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हसीना जी, बबली

अभी हाल-फिलाल में एक औरत से मुलाक़ात हुई जिनका नाम हसीना है। उनकी उम्र 60 या 65 साल तक की होगी। रंग-साँवला, चेहरा छोटा और भरा हुआ, बाल उम्र के तकाज़े से झड़े हुऐ पर मेहंदी लगाने की वजह से लाल बाल और लाल बालो में सफेदीपन की चमक भी। लाडली फार्म के चक्कर में हमसे मुलाकात हुई।
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कब बड़ी हो गई, Jaanu

रोज का देखना, सोचना एक दिन सवाल बन कर आया। गाँव और शहर में कोई ज़्यादा फासला नही था। गाँव जो दिल्ली के ही हैं। शहर से आये विस्थापित लोग जिन्हें सावदा घेवरा जे.जे. कॉलोनी का नाम मिला। उसमें हर तरह के लोगों को अपना अशियाना मिला। जिसमें हर तरह की भाषा, हर तरह के पर्व और हर तरह का पहनावा देखने को मिलता है। जो अपनी ठोस गाढ़ी छवि को लिए हुए है।
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चुनाव, जानू.नागर

आज का दिन चुनाव का आखरी दिन था। 28/11/2008 की तारीख ही बची थी। ये तारीख बस्ती में एक उत्तेजना भरने से कम नहीं थी। पूरे दिन मस्ती का माहौल था। कोई किसी से कम नहीं सभी अपनी धारणाओं को तराशते काटते-छाटते फिरते गलियों में। सभी उम्मीदवार अपना नाम, अपना चुनाव निशान, अपने-अपने उम्मीदवार के जरिये सभी के घर-घर जा कर उनको यही बताते कि सिर्फ इनको वोट देना है और किसी को नहीं देना है। यहाँ तक की भाजपा वालों ने अपने चुनावी निशान वाले लिफ़ाफ़े पर गारजियन के नाम के साथ पूरे परिवार की पर्ची दी जिन्हें वोट डालना था।
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इलेक्शन, शमशेर

आज हवा में धूल नहीं है। इसका कारण देर रात हुई बारिश है। रोज़ आसमान में चमकता सूरज आज ला-पता है। बादलों के घेरों ने आज घेवरा के लोगों की परछाई उनसे जुदा करदी है।
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उर्मिला जी, Babli

पिछले वक्त की धुंधली सी तस्वीर हर किसी के दिमाग में काफी समय तक बिल्कुल ही तरोताज़ा रहती है। ये ताज़गी तब तक जुबान पर आती है, जब तक की नई यादों से बनती ख्वाहिशें पूरी ना हो जाऐ । उर्मिला जी से बात करते हुऐ ये बात लगी ।
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इंतज़ार, शमशेर

लोगों का अपना दिनचर्या है और उसी दिनचर्या से जीवनयापन के अपने बने-बनाये साँचे को मजबूती से बाँधा हुआ है। उसमें दिनचर्या खुल जाने नाम की कोई चीज़ नहीं है। लेकिन यह कोई पाबंदी नहीं है और ना ही आज़ादी की लाड़ाई है।
इन्हीं में से कुछ हर रोज़ ढलती दोपहरी में सावदा के चौक पर अपना क़ाफ़िला तैनात करते हैं। तीन से साढ़े-तीन के बीच आने वाली बसों के लिए।
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स्तर, बबली

आसिम हलदर
यह लक्ष्मीनगर की बसावट को सावदा में तालाशते हैं। एक उम्र आती है जब जगह में आप भी कुछ बनना चाहते हैं और जगह भी वो मुकाम बनाती है जिसमें आप अपनी ज़िन्दगी की गुज़र-बसर को दोहराने का अवसर पहचानते हैं। इस बन्दे से बातचीत करने में लगा कि जगह में लोगो के स्तर को बनाने वाली क्षमता के ऊपर बहुत ही आसानी के साथ विचार कर सकते हैं।
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Dhokha, Jaanu

पेड़ के नीचे सड़क के किनारे किसी की राह देख रहे महिला पुरुष सभी की आँखे एक तरफ ही निहारे जा रही थी । सड़क से अनगिनत गाड़ियाँ नज़रो के सामने से यूं ही निकल जाती । सड़क के दो छोर एक छोर आने वालो का दूसरा जाने वालो का । पर जिस छोर पर लोग खड़े थे व कहीं ना कहीं जाने के लिए ही था । माना कि दोनो छोर पर लोग खड़े थे, एक कॉल सेंटर वाली टाटा सूमि निकली जिसमे कुछ नौजवान लड़कियाँ अपने आपसी दोस्तो के साथ हंसी के ठहाको के साथ हंसी के ठहाके मारकर एक दूसरे के सामने अपनी भौंहो से नैन-मटक्का कर रही थी । टाटा सूमो एकदम सरकती हुई खड़ी हो गई ।

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चलती चक्की, Jaanu Nagar

चलती चक्की

बसन्त की हल्की धूप मे खिलती दोपहर एक सूने पन को जीने मे लगी थी। सभी लोग अपने मन मुताबिक की छाह को ढूढ कर बैठे हुए थे कोई-कोई तो हाफ बाजू की स्वेटर को पहन कर राशन को लेने लिए एक छोटी सी लाइन बना कर जमा राशन कार्डो के पास अपने अपने नाम को सुनकर जाते और अपना पैसा देते जितना राशन मिलना होता अपना राशन लेकर अपने घर की तरफ चले जाते। चेहरे पर लालिमा की दमक हाथ पैर कुछ रूखे-रूखे  अब लाइन का जुमकना चलू हो गया लाइन ज्यादा बड़ी नही हल्की-हल्की धूप से बचने के लिए दिवारो से बनी छाया मे बैठे थे।सड़क के दूसरी तरफ से आती आवाजे किसी बुदबुदाने से कम ना थी।जिसको समझना कान को रोकना भी गलत साबित कर देती की आवाज किस चीज की है।स्कूल के बगल से निकलती काली लम्बी सड़क जिसका एक कोना दिखता है और दूसरा कोना  भी दिखता है मानो अभी सड़क का सफर निश्चित है पर आने वाले मे इस कोने को किस जगह से देख सकते है।
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एकांत जगह मे, Jaanu Nagar

एकांत जगह मे

दोनो को भटकता देख दो नज़रे उनका पीछा कर रही थी । जब दोनो की नज़रे पीछे को मुड़ती तो पीछा कर रही नज़रे ओट मे जाकर छिप जाती । इस तरह से नज़रो के छुपन छुपाई का खेल चल रहा था छुपन छुपाई वाली नज़रे इतना करीब आ गयी ।लड़के ने छुपती नजर को आवाज दिया" और क्या हाल है?”

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