[ सर्वे ]
by Nangla Lab
@ 07.05.2009 14:49 CEST
“रातो की नींद उड़ सी गई है ये सोचकर कि पता नहीं सर्वे के दौरान हमारा क्या होगा ?इतने सालो से यहाँ पर रहकर चीज़ो को बनाया पर पलभर में हम बेघर हो जाऐंगे ....” बेघर शब्द ने ही एक तरह का कम्पन सा पैदा कर दिया है जिंदगी में ।जिसकी ज़मीन नहीं उसका कोई वजूद नहीं ।जब पापाजी ये वाली बात बोल रहे थे तो लगा कि वजूद इस जगह से ही जुड़ा है ।जहाँ पर सिर्फ रहना मात्र ही काफी नहीं है ।नीचे की तली अचानक ही गायब हो गई है और घर की चारों तरफ़ की दिवारें खिसक रही हैं जिसे हम हथेली से मसोटने की कोशिश कर रहे है पर कुछ कर नहीं पा रहे है शायद..
“जब हम शुरुआत में इस जगह पर आऐ तो ,इस ज़मीन को सिर्फ रहने के ठिकाने से देखा।जहाँ पर वो अवसर नज़र आऐ,जिसमें जिन्दगी की पहली मुमकिनता दिखी सिर्फ खाने और कमाने की ।जब पहला वी.पी.सिंह का पहला कार्ड बना तो लगा कि हम सरकारी रजिस्टर में अपना नाम देखकर लगा कि हम सरकारी गिनती में आ गऐ हैं । धीरे- धीरे रहने के बाद ये बात समझ में आई कि जगह पर सिर्फ घर बना लेना ही काफी नहीं होता । जब प्रक्रिया बनी तो सरकारी फायदो के लिए राशन कार्ड भी बन गया । जिस पर कुछ सस्ते में राशन मिल जाता था । यानि कमाई में से कुछ बच पाने की संभावना बनी। धीरे-धीरे 25 साल के अन्तरालो के बीच में नऐ-नऐ सरकारी नम्बरों के बीच में हमारी गणना होने लगी ।घर की ऐसी कौन सी महफूसियत वाली जगह नहीं बनाई ,जहाँ पर अपने उन पर्चो को ना बसाया हो।"
[ शख़्सियतें ]
by nangla lab
@ 02.01.2009 06:45 CEST
जीवन में होने वाले उतार चढाव को समझना।उसके साथ जीना,एक गहरी कला की तरह प्रतीत होती है। यहाँ से वहाँ तक का जीवन निर्वाह किस तरह होता है?ये आवों हवां अपना रूख किस तरह मोड़ती है? कभी स्वर्ग की कल्पना में जीते थे। काम भी उसी जगह पर था। जिस जगह को स्वर्ग की संज्ञा का नमा देते थे। दोनो के किनारे अलग-अलग एक इस पार तो,एक उस पार।
पहले वशीम अहमद जी-: जो महदिउल बनारस उत्तर प्रदेश से।
[ शख़्सियतें ]
by nangla lab
@ 17.12.2008 01:00 CEST
अभी हाल-फिलाल में एक औरत से मुलाक़ात हुई जिनका नाम हसीना है। उनकी उम्र 60 या 65 साल तक की होगी। रंग-साँवला, चेहरा छोटा और भरा हुआ, बाल उम्र के तकाज़े से झड़े हुऐ पर मेहंदी लगाने की वजह से लाल बाल और लाल बालो में सफेदीपन की चमक भी। लाडली फार्म के चक्कर में हमसे मुलाकात हुई।
रोज का देखना, सोचना एक दिन सवाल बन कर आया। गाँव और शहर में कोई ज़्यादा फासला नही था। गाँव जो दिल्ली के ही हैं। शहर से आये विस्थापित लोग जिन्हें सावदा घेवरा जे.जे. कॉलोनी का नाम मिला। उसमें हर तरह के लोगों को अपना अशियाना मिला। जिसमें हर तरह की भाषा, हर तरह के पर्व और हर तरह का पहनावा देखने को मिलता है। जो अपनी ठोस गाढ़ी छवि को लिए हुए है।
