंगे कहा से, वही से तो चौराहा अकेला कैसे रह सकता हैं? गर्मी की तपन में भी बस्ती शहर जाने के लिए तैयार रहती बस इन्तजार होता तो बस के आने का।बस आ गईं जो आज पहले दिन ही चौक की साथी बनी एसी बस जिसका रंग लाल काले शीशा पीछे के सलेंशर से बूंद-बूंद पानी रिस्ता न जाने क्यो?

आज पहली बार ऐसा नज़ारा आंखो के सामने से गुजर रहा था कि उस बस ने बस्ती का सारा का सारा अक्स छीन लिया हो। स्कूल तो पूरा का पूरा उस पर सवार हो चुका था। इसके साथ ए ब्लॉक व बी ब्लॉक भी अपना पूरा का पूरा अक्स ले कर स्कूल को चीर कर शामिल हो गया था। बस के दरवाजे बंद हो जाने के बाद भी यह सब उसके अंदर कैसे पहुँचे? यह सवाल कुछ पल के लिए बना पर ये सवाल था ही नही बस ओस की बूंद की तरह खिलकर बिखरने वाला सोच था।

बस के अगले हिस्से वाला दरवाज़ खुला, जिसने खोला वो सब वही थे जो गोपाल जी की बगल वाली दुकान पर चाय की चुस्की ले रहे थे। बाद मे प्रेसर से पीछला गेट भी खुला। परिचालक अपने काले से बैग के साथ चढ़ते हुए आवाज दिया आ जवों रे आनन्द विहार वाले। सवारी दौड़ती हुई चढ़ गईं बस कुछ खाली तो कुछ भरी उसका घर्रा कर चलना, उसके साथ बस्ती को जाते हुए पहली बार देखा था। वह जिसके सामने से गुजरती उन सबको शहर की तरफ ले जा रही थी शायद इसी तरह रोजाना ले जाएगी।

इस दृश्य को देख कर ख्याल बना कि आज से पाँच साल पहले खेत से उड़ती धूल, हसती हुई हरी घास, ककरीली कच्ची सड़क। बिजली पानी से अछूती जगह, दुकानों के अभाव को जीती हुई जगह बस्ती बनी, बस्ती बनने के बाद अब इसका अक्स बिलकुल शहर की तरह, अपनी रूप सज्जा को बनती जा रही हैं। इस तरह के मनोभाव को समझने लगा तो पता चला कि बस्ती बस से शहर जा रही हैं या बस्ती शहर की तरह बनती जा रही हैं।

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jeewan ka mahatw

जवानी का महत्व नही  
करवट बदलती रात पसीने से भींगा बदन सिलवटों में बदलता बिस्तर, सपनों की वादियों में घूमती नींद भोर की ठण्डी- ठण्डी हवां के साथ शरीर पर ताजगी का पल बन रहा था।
अभी नींद में कुलबुलाती देही स्थिर हो गई क्या टाईम हुआ? टाईम, टाईम तो सुबह वाला हो गया है। करवट बदलते हुए अपने तहमत से मुंह ढक लिया। पंखे को बन्द किया रोज़
की तरह एक धण्टे में सारा खाना बना पका कर रख दिया।

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हसीना जी, बबली

अभी हाल-फिलाल में एक औरत से मुलाक़ात हुई जिनका नाम हसीना है। उनकी उम्र 60 या 65 साल तक की होगी। रंग-साँवला, चेहरा छोटा और भरा हुआ, बाल उम्र के तकाज़े से झड़े हुऐ पर मेहंदी लगाने की वजह से लाल बाल और लाल बालो में सफेदीपन की चमक भी। लाडली फार्म के चक्कर में हमसे मुलाकात हुई।
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कब बड़ी हो गई, Jaanu

रोज का देखना, सोचना एक दिन सवाल बन कर आया। गाँव और शहर में कोई ज़्यादा फासला नही था। गाँव जो दिल्ली के ही हैं। शहर से आये विस्थापित लोग जिन्हें सावदा घेवरा जे.जे. कॉलोनी का नाम मिला। उसमें हर तरह के लोगों को अपना अशियाना मिला। जिसमें हर तरह की भाषा, हर तरह के पर्व और हर तरह का पहनावा देखने को मिलता है। जो अपनी ठोस गाढ़ी छवि को लिए हुए है।
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चुनाव, जानू.नागर

आज का दिन चुनाव का आखरी दिन था। 28/11/2008 की तारीख ही बची थी। ये तारीख बस्ती में एक उत्तेजना भरने से कम नहीं थी। पूरे दिन मस्ती का माहौल था। कोई किसी से कम नहीं सभी अपनी धारणाओं को तराशते काटते-छाटते फिरते गलियों में। सभी उम्मीदवार अपना नाम, अपना चुनाव निशान, अपने-अपने उम्मीदवार के जरिये सभी के घर-घर जा कर उनको यही बताते कि सिर्फ इनको वोट देना है और किसी को नहीं देना है। यहाँ तक की भाजपा वालों ने अपने चुनावी निशान वाले लिफ़ाफ़े पर गारजियन के नाम के साथ पूरे परिवार की पर्ची दी जिन्हें वोट डालना था।
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इलेक्शन, शमशेर

आज हवा में धूल नहीं है। इसका कारण देर रात हुई बारिश है। रोज़ आसमान में चमकता सूरज आज ला-पता है। बादलों के घेरों ने आज घेवरा के लोगों की परछाई उनसे जुदा करदी है।
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उर्मिला जी, Babli

पिछले वक्त की धुंधली सी तस्वीर हर किसी के दिमाग में काफी समय तक बिल्कुल ही तरोताज़ा रहती है। ये ताज़गी तब तक जुबान पर आती है, जब तक की नई यादों से बनती ख्वाहिशें पूरी ना हो जाऐ । उर्मिला जी से बात करते हुऐ ये बात लगी ।
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इंतज़ार, शमशेर

लोगों का अपना दिनचर्या है और उसी दिनचर्या से जीवनयापन के अपने बने-बनाये साँचे को मजबूती से बाँधा हुआ है। उसमें दिनचर्या खुल जाने नाम की कोई चीज़ नहीं है। लेकिन यह कोई पाबंदी नहीं है और ना ही आज़ादी की लाड़ाई है।
इन्हीं में से कुछ हर रोज़ ढलती दोपहरी में सावदा के चौक पर अपना क़ाफ़िला तैनात करते हैं। तीन से साढ़े-तीन के बीच आने वाली बसों के लिए।
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