पेड़ के नीचे सड़क के किनारे किसी की राह देख रहे महिला पुरुष सभी की आँखे एक तरफ ही निहारे जा रही थी । सड़क से अनगिनत गाड़ियाँ नज़रो के सामने से यूं ही निकल जाती । सड़क के दो छोर एक छोर आने वालो का दूसरा जाने वालो का । पर जिस छोर पर लोग खड़े थे व कहीं ना कहीं जाने के लिए ही था । माना कि दोनो छोर पर लोग खड़े थे, एक कॉल सेंटर वाली टाटा सूमि निकली जिसमे कुछ नौजवान लड़कियाँ अपने आपसी दोस्तो के साथ हंसी के ठहाको के साथ हंसी के ठहाके मारकर एक दूसरे के सामने अपनी भौंहो से नैन-मटक्का कर रही थी । टाटा सूमो एकदम सरकती हुई खड़ी हो गई ।
चलती चक्की
बसन्त की हल्की धूप मे खिलती दोपहर एक सूने पन को जीने मे लगी थी। सभी लोग अपने मन मुताबिक की छाह को ढूढ कर बैठे हुए थे कोई-कोई तो हाफ बाजू की स्वेटर को पहन कर राशन को लेने लिए एक छोटी सी लाइन बना कर जमा राशन कार्डो के पास अपने अपने नाम को सुनकर जाते और अपना पैसा देते जितना राशन मिलना होता अपना राशन लेकर अपने घर की तरफ चले जाते। चेहरे पर लालिमा की दमक हाथ पैर कुछ रूखे-रूखे अब लाइन का जुमकना चलू हो गया लाइन ज्यादा बड़ी नही हल्की-हल्की धूप से बचने के लिए दिवारो से बनी छाया मे बैठे थे।सड़क के दूसरी तरफ से आती आवाजे किसी बुदबुदाने से कम ना थी।जिसको समझना कान को रोकना भी गलत साबित कर देती की आवाज किस चीज की है।स्कूल के बगल से निकलती काली लम्बी सड़क जिसका एक कोना दिखता है और दूसरा कोना भी दिखता है मानो अभी सड़क का सफर निश्चित है पर आने वाले मे इस कोने को किस जगह से देख सकते है।
एकांत जगह मे
दोनो को भटकता देख दो नज़रे उनका पीछा कर रही थी । जब दोनो की नज़रे पीछे को मुड़ती तो पीछा कर रही नज़रे ओट मे जाकर छिप जाती । इस तरह से नज़रो के छुपन छुपाई का खेल चल रहा था छुपन छुपाई वाली नज़रे इतना करीब आ गयी ।लड़के ने छुपती नजर को आवाज दिया" और क्या हाल है?”
16 जनवरी एक अखाड़ा:-
मोहरम् से पहले की तैयारी किसी युद्ध से कम नही होती । ये युद्ध सामने वाले नही । बल्कि इस युद्ध मे दोनो तरफ से लड़ने वाला एक ही शख्स होता है ।
घेवड़ा की जमीन पर आज पहला दंगल था । कुछ मालूम नही था की घेवड़ा की अवाम उसे सहन भी कर पाएगी या नही? पर तैयारी से तो लग रहा था की सब तैयार है। उसके हर पैंतरे को देखने के लिये और बर्दाश्त भी करने के लिये भी ।
कई लठेत, तलवार बाज़, टीन की पतली और लचकीली तलवारे, चाकूबाज़ । सभी अपने-अपने पैर-पैंतरो मे माहिर थे । जो एक तरफ लगे टैन्ट के नीचे कुर्सियों पर विराज़मान थे । एक आदमी हाथ मे माइक पकड़ सभी देखने वाली घेवड़ा की अवाम को बता रहा था की आगे क्या होने वाला है और अब क्या होने वाला है? कौन सा शातिर आदमी आपके आगे अपना ज़ोहर पेश करने वाला है । बस लोग तैयार रहते उस कलाकार को देखने और उसका ज़ोहर देखने के लिये ।
गलियों की गूँज