आज का दिन चुनाव का आखरी दिन था। 28/11/2008 की तारीख ही बची थी। ये तारीख बस्ती में एक उत्तेजना भरने से कम नहीं थी। पूरे दिन मस्ती का माहौल था। कोई किसी से कम नहीं सभी अपनी धारणाओं को तराशते काटते-छाटते फिरते गलियों में। सभी उम्मीदवार अपना नाम, अपना चुनाव निशान, अपने-अपने उम्मीदवार के जरिये सभी के घर-घर जा कर उनको यही बताते कि सिर्फ इनको वोट देना है और किसी को नहीं देना है। यहाँ तक की भाजपा वालों ने अपने चुनावी निशान वाले लिफ़ाफ़े पर गारजियन के नाम के साथ पूरे परिवार की पर्ची दी जिन्हें वोट डालना था।
आज हवा में धूल नहीं है। इसका कारण देर रात हुई बारिश है। रोज़ आसमान में चमकता सूरज आज ला-पता है। बादलों के घेरों ने आज घेवरा के लोगों की परछाई उनसे जुदा करदी है।
[ शख़्सियतें ]
by nangla lab
@ 22.10.2008 00:00 CEST
पिछले वक्त की धुंधली सी तस्वीर हर किसी के दिमाग में काफी समय तक बिल्कुल ही तरोताज़ा रहती है। ये ताज़गी तब तक जुबान पर आती है, जब तक की नई यादों से बनती ख्वाहिशें पूरी ना हो जाऐ । उर्मिला जी से बात करते हुऐ ये बात लगी ।
लोगों का अपना दिनचर्या है और उसी दिनचर्या से जीवनयापन के अपने बने-बनाये साँचे को मजबूती से बाँधा हुआ है। उसमें दिनचर्या खुल जाने नाम की कोई चीज़ नहीं है। लेकिन यह कोई पाबंदी नहीं है और ना ही आज़ादी की लाड़ाई है।
इन्हीं में से कुछ हर रोज़ ढलती दोपहरी में सावदा के चौक पर अपना क़ाफ़िला तैनात करते हैं। तीन से साढ़े-तीन के बीच आने वाली बसों के लिए।
[ शख़्सियतें ]
by nangla lab
@ 11.09.2008 00:00 CEST
आसिम हलदर
यह लक्ष्मीनगर की बसावट को सावदा में तालाशते हैं। एक उम्र आती है जब जगह में आप भी कुछ बनना चाहते हैं और जगह भी वो मुकाम बनाती है जिसमें आप अपनी ज़िन्दगी की गुज़र-बसर को दोहराने का अवसर पहचानते हैं। इस बन्दे से बातचीत करने में लगा कि जगह में लोगो के स्तर को बनाने वाली क्षमता के ऊपर बहुत ही आसानी के साथ विचार कर सकते हैं।
पेड़ के नीचे सड़क के किनारे किसी की राह देख रहे महिला पुरुष सभी की आँखे एक तरफ ही निहारे जा रही थी । सड़क से अनगिनत गाड़ियाँ नज़रो के सामने से यूं ही निकल जाती । सड़क के दो छोर एक छोर आने वालो का दूसरा जाने वालो का । पर जिस छोर पर लोग खड़े थे व कहीं ना कहीं जाने के लिए ही था । माना कि दोनो छोर पर लोग खड़े थे, एक कॉल सेंटर वाली टाटा सूमि निकली जिसमे कुछ नौजवान लड़कियाँ अपने आपसी दोस्तो के साथ हंसी के ठहाको के साथ हंसी के ठहाके मारकर एक दूसरे के सामने अपनी भौंहो से नैन-मटक्का कर रही थी । टाटा सूमो एकदम सरकती हुई खड़ी हो गई ।