गलियाँ गूँज उठी किसी पर्व की तैय्यारी के लिए ये गूँज पूरे घेवरा के लिए थी छ: लड़के दाण्डिया की तरह गोला मार कर आवाज को और ही बुलंद कर रही थी जैसे गाँव मव दिवारी खेला जाता है। जिसमे सायरी भी करते है ।लाठियोंच को इस तरह आपस मे लड़ाते मानो एक दूशरे के दुशमन है ।पर एक दूसरे के शरीर को बचाते हुए सावंदा घेवरा के हर ब्लाँक हर गलियों मे जा धमकते पतली हल्की खुली गलियाँ गलियों मे गुजंती आवाजे तडा तड़ कड़क धिन्ना-कड़क धिन्ना धिन,चिनक चिनक छपाक-छपाक की ध्वनियों के साथ उछलते नवजवान आपस मे बहुत ही सुन्दर खेल खेला ।
हवां का झोका (घेवरा)
किसी ने अपने ऊपर पड़े साल को सभालते हुए कानो को छुपाते हुए कहा,''घेवरा की हवां घेर-घेर कर मारती है''। ये बोल उस जगह मे बोली जाने वाली आम भाषा बन गयी है।सभी कुछ ना कुछ कहने लगे।
घेवरा की ठण्डी हवा तन को कपाती है,
घेवरा की ठण्डी हवा मन को डराती है।
ठण्डी हवा के रास्ते बहुतेरे,
कभी इधर से आये कभी उधर से आये।
दूसरी रात
नीले आसमान में बिखरी स्वेत मोती अपनी स्वेत रोशनी को जमी मे गिरा रहे थे,चाँद किसी कारण वस आधा था,उस आधे शरीर पर स्वेत रोशनी का भाव था ।यह एक शहर का खाली कोना जिसमे लोगो के बसने का जोश कायम है। यह निवास स्थान अधिकत्तर चटाईयों के घरों से कुछ तो चमकीले पत्थरो की टाइलो से बने है। जिसमे आसमानी सफेद रोशनी अपनी चमक को जमाया हुआ था। बनी काली सड़के रोशनी में और काली दिख रही थी मिट्टी धूल से बनी गलियाँ नंगे पैरो को ठण्डक सा दे रही थ।
घेवरा की पहली रात
दिन यों ही भागदौड़ में गुजरा कि ये लाओ वो लाओ किसी से बात करने का फुरसत नही सामानो को एकत्रित करते -करते सांझ ने अपना कदम बढा ही दिया बढते सांझ को देख सूर्य सांझ के पीछे होकर अपने आपको गहराई मे छुपा लिया गलियो मे लगे खम्भो मे लटकती बल्ब की लरियो ने सफेद रोशनी फैला दिया । माहौल कुछ बिखरा-बिखरा चटाईयो के बने मकानो से झाँकती रोशनी अंधेरे की तरफ ,कच्ची गलियां खाली ज़मीन जिसमे उगी हरी घास भी अंधेरे से भरी पड़ी ।
किराया 20 रुपये....
जगह: सावदा घेवरा
तारीख:- 29/09/2007
दिन:- शनिवार
समय:- शाम 4:20
तमाम जगह घिर चूकी थी। अभी शाम के चार बज के पच्चीस मीनट ही हुये थे और बाजार को लगे केवल पच्चीस मीनट। बाजार सब्जियों और खिलौनो की दूकानो से भर चूका था। यहां पर सबसे ज्यादा बिकने वाली चीज़ सब्जी ही थी।
ऐलान...
भारत सरकार की तरफ़ से...
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शाम होने वाली थी सूरज अपनी लालिमा को अम्बर तले छुपा रहा था सड़क के किनारे सरकारी बसे अपने माथे पर जाने वाली जगाहों का बोर्ड लगाये खड़ी थी यात्री आ कर अपने गनतब्य स्थानो को देखर तसल्ली से सांस को थामते हुए सीट पर बैठ जाते आवाज लगाते अगले आने वाले यात्री को अवगत करा ही देते की बस यहां जा रही है।